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कविता परिचय
‘कलगी बाजरे की‘ कविता प्रयोगवाद के प्रवर्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय‘ द्वारा रचित एक युगांतकारी रचना है। इस कविता में कवि ने पारंपरिक और घिसे-पिटे उपमानों (जैसे चाँद, चंपा, कमल) को त्यागकर नवीन प्रतीकों को अपनाने पर बल दिया है।
कवि का मानना है कि पुराने उपमान ‘मैले‘ हो गए हैं और अपनी सार्थकता खो चुके हैं। वे अपनी प्रेयसी की तुलना ‘हरी घास‘ और ‘बाजरे की कलगी‘ से करते हुए प्रेम की सहजता, नवीनता और ग्रामीण यथार्थ को प्रतिष्ठित करते हैं। यह कविता शिल्प के स्तर पर बौद्धिकता और भाव के स्तर पर अटूट समर्पण की अभिव्यक्ति है।
कलगी बाजरे की
हरी बिछली घास।
डोलती कलगी छरहरी बाजरे की।
अगर मैं तुमको
ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कूँई
टटकी कली चंपे की वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही :
ये उपमान मैले हो गए हैं।
देवता इन प्रतीकों को कर गये हैं कूच।
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
मगर क्या तुम
नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के —
तुम हो, निकट हो, इसी जादू के
निजी किस सहज, गहरे बोध से,
किस प्यार से मैं कह रहा हूँ-
अगर मैं यह कहूँ–
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की?
आज हम शहरातियों को
पालतू मालंच पर सँवरी जूही के फूल से
सृष्टि के विस्तार का – ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा
एक प्रतीक
बिछली घास है,
या शरद की साँझ के सूने गगन की पीठिका पर
डोलती कलगी अकेली बाजरे की।
और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूँ
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकांत होता हूँ समर्पित।
शब्द जादू है-
मगर क्या यह समर्पण कुछ नहीं?
शब्द-अर्थ
शब्द | अर्थ |
|---|---|
कलगी | बाजरे या अन्य अनाज के ऊपर का फूल/सिखा |
छरहरी | दुबली-पतली और सुंदर |
ललाती | लाल रंग की आभा वाली (उगता या डूबता सूरज) |
तारिका | छोटा तारा (Starlet) |
नीहार-न्हायी | ओस में नहाई हुई |
कुँई | कुमुदिनी का फूल (Water Lily) |
टटकी | ताज़ी (Fresh) |
उपमान | जिससे तुलना की जाए (जैसे चाँद, कमल) |
मैले होना | चमक खो देना या पुराने पड़ जाना |
प्रतीक | चिह्न (Symbol) |
मुलम्मा | धातु पर चढ़ाई गई दूसरी धातु की परत (Polishing/Coating) |
बासन | बर्तन |
शहराती | शहर में रहने वाले लोग |
मालंच | बगीचा या उपवन |
ऐश्वर्य | वैभव या संपन्नता |
औदार्य | उदारता (Generosity) |
पीठिका | आधार या पृष्ठभूमि (Background) |
संसृति | संसार या सृष्टि |
एकांत | पूरी तरह से या अकेले में |
हरी बिछली घास।
डोलती कलगी छरहरी बाजरे की।
अगर मैं तुमको
ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कूँई
टटकी कली चंपे की वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही :
ये उपमान मैले हो गए हैं।
देवता इन प्रतीकों को कर गये हैं कूच।
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
संदर्भ
उपर्युक्त पंक्तियाँ प्रयोगधर्मी कवि अज्ञेय की ‘कलगी बाजरे की’ शीर्षक कविता से अवतरित हैं। यह रचना कवि के ‘हरी घास पर क्षण भर‘ कविता संग्रह में संकलित है। इस कविता के माध्यम से कवि ने काव्य के क्षेत्र में सर्वथा नए प्रतीकों और उपमानों के संधान और प्रयोग पर बल दिया है।
प्रसंग
पुराने और पारंपरिक उपमान अपनी महत्ता और अर्थवत्ता खोने लगते हैं। युग संदर्भ में उनकी व्यापकता भी संकुचित प्रतीत होने लगती है। कवि अपनी प्रेयसी की तुलना पुराने उपमानों के बदले कलगी बाजरे की या हरी बिछली घास से करता है। इससे कवि को अपना प्रेम कहीं अधिक व्यापक प्रतीत होता है।
व्याख्या
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपनी प्रेमिका की तुलना तारा, कुमुदिनी अथवा चंपे की कली जैसे पुराने उपमानों को छोड़कर चिकनी हरी घास और बाजरे की कली से करते हैं। उनके अनुसार हरी घास और बाजरा प्रेयसी की सुंदरता के अधिक निकट है। कवि इन दोनों उपमानों की सादगी भरी शोभा से इतने प्रभावित हैं कि वे इसके माध्यम से सारी सृष्टि को अपने निकट महसूस करते हैं। वे प्रेमिका को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यदि मैं तुम्हें लालिमा से भरपूर शाम को आकाश में चमकने वाली अकेली तारिका नहीं कहता अथवा शरद ऋतु के भोर की कुहरे से ढँकी कुमुदिनी नहीं कहता हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं कि मेरे हृदय में प्रेम की गहराई नहीं या मैं भावना या