इच्छित बिंदु पर क्लिक करें।
जन्म : सन् 1899, महिषादल, (बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले में) पारिवारिक गाँव-गढ़ाकोला, (उन्नाव, उत्तर प्रदेश)
प्रमुख रचनाएँ : अनामिका, परिमल, गीतिका, बेला, नए पत्ते, अणिमा, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता (कविता संग्रह); चतुरी चमार, प्रभावती, बिल्लेसुर बकरिहा, चोटी की पकड़, काले कारनामे (गघ); आठ खंडों में ‘निराला रचनावली’ प्रकाशित। समन्वय, मतवाला पत्रिका का संपादन।
निधन : सन् 1961, (इलाहाबाद में)
कविता को नया स्वर देने वाले निराला छायावाद के ऐसे कवि हैं जो एक ओर कबीर की परंपरा से जुड़ते हैं तो दूसरी ओर समकालीन कवियों के प्रेरणा स्रोत भी हैं। उनका यह विस्तृत काव्य-संसार अपने भीतर संघर्ष और जीवन, क्रांति और निर्माण, ओज और माधुर्य, आशा और निराशा के द्वंद्व को कुछ इस तरह समेटे हुए है कि वह किसी सीमा में बँध नहीं पाता। उनका यह निर्बंध और उदात्त काव्य-व्यक्तित्व कविता और जीवन में फाँक नहीं रखता। वे आपस में घुले-मिले हैं। उल्लास-शोक, राग-विराग, उत्थान-पतन, अंधकार-प्रकाश का सजीव कोलाज है उनकी कविता। जब वे मुक्त छंद की बात करते हैं तो केवल छंद, रूढ़ियों आदि के बंधन को ही नहीं तोड़ते बल्कि काव्य विषय और युग की सीमाओं को भी अतिक्रमित करते हैं।
विषयों और भावों की तरह भाषा की दृष्टि से भी निराला की कविता के कई रंग हैं। एक तरफ़ तत्सम सामासिक पदावली और ध्वन्यात्मक बिंबों से युक्त राम की शक्ति पूजा और कठिन छंद-साधना का प्रतिमान तुलसीदास है, तो दूसरी तरफ़ देशी टटके शब्दों का सोंधापन लिए कुकुरमुत्ता, रानी और कानी, महँगू महँगा रहा जैसी कविताएँ हैं।
कविता परिचय
‘संध्या सुंदरी’ निराला की एक प्रसिद्ध कविता है। इसका प्रकाशन साप्ताहिक पत्रिका ‘मतवाला’ में हुआ था। बाद में यह कविता ‘परिमल’ (1929) में संकलित हुई। इस कविता में निराला ने शाम की सुंदरता का वर्णन किया है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें शाम को एक ‘सुंदरी’ के रूपक में ढाला गया है। प्रकृति में मनुष्य को देखने की प्रवृत्ति छायावाद की मुख्य विशेषता है। इस लिहाज से ‘संध्या सुंदरी’ छायावाद की एक प्रतिनिधि कविता है।
संध्या सुंदरी
दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह सन्ध्या-सुंदरी परी-सी
धीरे धीरे धीरे,
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किंतु गंभीर नहीं है उनमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से,
हृदय-राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता
किंतु कोमलता की वह कली,
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अम्बर-पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग राग आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप चुप चुप”
है गूँज रहा सब कहीं,
व्योममण्डल में- जगती-तल में-
सोती शान्त सरोवर पर उस अमर कमलिनी-दल में-
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षःस्थल में-
धीर वीर गंभीर शिखर पर हिमगिरि- अटल-अचल में
उत्ताल-तरंगाघात,-प्रलय घन गर्जन जलधि-प्रबल में
क्षिति में जल में नभ में अनिल अनल में-
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप चुप चुप”
