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कविता परिचय
यह कविता हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित है। इस कविता में कवि एक अकेले, स्नेह से भरे दीपक के माध्यम से व्यक्ति की महत्ता और उसके सामाजिक दायित्व को दर्शाते हैं। कवि का संदेश है कि व्यक्ति (दीप) भले ही अपनी विशिष्टता, गर्व और आत्मविश्वास (मदमाता) से परिपूर्ण हो, लेकिन उसकी सार्थकता और पूर्णता समाज (पंक्ति) से जुड़ने में ही है। यह दीप अकेला कविता का केंद्रीय भाव यह है कि व्यक्ति अपनी मौलिकता और सामर्थ्य में चाहे कितना भी महान क्यों न हो, उसका वास्तविक मूल्य और सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब वह समाज (पंक्ति), शक्ति (सामूहिक बल) और भक्ति (सामूहिक समर्पण) के साथ जुड़कर अपने गुणों का उपयोग व्यापक हित के लिए करता है। यह कविता व्यक्तिवाद और समष्टिवाद के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
‘सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान’
हे महाबुद्ध!
मैं मंदिर में आयी हूँ
रीते हाथ –
फूल मैं ला न सकी।
औरों का संग्रह
तेरे योग्य न होता।
और जो मुझे सुनाती
जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत
खोलती रूप जगत के द्वार जहाँ
तेरी करुणा
बुनती रहती है
भव के सपनों, क्षण के आनंदों के
रह – सूत्र अविराम-
उस भोली मुग्धा को
कँपती
डाली से विलग न सकी।
जो कली खिलेगी जहाँ, खिली
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघात, अस्पृश्य, अनाविल
हे महाबुद्ध?
अर्पित करती हूँ तुझे।
वहीं-वहीं प्रत्येक प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा
अपने सुंदर आनंद-निमिष का,
तेरा हो,
हे विगतागत के, वर्तमान के पद्मकोश !
हे महाबुद्ध !
शब्दार्थ
शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) | प्रसंग में भावार्थ (Contextual Sense) |
|---|---|---|
महाबुद्ध | महान बुद्ध (गौतम बुद्ध) | परम ज्ञान और करुणा के प्रतीक। |
रीते | खाली, रिक्त | बिना किसी पूजा सामग्री के, खाली हाथ। |
संग्रह | इकट्ठा की हुई सामग्री, संकलन | दूसरों द्वारा लाई गई पूजा सामग्री। |
योग्य | उपयुक्त, लायक | आपके महान व्यक्तित्व के स्तर का। |
विह्वल | भाव-विभोर, व्याकुल, अत्यंत आनंदित | जीवन के अत्यंत सुखद और प्रफुल्लित क्षण। |
सुख-क्षण | सुख का पल | जीवन का आनंदमय और क्षणिक अनुभव। |
रूप जगत | सौंदर्य का संसार, भौतिक जगत | दृश्यमान संसार की सुंदरता। |
करुणा | दया, सहानुभूति, अनुकंपा | बुद्ध का वह गुण जो सृष्टि का आधार है। |
भव | संसार, सृष्टि | जीवन-मरण का चक्र। |
रह – सूत्र | रहस्यमय धागे/कड़ियाँ | सृष्टि और जीवन के गूढ़ नियम। |
अविराम | लगातार, निरंतर, बिना रुके | बुद्ध की करुणा का निरंतर प्रवाह। |
मुग्धा | मोहित करने वाली, भोली-भाली | यहाँ फूल या कली के लिए प्रयुक्त। |
विलग | अलग करना, पृथक करना | डाली से तोड़ना। |
पल्लवित | जिस पर नए पत्ते आ गए हों, विकसित | खिला हुआ या विकसित होता हुआ। |
पुलकित | रोमांचित, प्रसन्न, आनंदित | आनंद से भरा हुआ। |
अक्षत | अखंडित, टूटा न हुआ | बिना किसी प्रकार की क्षति या हानि के। |
अनाघात | जिस पर आघात न हुआ हो, छिद्रहीन | बिना छेदा हुआ, जिसे तोड़ा न गया हो। |
अस्पृश्य | जिसे छुआ न गया हो, अछूता | उसकी प्राकृतिक पवित्रता में, बिना हाथ लगाए। |
अनाविल | निर्मल, स्वच्छ, मैला न हुआ हो | शुद्ध, अपवित्र न किया गया हो। |