संवेदना से शून्य हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम में किसी प्रकार की कोई मलिनता या दुर्भावना नहीं है बल्कि इसका कारण यह है कि सदियों से प्रचलित ये पारंपरिक उपमान बेहद पुराने हो चुके हैं। बासी हो गए हैं। देवता भी इन प्रतीकों के कूच कर चुके हैं। इनकी अंतर्निहित शक्ति फीकी पड़ चुकी है। परिवर्तित समय में इनसे अर्थ की अभिव्यक्ति कमजोर तरीके से अथवा असफल ढंग से ही हो पाती है। ये प्रतीक और उपमान घिस चुके हैं। इनका उपयोग बार-बार होने के कारण ये शक्तिहीन हो चुके हैं। जिस प्रकार बासन को अधिक घिसने से वह पुराना पड़ जाता है, उसकी चमक बेहद फीकी पड़ जाती है, बिना कलई अर्थात् चमक के बर्तन निष्प्रभ हो जाता है, ठीक वैसी ही स्थिति पारंपरिक उपमानों की होती है। तारिका का प्रकाश, उजास और उसकी अलौकिकता, कुमुदिनी की निर्मलता, चम्पे की मादकता पुराने, जूठे, बासी और प्रभावहीन हो गए हैं। इसके विपरीत नए उपमानों के प्रयोग हों तो उनमें ताजगी, नवीनता और मौलिकता होंगी। इसलिए प्रयोगधर्मी कवि अपनी कविता में नए नए प्रतीकों और उपमानों का प्रयोग करते हैं।
02
मगर क्या तुम
नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के —
तुम हो, निकट हो, इसी जादू के
निजी किस सहज, गहरे बोध से,
किस प्यार से मैं कह रहा हूँ-
अगर मैं यह कहूँ–
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की?
प्रसंग
कवि ने अनछुए और सर्वथा नवीन उपमानों का प्रयोग किया है। पुराने और पारंपरिक उपमानों की तुलना में कवि द्वारा प्रयुक्त उपमान अधिक अर्थव्यंजक और उद्देश्यधर्मी हैं। हो सकता है कि ये उपमान अपनी नवीनता के कारण थोड़े अटपटे लगें, लेकिन उद्देश्य की सिद्धि में कवि को अचूक प्रतीत होते हैं।
व्याख्या
कवि अपनी प्रियतमा से कहते हैं कि क्या इन नए उपमानों के प्रयोग से तुम्हारे रूप सौंदर्य का बखान करूँ तो क्या तुम मेरी भावनाओं को नहीं समझ सकोगी? क्या इनके प्रयोग से तुम अपने आपको समझ नहीं पाओगी? मेरे लिए तो तुम्हारा वास्तविक सौंदर्य इन प्रतीकों – उपमानों के अधिक निकट जान पड़ता है। इसलिए इन नवीन और ताजे – टटके उपमानों से तुम्हें उपमित करने में मुझे कुछ अनुचित प्रतीत नहीं होता है। बड़े ही सहज भाव से अपने हृदय की अतल गहराई से तुम्हारे प्रेम से अभिभूत हो अत्यधिक जुड़ाव के साथ यह कह रहा हूँ कि तुम हरी बिछली घास हो अर्थात् जिस प्रकार की फिसलन, चिकनाई और हरियाली हरी घास में होती है, उसी तरह तुम्हारे रूप–लावण्य की सुगढ़ देह का इससे अच्छा उपमान नहीं हो सकता। हवा में डोलती छरहरी, मुलायम, पतली बाजरे की कलगी तुम्हारे अल्हड़पन और मस्ती का परिचायक हो जाता है। कवि का कहना है कि किस भावबोध से ये नए उपमान रचे गए हैं, उन्हें केवल तुम ही समझ सकती हो।
03
आज हम शहरातियों को
पालतू मालंच पर सँवरी जूही के फूल से
सृष्टि के विस्तार का – ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा
एक प्रतीक
बिछली घास है,
या शरद की साँझ के सूने गगन की पीठिका पर
डोलती कलगी अकेली बाजरे की।
प्रसंग
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों के माध्यम से कवि अज्ञेय जी ने नए उपमानों के महत्त्व और औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि हरी बिछली घास बिल्कुल नया उपमान है। लेकिन यह उपमान नारी की कोमलता, सहजता और ताजगी के अहसास को व्यक्त करता है। इसमें शुष्कता नहीं, अपितु एक आर्द्रता, एक नमी है। साथ ही, सौंदर्य की व्यापकता भी।
व्याख्या
इन पंक्तियों में कवि घास और बाजरे को शहरी सभ्यता और पूरी सृष्टि से जोड़कर देखते हैं। शहर में रहने वालों के लिए अपने घरेलू बगीचे पर साज-सँवार कर उगाए गए जुही के फूल से उस ऐश्वर्य, सच्चाई, औदार्य और सृष्टि के विस्तार का बोध नहीं हो सकता जो ‘हरी बिछली घास‘ अथवा शरद ऋतु की सांध्यबेला में आकाश की शून्य पीठिका पर लाहलहाते ‘बाजरे की कलगी’ में है। भाव यह है कि चिकनी घास शहर में रहनेवालों के लिए इस संसार की विशालता, समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है। शहर के निवासी के अनुसार जुही के फूल घास और बाजरे की कलगी से अधिक महत्त्वपूर्ण है। वे इसी से दुनिया की विशालता को समझने की भूल कर बैठते हैं। जबकि हरी घास और बाजरे की कलगी लोक जीवन और लोक संस्कृति के अंग हैं। इनसे आम तौर पर शहरी जनजीवन दूर रहता है।
04
और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूँ
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकांत होता हूँ समर्पित।
शब्द जादू है-
मगर क्या यह समर्पण कुछ नहीं?