है गूँज रहा सब कहीं,-
और क्या है? कुछ नहीं।
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को वह सस्नेह
प्याला वह एक पिलाती,
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के वह कितने मीठे सपने।
अर्द्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती वह लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कंठ से
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।
कठिन शब्द
संध्या सुंदरी – संध्या मानो सुंदरी की तरह है।
दिवसावसान – दिवस अवसान दिन की समाप्ति
शाम दिवसावसान का समय – शाम ढल रही थी।
मेघमय – बादलों से भरा हुआ (आकाश)
तिमिरांचल – अँधेरा
अधर – होंठ
हास-विलास – हँसी और मुस्कुराहट का सौंदर्य
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से – मानो संध्या-सुंदरी के आँचल की तरह है।
हृदय-राज्य की रानी – संध्या मानो उस सितारे के मन रूपी साम्राज्य की रानी है
अभिषेक – मस्तक का शृंगार
अलसता की-सी लता – संध्या मानो मादक आलस्य से बनी कोमलांगिनी लता के समान है।
सखी – सहेली
नीरवता – शाम में फैली हुई खामोशी
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह – मानो संध्या-सुंदरी की सखी की तरह है।
अम्बर-पथ – आकाश के रास्ते से
अनुराग राग आलाप – प्रेम के भाव को व्यक्त करने वाली किसी राग-रागिनी को प्रारंभ करने के लिए किया गया सुर का उतार-चढ़ाव
नूपुरों – पैर का एक आभूषण जिसमें घूँघरू लगे होते हैं
व्योममण्डल – आकाश का पूरा विस्तार
जगती तल धरती अमर कमलिनी-दल – सदा खिली रहनेवाली कमलिनियों की पंखुड़ियाँ
सौंदर्य-गर्विता-सरिता – मानो अपनी सुंदरता के गौरव-भाव के कारण सदा इठला कर प्रवाहित होनेवाली नदी
अति विस्तृत वक्षःस्थल – नदी का चौड़ा पाट मानो उसका प्रशस्त और आकर्षक वक्षस्थल है
हिमगिरि-अटल-अचल – अटल हिमालय पर्वत
उत्ताल-तरंगाघात – ऊँची लहरो का उठना-गिरना और चोट करना
जलधि-प्रबल – विशाल समुद्र
प्रलय-घन-गर्जन – प्रलय के बादलों की तरह की गर्जना में
क्षिति – धरती
अनिल-अनल – हवा और विद्युत् के आवेश
मदिरा – मादकता
विस्मृति – चेतना की पीड़ा से मुक्त हो जाना
विरहाकुल कमनीय कण्ठ – विरह से व्याकुल कवि की वाणी
विहाग – रात्रि के तीसरे प्रहर में गया जानेवाला वियोग का एक राग
कविता का केंद्र बिंदु संध्या के सुंदर रूप को सुंदरी के रूप में दिखाना है। ‘संध्या सुंदरी’ कविता में छायावादी शैली की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। प्रकृति पर मनुष्य का आरोप करके कविता लिखने की प्रवृत्ति का यह सुंदर उदाहरण है। शाम होना प्रकृति की घटना है। शाम के विवरण में ‘सुंदरी’ का आरोप करते हुए कविता का विस्तार किया गया है। शाम का आना किसी सुंदरी के आगमन की तरह सुंदर और रोमानी बनाया गया है।
संध्या सुंदरी – सप्रसंग व्याख्या
पंक्तियाँ – 01
दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह सन्ध्या-सुंदरी परी-सी
धीरे धीरे धीरे,
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किंतु गंभीर नहीं है उनमें हास-विलास।
शब्दार्थ –
संध्या सुंदरी – संध्या मानो सुंदरी की तरह है।
दिवसावसान – दिवस अवसान दिन की समाप्ति
शाम दिवसावसान का समय – शाम ढल रही थी।
मेघमय – बादलों से भरा हुआ (आकाश)