नैवेद्य | भोग, देवताओं को चढ़ाया जाने वाला भोजन | यहाँ जीवन के अनुभव रूपी भेंट। |
निमिष | पल, क्षण | समय का सबसे छोटा हिस्सा, अत्यंत छोटा पल। |
विगतागत | बीता हुआ और आने वाला (भूत और भविष्य) | तीनों कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) का प्रतीक। |
पद्मकोश | कमल का भीतरी भाग या केंद्र | कमल के समान पवित्रता का केंद्र/स्रोत। |
पाठ की पृष्ठभूमि व परिचय
‘सम्राज्ञी का नैवेद्य दान‘ शीर्षक कविता की व्याख्या के पहले आप इस रचना की पृष्ठभूमि को ध्यानपूर्वक पढ़ लें तो कविता का भाव ग्रहण करने में आपको कठिनाई नहीं होगी। आप जानते हैं कि जापान में बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में हैं। जापान की रानी के लिए ‘सम्राज्ञी‘ शब्द का प्रयोग हुआ है। उनका नाम ‘कोमियो’ था। राजधानी नारा में अवस्थित महाबोधि मंदिर में बुद्ध के दर्शन हेतु जाते समय उनके मन में उमड़ने वाले भावों को इस कविता में प्रस्तुत किया गया है। सम्राज्ञी यह तय नहीं कर पाती हैं कि भगवान बुद्ध को भेंट करने के लिए क्या लेकर जाएँ। काफी चिंतन-मनन के उपरांत वह खाली हाथ भगवान बुद्ध के दर्शन हेतु पहुँचती है। इस पृष्ठभूमि में ‘साम्राज्ञी का नैवेद्य दान‘ कविता सितंबर 1957 में रची गई थी। एक तथ्य यह भी है कि बौद्ध साहित्य में सम्राज्ञी कोमियो का नाम विशेष आदर और सम्मान के साथ उल्लेख मिलता है।
पाठ का मुख्य बिन्दु
आप किसी को उपहार दें तो वह प्रसन्न हो जाता है पर जब आप किसी को सुंदर विचारों का उपहार दें तो उसकी ज़िंदगी सँवर जाती है। यदि इस बात पर गहराई से विचार किया जाए तो हम यह पाएँगे कि आदमी के विचारों के मूर्त रूप से ही यह दुनिया इतनी समृद्ध बन पाई है। इसलिए विचारों का हमारे जीवन में अन्यतम स्थान है। हमारे उत्तम विचार ही हमें श्रेष्ठ और सशक्त बनाते हैं। इस कविता में भी भगवान महाबुद्ध की एक अनन्य भक्त अपने विचारों की भेंट ही दर्शनार्थ महाबुद्ध को भेंट करती हैं।
01
हे महाबुद्ध!
मैं मंदिर में आयी हूँ
रीते हाथ –
फूल मैं ला न सकी।
औरों का संग्रह
तेरे योग्य न होता।
और जो मुझे सुनाती
जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत
खोलती रूप जगत के द्वार जहाँ
तेरी करुणा
बुनती रहती है
भव के सपनों, क्षण के आनंदों के
रह – सूत्र अविराम-
उस भोली मुग्धा को
कँपती
डाली से विलग न सकी।
प्रसंग
उपर्युक्त कवितांश हिंदी के बहुप्रसिद्ध कवि अज्ञेय की ‘सम्राज्ञी का नैवेद्य दान‘ शीर्षक कविता से अवतरित है। भगवान बुद्ध के श्रेष्ठ भक्तों में सम्राज्ञी कोमियो का नाम लिया जाता है। इस कविता में सम्राज्ञी के मनोभावों को कवि ने बड़ी शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया है।
व्याख्या
माना जाता है कि फूलों का सर्वाधिक सौंदर्य होता है जब वे डाल पर हों। वे वहीं अक्षत और अनाविल रूप से पल्लवित रहते हैं। पुलकित रहते हैं। वे वहीं रहकर स्रष्टा के लिए समर्पित रहते हैं। कहा यह भी जाता है कि डाल से फूल तोड़ने से डाल और पेड़ दोनों को दुख होता है, कष्ट होता है। फूल जीवनरहित हो जाते हैं। डाल से फूल तोड़ने का आशय माँ की गोद से शिशु को छीन लेने के समान है। इन्हीं कारणों से सम्राज्ञी कहती हैं, हे महाबुद्ध ! मैं तुम्हारे इस मंदिर में पूजा करने आई हूँ लेकिन मेरे पास तुम्हें चढ़ाने के लिए औरों की भाँति पुष्पगुच्छ अथवा हार या पूजा की सामग्री नहीं है। मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है। मगर