प्रसंग
कवि ने अंतिम पंक्तियों में ‘हरी घास’ और ‘कलगी बाजरे की’ दोनों को संपूर्ण सृष्टि से जोड़ने का प्रयास किया है।
व्याख्या
कवि अंत में कहते हैं कि जब भी मैं इस घास या बाजरे की कलगी को देखता हूँ, तो मुझे इस विशाल और सूनी सृष्टि की सघनता महसूस होती है। मुझे लगता है कि मैं पूरी तरह से एकांत में तुम्हारे प्रति समर्पित हो गया हूँ। कवि स्वीकार करते हैं कि शब्द जादुई होते हैं, लेकिन शब्दों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मेरा वह ‘समर्पण‘ है, जो मैं इन नए प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त कर रहा हूँ। कवि की दृष्टि में शब्दों के कृत्रिम जादू से समर्पण कहीं अधिक मूल्यवान है।
काव्य सौष्ठव
- भाव पक्ष
नवीन सौंदर्यबोध – अज्ञेय ने सदियों से चले आ रहे सौंदर्य के मानकों (जैसे चाँद, कमल, चकोरी) को चुनौती दी है। वे प्रेयसी को ‘बाजरे की कलगी’ कहकर उसे प्रकृति के कच्चे और अछूते रूप से जोड़ते हैं।
पुराने उपमानों का खंडन – कवि का तर्क है कि पुराने उपमान ‘मैले’ हो गए हैं। इसका अर्थ यह है कि बार-बार उपयोग होने से उनकी अर्थवत्ता और मौलिकता समाप्त हो गई है।
प्रकृति और यथार्थ – यहाँ प्रकृति का चित्रण अलौकिक नहीं बल्कि यथार्थवादी है। ‘बिछली घास’ और ‘हवा में डोलती कलगी’ जीवंतता और ताज़गी के प्रतीक हैं।
समर्पण का महत्त्व – कविता के अंत में कवि ‘शब्दों के जादू’ से ऊपर ‘समर्पण’ के भाव को रखता है। वह कहता है कि प्रेम शब्दों का मोहताज नहीं, बल्कि हृदय की गहनता का विषय है।
- कला पक्ष
(क) भाषा-शैली
तत्सम प्रधान खड़ी बोली – कविता की भाषा परिमार्जित है, जिसमें ‘मुलम्मा’, ‘संसृति’, ‘औदार्य’ जैसे तत्सम शब्दों के साथ-साथ ‘टटकी’, ‘बिछली’ जैसे देशज शब्दों का सुंदर समन्वय है।
शहरी बनाम ग्रामीण बोध – कवि ने ‘शहरातियों’ और ‘पालतू मालंच’ (बगीचे) जैसे शब्दों का प्रयोग कर शहरी बनावटीपन पर व्यंग्य किया है।
(ख) नवीन प्रतीक और उपमान (Imagery)
अज्ञेय ने ‘प्रतीकों के देवता कूच कर गए हैं’ जैसी कालजयी पंक्ति के माध्यम से कविता में नए युग की शुरुआत की है।
बिछली घास – विस्तार और सहनशीलता का प्रतीक।
बाजरे की कलगी – छरहरेपन, उन्मुक्तता और सहज सौंदर्य का प्रतीक।
(ग) बिम्ब विधान (Visual Imagery)
कविता पढ़ते समय ‘साँझ के नभ की अकेली तारिका’ या ‘हवा में डोलती बाजरे की कलगी’ का स्पष्ट चित्र आँखों के सामने उभरता है। यहाँ दृश्य बिम्ब (Visual Imagery) का अत्यंत प्रभावी प्रयोग है।
(घ) छंद और लय
यह एक ‘मुक्त छंद’ (Free Verse) की कविता है। इसमें तुकबंदी का आग्रह नहीं है, परंतु शब्दों का चयन ऐसा है कि कविता में एक आंतरिक लय और प्रवाह बना रहता है।