तिमिरांचल – अँधेरा
अधर – होंठ
हास-विलास – हँसी और मुस्कुराहट का सौंदर्य
प्रसंग
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण निराला की कविता ‘संध्या सुंदरी’ से उद्धृत है। इसमें निराला ने ‘संध्या सुंदरी’ का चित्रण किया है। इसके लिए उन्होंने सुंदरी के रूपक का उपयोग किया है। संध्या के क्रमशः विस्तार को प्रकृति के विभिन्न घटकों में दिखाते हुए सौंदर्य की सृष्टि करना इस कविता का लक्ष्य है। कविता के अंत में एक भावुक माहौल बनाया गया है और उसे कवि की रचनात्मकता से जोड़ा गया है। संध्या सुंदरी आसमान से परी की तरह उतर रही है। उतरते समय उसका काला आँचल मानो अँधेरा फैला रहा है। वह अत्यंत शांत भाव से उतर रही है। वह अलसायी हुई-सी है। वह अपनी सखी ‘नीरवता’ के कंधे का सहारा लेकर आकाश-मार्ग से उतर रही है।
व्याख्या
कवि निराला कहते हैं कि दिन समाप्ति की तरफ चल पड़ा है। आसमान बादलों से भरा है। ऐसा लग रहा है कि मेघमय आसमान से संध्या धरती पर धीरे-धीरे उतर रही है। उसका उतरना इतना सुंदर लग रहा है मानो वह संध्या एक सुंदरी की तरह हो। आसमान से धरती पर उसका सौंदर्यपूर्ण तरीके से उतरना ऐसा आभास दे रहा है मानो कोई परी उतर रही हो। उसके आँचल का रंग अँधेरे के रंग से मिलता जुलता है। या यूँ कहें कि शाम का अँधेरा ही उसका आँचल है। संध्या सुंदरी के तिमिरांचल में किसी तरह की चंचलता या गति का आभास नहीं हो रहा है। आशय यह है कि शाम के समय हवा बिल्कुल रुकी हुई है और अँधेरा धीरे-धीरे गहरा रहा है। उस संध्या सुंदरी का आगमन पूरी तरह से निःशब्द है। यह संध्या चूँकि सुंदरी है इसलिए उसके दोनों होंठ निश्चित रूप से मधुर हैं। किंतु उनमें गंभीरता भरी है, उनमें अभी किसी तरह की हँसी का सुंदर विलास प्रकट नहीं हो रहा है।
पंक्तियाँ – 02
हँसता है तो केवल तारा एक
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से,
हृदय-राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता
किंतु कोमलता की वह कली,
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अम्बर-पथ से चली।
शब्दार्थ
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से – मानो संध्या-सुंदरी के आँचल की तरह है।
हृदय-राज्य की रानी – संध्या मानो उस सितारे के मन रूपी साम्राज्य की रानी है
अभिषेक – मस्तक का शृंगार
अलसता की-सी लता – संध्या मानो मादक आलस्य से बनी कोमलांगिनी लता के समान है।
सखी – सहेली
नीरवता – शाम में फैली हुई खामोशी
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह – मानो संध्या-सुंदरी की सखी की तरह है
अम्बर-पथ – आकाश के रास्ते से
प्रसंग
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण निराला की कविता ‘संध्या सुंदरी’ से उद्धृत है। इसमें निराला ने ‘संध्या सुंदरी’ का चित्रण किया है। इसके लिए उन्होंने सुंदरी के रूपक का उपयोग किया है। संध्या के क्रमशः विस्तार को प्रकृति के विभिन्न घटकों में दिखाते हुए सौंदर्य की सृष्टि करना इस कविता का लक्ष्य है। कविता के अंत में एक भावुक माहौल बनाया गया है और उसे कवि की रचनात्मकता से जोड़ा गया है। संध्या सुंदरी आसमान से परी की तरह उतर रही है। उतरते समय उसका काला आँचल मानो अँधेरा फैला रहा है। वह अत्यंत शांत भाव से उतर रही है। वह अलसायी हुई-सी है। वह अपनी सखी ‘नीरवता’ के कंधे का सहारा लेकर आकाश-मार्ग से उतर रही है।