मेरे मन में पवित्र भाव हैं। यही मेरी पूजा की सामग्री है। लोग आपको भेंट स्वरूप पुष्प अर्पित करते हैं। परंतु मुझे ऐसा लगता है कि फूल तो किसी और का संग्रह है। पुनः उसे तोड़ना हिंसा ही है। ऐसे में आपको पुष्प अर्पित करना मेरे लिए ग्लानि का कारण होता न कि गौरव का भाव। हे महाबुद्ध ! आप स्वयं बौद्धिक विवेक के प्रतिमान हैं। आप सारभूत करुणा के परम प्रतीक हैं। इसलिए आप ही मेरे मानसिक द्वंद्व को भली-भाँति समझ रहे होंगे कि आखिर मैं खाली हाथ आपके दर्शन करने क्यों आई।
कविता के अगले अंश में कवि ने सम्राज्ञी की उलझनभरी मनःस्थिति का चित्रण किया है। सम्राज्ञी कहती हैं कि हे महाबुद्ध ! आपकी करुणामयी मुस्कान जीवन के विह्वल सुख – क्षणों का संगीत सुनाती है। इससे मेरे जीवन के न जाने कितने रूप सौंदर्य के द्वार उन्मुक्त हो जाते हैं। क्षण के आनंद के जरिए नए सपने जन्म लेते हैं। ये स्वप्न मुझे डाल पर खिले फूलों में दिखाई पड़ते हैं। मैं भला उन भोली-भाली मुग्धता को डाल से कैसे अलग कर सकती हूँ? इसलिए आप मेरे मन की उलझनभरी दशा को समझ सकते हैं। खाली हाथ आपके दर्शन हेतु आ जाने का कारण आप ही समझ सकते हैं।
विशेष
अवतरित अंश में जीवन सौंदर्य और करुणा का मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। महादेवी वर्मा के ‘क्या पूजन क्या अर्चन रे‘ जैसी कविताएँ भी इस संदर्भ में पढ़ी जा सकती हैं।
व्याख्या – 02
जो कली खिलेगी जहाँ, खिली
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघात, अस्पृश्य, अनाविल
हे महाबुद्ध?
अर्पित करती हूँ तुझे।
वहीं-वहीं प्रत्येक प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा
अपने सुंदर आनंद-निमिष का,
तेरा हो,
हे विगतागत के, वर्तमान के पद्मकोश !
हे महाबुद्ध !
प्रसंग
अज्ञेय की ‘सम्राज्ञी का नैवेद्य दान‘ कविता के उपर्युक्त अवतरण में बुद्ध के प्रति सम्राज्ञी का अनन्य समर्पण का भाव प्रकट होता है। इन पंक्तियों में सम्राज्ञी का निवेदन वर्णित है।
व्याख्या
सृष्टि का कल्याण समूचे अस्तित्व को सुरक्षित रखकर ही संभव होता है। समग्र जीवन को महत्त्व प्रदान करते हुए सम्राज्ञी कहती हैं कि जो कली जहाँ भी खिली है, जो फूल जहाँ भी अपनी शोभा और गंध समर्पित कर रहा है अथवा जीवन से जुड़ा जो भी सुख जिस डाल पर पल्लवित और पुलकित है, उन सबको वहीं बस वहीं बिना कोई हानि पहुँचाए, बिना किसी आघात के, बिना किसी स्पर्श के प्रकृत और पवित्रता के साथ मैं आपको समर्पित करती हूँ। ऐसे अपूर्व समर्पण के लिए कवि ने “अक्षत, अनाघात, अस्पृश्य, अनाविल‘ का प्रयोग किया है। हिंसा के वातावरण में इस भाव का औचित्य और प्रासंगिकता स्वयंसिद्ध है। इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को जीवन रूपी प्याले में जो भी प्राप्त है, उसे उसी में प्रसन्न होना चाहिए। धैर्य और संतोष को जीवन की पूँजी मानकर आगे बढ़ना चाहिए। सम्राज्ञी ने अपने आराध्य भगवान बुद्ध को ‘विगतागत‘ अर्थात् जो बीत चुका है और जो आने वाला है तथा ‘वर्तमान के पद्मकोष‘ के संबोधन से अतीत में ही नहीं, मौजूदा समय में भी बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता को स्पष्ट किया है।
विशेष
आज के जीवन में भयानक होड़ लगी हुई है। हम अपनी स्वायत्तता (Autonomy) को लेकर चिंतित रहते हैं लेकिन दूसरों की भी स्वायत्तता होती है, इसे भुला बैठते हैं। स्वतंत्रता के संदर्भ में भी हमारा ऐसा ही आचरण रहता है। जीवन की मूलभूत गुणवत्ता और उसके सौंदर्य को बचाए रखना परम आवश्यक है। यह कविता जीवन की गरिमा, मूल्यपरकता, मानवीय पक्षधरता, करुणा, जीवन विवेक आदि शाश्वत मूल्यों को प्रतिष्ठित करती है।