व्याख्या
निराला जी इन पंक्तियों में कहते हैं कि पश्चिम दिशा में निकला हुआ शुक्र ग्रह ‘एक तारा’ की तरह दिखाई पड़ रहा है और वह हँस रहा है। वह भला प्रसन्न क्यों न हो। ऐसा लग रहा है मानो संध्या सुंदरी के, अँधेरे की तरह काले, घुँघराले बालों में उसे गुँथे जाने सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वह अपने हृदय के राज्य की रानी की तरह संध्या सुंदरी का अपनी चमक से अभिषेक कर रहा है।
संध्या सुंदरी के सौंदर्य के लिए निराला ने इस कविता में दो उपमाओं का उपयोग किया है-‘अलसता की-सी लता’ और ‘कोमलता की वह कली’। संध्या सुंदरी में परी की तरह का लास्य-भाव है मानो शृंगारोचित मादक आलस्य से वह भरी है। उसकी कोमलता और लचक किसी लता की तरह है। निराला दूसरी उपमा में कहते हैं कि वह ऐसी दिख रही है मानो कोमलता ने कली का रूप धारण कर लिया हो। रूपक के भीतर रूप बनाना छायावादी काव्य-भाषा की एक विशेषता है। निराला इस रूपक को आगे बढ़ाते हुए कुछ और रूपक गढ़ते हैं। संध्या सुंदरी अपनी सखी ‘नीरवता’ के कंधे पर अपनी बाँह डालकर किसी छाया की तरह आकाश मार्ग से चल पड़ी है। शाम की खामोशी के साथ संध्या का विस्तार हो रहा है।
पंक्तियाँ – 03
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग राग आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप चुप चुप”
है गूँज रहा सब कहीं,
व्योममण्डल में- जगती-तल में-
सोती शान्त सरोवर पर उस अमर कमलिनी-दल में-
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षःस्थल में-
धीर वीर गंभीर शिखर पर हिमगिरि- अटल-अचल में
उत्ताल-तरंगाघात,-प्रलय घन गर्जन जलधि-प्रबल में
क्षिति में जल में नभ में अनिल अनल में-
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप चुप चुप”
है गूँज रहा सब कहीं,-
और क्या है? कुछ नहीं।
शब्दार्थ
अनुराग राग आलाप – प्रेम के भाव को व्यक्त करने वाली किसी राग-रागिनी को प्रारंभ करने के लिए किया गया सुर का उतार-चढ़ाव
नूपुरों – पैर का एक आभूषण जिसमें घूँघरू लगे होते हैं
व्योममण्डल – आकाश का पूरा विस्तार
जगती तल धरती अमर कमलिनी-दल – सदा खिली रहनेवाली कमलिनियों की पंखुड़ियाँ
सौंदर्य-गर्विता-सरिता – मानो अपनी सुंदरता के गौरव-भाव के कारण सदा इठला कर प्रवाहित होनेवाली नदी
अति विस्तृत वक्षःस्थल – नदी का चौड़ा पाट मानो उसका प्रशस्त और आकर्षक वक्षस्थल है
हिमगिरि-अटल-अचल – अटल हिमालय पर्वत
उत्ताल-तरंगाघात – ऊँची लहरो का उठना-गिरना और चोट करना
जलधि-प्रबल – विशाल समुद्र
प्रलय-घन-गर्जन – प्रलय के बादलों की तरह की गर्जना में
क्षिति – धरती
अनिल-अनल – हवा और विद्युत् के आवेश
प्रसंग
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण निराला की कविता ‘संध्या सुंदरी’ से उद्धृत है। इसमें निराला ने ‘संध्या सुंदरी’ का चित्रण किया है। इसके लिए उन्होंने सुंदरी के रूपक का उपयोग किया है। संध्या के क्रमशः विस्तार को प्रकृति के विभिन्न घटकों में दिखाते हुए सौंदर्य की सृष्टि करना इस कविता का लक्ष्य है। कविता के अंत में एक भावुक माहौल बनाया गया है और उसे कवि की रचनात्मकता से जोड़ा गया है। संध्या सुंदरी आसमान से परी की तरह उतर रही है। उतरते समय उसका काला आँचल मानो अँधेरा फैला रहा है। वह अत्यंत शांत भाव से उतर रही है। वह अलसायी हुई-सी है। वह अपनी सखी ‘नीरवता’ के कंधे का सहारा लेकर आकाश-मार्ग से उतर रही है।
व्याख्या
संध्या सुंदरी आसमान से परी की तरह उतर जरूर रही है, मगर उसके हाथों में कोई वीणा नहीं है। वह प्रेम के किसी राग-रागिनी का आलाप भी नहीं ले रही है। उस परी के नूपुरों की भी कोई आवाज नहीं आ रही है। मतलब यह कि वह परी की तरह तो है, मगर उसके हाथों में न तो वीणा है और न ही उसके कंठ से प्रेम का आलाप है। परी होने के बावजूद उस संध्या सुंदरी के नूपुरों की कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ रही है। पूरे वातावरण में केवल एक शब्द अव्यक्त रूप से गूँज रहा है-‘चुप चुप चुप’। अर्थात् चारों तरफ खामोशी छायी है। खामोशी के साथ अनुगूँज की तरह ‘चुप चुप चुप’ की ध्वनि मानो पूरे आकाश में फैली है। वह धरती पर भी फैली है।
सोये हुए की तरह, शान्त तालाब में खिली हुई कमलिनियों की पंखुड़ियों पर भी मानो वही ध्वनि छायी हुई है। अपनी सुंदरता से गौरवान्वित होकर प्रवाहित होती हुई नदी के चौड़े पाट-जैसी छाती पर भी मानो यह ध्वनि अवयक्त भाव से मौजूद है। अटल रूप में खड़े हिमालय पर्वत की, धीर-वीर की तरह गंभीर चोटियों पर भी यही ध्वनि मौजूद है। प्रलय के बादलों-जैसी गर्जना को, अपने भीतर समेटे हुए समुद्र की ऊँची लहरों के आघात में, भी यह ध्वनि मौजूद है। धरती, जल, नभ, वायु और आकाशीय बिजली के आवेशित कणों में भी ‘चुप चुप चुप’ की अव्यक्त ध्वनि मौजूद है। ये शब्द सब तरफ गूँजते हुए मालूम पड़ रहे हैं, परन्तु इस बात में कुछ तथ्य भी है क्या? निराला कहते हैं कि इस बात में कोई तथ्यात्मक सत्य नहीं है-“और क्या है? कुछ नहीं।”
पंक्तियाँ – 04
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को वह सस्नेह
प्याला वह एक पिलाती,
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के वह कितने मीठे सपने।
अर्द्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती वह लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कंठ से
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।
शब्दार्थ
मदिरा – मादकता
सस्नेह – प्रेम के साथ
अर्द्धरात्रि – आधी रात
विस्मृति – चेतना की पीड़ा से मुक्त हो जाना
निश्चलता – सन्नाटा
लीन – मग्न
विरहाकुल कमनीय कण्ठ – विरह से व्याकुल कवि की वाणी
विहाग – रात्रि के तीसरे प्रहर में गया जानेवाला वियोग का एक राग
प्रसंग
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण निराला की कविता ‘संध्या सुंदरी’ से उद्धृत है। इसमें निराला ने ‘संध्या सुंदरी’ का चित्रण किया है। इसके लिए उन्होंने सुंदरी के रूपक का उपयोग किया है। संध्या के क्रमशः विस्तार को प्रकृति के विभिन्न घटकों में दिखाते हुए सौंदर्य की सृष्टि करना इस कविता का लक्ष्य है। कविता के अंत में एक भावुक माहौल बनाया गया है और उसे कवि की रचनात्मकता से जोड़ा गया है। संध्या सुंदरी आसमान से परी की तरह उतर रही है। उतरते समय उसका काला आँचल मानो अँधेरा फैला रहा है। वह अत्यंत शांत भाव से उतर रही है। वह अलसायी हुई-सी है। वह अपनी सखी ‘नीरवता’ के कंधे का सहारा लेकर आकाश-मार्ग से उतर रही है।