- भाव पक्ष (Ideological and Emotional Aspect)
उदात्त दर्शन – कवि ने पारंपरिक पूजा विधि को त्याग कर, जीवन और प्रकृति के अखंड सौंदर्य को ही ईश्वर को समर्पित किया है। यह ‘यथास्थिति‘ को स्वीकार करने का महान दर्शन है।
प्रकृति प्रेम – प्रकृति के प्रति सूक्ष्म संवेदनशीलता। कवि एक फूल को तोड़ना भी जीवन के आनंद को भंग करना मानता है।
मानवतावादी चेतना – बुद्ध की करुणा को विश्व के सृजन और आनंद के मूल में देखना।
समर्पण की भावना – जीवन के प्रत्येक क्षण (सुख-निमिष) को बिना किसी मिलावट के ईश्वर को समर्पित करना।
पहलू | विशेषता | उदाहरण/स्पष्टीकरण |
|---|---|---|
उदात्त दर्शन | “जो फूल जहाँ है, जो भी सुख जिस भी डाली पर… मैं उसे वहीं पर… अर्पित करती हूँ तुझे।” | |
प्रकृति प्रेम (सौंदर्य बोध) | “जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत… उस भोली मुग्धा को कँपती डाली से विलग न सकी।” | |
मानवतावादी चेतना | “तेरी करुणा बुनती रहती है भव के सपनों, क्षण के आनंदों के रह – सूत्र अविराम-“ | |
समर्पण की भावना | “वहीं-वहीं प्रत्येक प्याला जीवन का, वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा अपने सुंदर आनंद-निमिष का, तेरा हो…” |
- कला पक्ष (Artistic and Formal Aspect)
(क) भाषा और शब्दावली
- संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली – भाषा अत्यंत गंभीर, परिष्कृत और कोमल है, जो दार्शनिक भावों को उत्कृष्टता प्रदान करती है।
- उदाहरण – विह्वल, विलग, अक्षत, अनाघात, अस्पृश्य, अनाविल, नैवेद्य, निमिष, पद्मकोश, विगतागत।
- लाक्षणिकता और चित्रात्मकता – शब्दों के माध्यम से बिंब (Imagery) निर्मित होते हैं, जैसे – ‘जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत‘ या ‘कँपती डाली‘।
- लय और नाद – कविता में एक शांत, धीर और प्रवाहमयी लय है, जो चिंतनशील (meditative) भावों के अनुरूप है।
(ख) अलंकार
मानवीकरण (Personification) – निर्जीव या प्राकृतिक वस्तुओं में मानवीय क्रियाओं का आरोपण। यह छायावाद की मुख्य विशेषता है।
उदाहरण – “जो मुझे सुनाती जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत…” (फूल का गीत गाना)
अनुप्रास अलंकार (Alliteration) – वर्णों की आवृत्ति से उत्पन्न सौंदर्य।
उदाहरण – “पल्लवित, पुलकित”
पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (Repetition for Emphasis) – एक ही शब्द की आवृत्ति से अर्थ में बल लाना।
उदाहरण – “वहीं-वहीं प्रत्येक प्याला जीवन का, वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा…”
विशेषण विपर्यय (Transferred Epithet) – विशेषण का सही संज्ञा के स्थान पर किसी अन्य संज्ञा के लिए प्रयोग।
उदाहरण – “कँपती डाली” (वास्तव में फूल या कली को तोड़ने से उत्पन्न होने वाली कंपन का भाव)।
(ग) छंद और शैली
अतुकांत/मुक्त छंद – यह कविता मुक्त छंद (Free Verse) में लिखी गई है, जिसमें पारंपरिक मात्रा या वर्णों का बंधन नहीं है। यह भावों की सहज और स्वच्छंद अभिव्यक्ति के लिए सर्वथा उपयुक्त है।
शैली – यह संबोधनात्मक शैली (Vocation Style) में लिखी गई है, जहाँ कवि सीधे महाबुद्ध को संबोधित करता है (“हे महाबुद्ध!”)। यह शैली कविता को व्यक्तिगत और आंतरिक समर्पण का रूप देती है।