व्याख्या
संध्या सुंदरी मदिरा की नदी बहाती हुई-सी आती है। उसका आना मानो एक तरह की मादकता को वातावरण में घोल देता है। वह संध्या सुंदरी थके हुए प्राणियों को मानो स्नेह का एक प्याला पिला देती है। फिर उन्हें अपनी गोद में लेकर सुलाने लगती है। प्राणियों को सुलाने के क्रम में, चेतना की पीड़ा से मुक्त करने के लिए, विस्मृति के मीठे सपने दिखाती है।
इस तरह धीरे-धीरे संध्या की जगह अब रात लेने लगती है। वह रात की गहराई में लीन होती जाती है। आधी रात के निश्चल वातावरण में मानो संध्या सुंदरी एकदम से खोकर लीन हो जाती है। इन तमाम प्रकरणों से गुजरते हुए कवि के मानसिक जगत में प्रेम का भाव जागृत अवस्था में आ जाता है। आधी रात गुजर जाने पर, विरह से आकुल-व्याकुल उसके सुंदर-कोमल कंठ से, विहाग का राग अपने आप निकल पड़ता है।
‘संध्या सुंदरी’ का महत्त्व इस बात में है कि इसमें प्रकृति में मनुष्य को देखने का एक सुंदर प्रयास किया गया है। मनुष्य के कोमल भावों को व्यक्त करने का यह रोमानी तरीका निश्चय ही मनोरम है।
- भाव पक्ष
अद्भुत मानवीकरण – निराला जी ने निर्जीव संध्या को एक सजीव ‘परी’ और ‘सुंदरी’ के रूप में चित्रित किया है। वह केवल समय का एक अंतराल नहीं, बल्कि एक चेतना है जो आकाश से उतरकर धरती को अपनी आगोश में लेती है।
प्रकृति और नारी का तादात्म्य – छायावाद की विशेषता के अनुरूप यहाँ प्रकृति का वर्णन नारी सौंदर्य के माध्यम से किया गया है। संध्या की कोमलता, उसके काले बाल (अंधकार) और उसकी सखी नीरवता (शांति) नारी सुलभ गरिमा को दर्शाते हैं।
शांति और विस्मृति का संदेश – यह कविता केवल सौंदर्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि जीवन की थकान के बाद मिलने वाली शांति का बोध कराती है। संध्या यहाँ “विस्मृति के मीठे सपने” दिखाने वाली एक करुणामयी माँ या प्रेयसी के रूप में उभरती है।
- कला पक्ष
भाषा-शैली –
कविता की भाषा तत्सम प्रधान खड़ी बोली है।
इसमें शब्द-मैत्री और नाद-सौंदर्य (Sound Quality) का अनूठा संगम है। जैसे— “धीरे-धीरे-धीरे”, “रुन-झुन, रुन-झुन”।
अलंकार योजना –
मानवीकरण अलंकार – पूरी कविता का आधार ही मानवीकरण है।
उपमा और रूपक – “परी-सी”, “अलसता की-सी लता”, “कोमलता की कली” में उपमा और रूपक का सुंदर प्रयोग है।
पुनरुक्ति प्रकाश – शब्दों की आवृत्ति (जैसे – चुप-चुप, मधुर-मधुर) वातावरण में गहराई उत्पन्न करती है।
बिम्ब विधान (Imagery) –
निराला जी ने ‘दृश्य बिम्ब’ (Visual Imagery) और ‘श्रव्य बिम्ब’ (Auditory Imagery) का प्रयोग किया है। “बादलों वाले आसमान से उतरना” एक दृश्य है, जबकि “चुप-चुप-चुप” की गूँज एक श्रव्य अनुभूति पैदा करती है।
छंद और लय –
यह मुक्त छंद (Free Verse) की कविता है, जिसके प्रवर्तक स्वयं निराला जी थे। छंदों के बंधन में न बँधकर भी इसमें एक आंतरिक लय और संगीत है।
- दार्शनिकता (Philosophical Depth)
कविता के अंत में ‘विहाग’ राग का फूटना कवि की वैयक्तिक वेदना और दार्शनिकता को दर्शाता है। संध्या का मौन अंततः कवि की अंतरात्मा की आवाज़ को जगा देता है। यह ‘शून्यता’ से ‘सृजन’ की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया है।

