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सिक्का बदल गया – कृष्णा सोबती

sikka badal gaya by krishna sobati

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कृष्णा सोबती – परिचय

कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी 1925 को गुजरात के उस हिस्से में हुआ था जो भारत विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान में चला गया। तदुपरांत इन्होंने दिल्ली को अपनी कर्मस्थली बनाई और मृत्यु-पर्यंत दिल्ली में ही रहीं। लगभग 93 वर्ष की अवस्था में 25 जनवरी, 2019 को इनका निधन हुआ। इन्होंने कहानी, उपन्यास, संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत जैसी विभिन्न साहित्यिक विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। साहित्यिक योगदान के लिए 2017 में इन्हें हिंदी साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं – 

कहानी संग्रह 

बादलों के घेरे (1980) 

डार से बिछड़ी (1958) 

मित्रो मरजानी (1967) 

यारों के यार (1968) 

तीन पहाड़ (1968) 

ए लड़की (1991) 

जैनी मेहरबान सिंह (प्रकाशन वर्ष – 2007) 

उपन्यास 

हम हशमत (तीन भागों में) 

सोबती एक सोहबत 

शब्दों के आलोक में 

सोबती वैद संवाद 

जिंदगीनामा – 1993 

दिलो दानिश – 1993 

समय सरगम – 2000 

मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में – 2017 

लेखक का जनतंत्र – 2018 

मार्फत दिल्ली – 2018 

बुद्ध का कमंडल : लद्दाख 

सम्मान और पुरस्कार 

शलाका सम्मान 2000 – 2001 का (हिंदी अकादमी दिल्ली की ओर से) 

53वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017 का) 

1980 – साहित्य अकादमी पुरस्कार 

1981 – शिरोमणि पुरस्कार (पंजाब सरकार द्वारा) 

1982 – साहित्य अकादमी अवार्ड 

1996 – साहित्य अकादमी फेलोशिप 

1999 – कछा चूड़ामणि पुरस्कार 

निधन – 25 जनवरी 2019 

 

 

सिक्का बदल गया
कृष्णा सोबती
खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुँची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के पर्दे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रखे और ‘श्री…राम, श्री…राम’ करती पानी में हो ली। अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनींदी आँखों पर छींटे दिए और पानी से लिपट गई!
चनाब का पानी आज भी पहले-सा ही सर्द था, लहरें लहरों को चूम रही थीं। वह दूर—सामने कश्मीर की पहाड़ियों से बर्फ़ पिघल रही थी। उछल-उछल आते पानी के भँवरों से टकराकर कगारे गिर रहे थे, लेकिन दूर-दूर तक बिछी रेत आज न जाने क्यों ख़ामोश लगती थी! शाहनी ने कपड़े पहने, इधर-उधर देखा, कहीं किसी की परछाई तक न थी। पर नीचे रेत में अगणित पाँवों के निशान थे। वह कुछ सहम-सी उठी!
आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में न जाने क्यों कुछ भयावना-सा लग रहा है। वह पिछले पचास वर्षों से यहाँ नहाती आ रही है। कितना लंबा अरसा है! शाहनी सोचती है, एक दिन इसी दरिया के किनारे वह दुलहिन बनकर उतरी थी। और आज…आज शाहजी नहीं, उसका वह पढ़ा-लिखा लड़का नहीं, आज वह अकेली है, शाहजी की लंबी-चौड़ी हवेली में अकेली है। पर नहीं—यह क्या सोच रही है वह सवेरे-सवेरे! अभी भी दुनियादारी से मन नहीं फिरा उसका! शाहनी ने लंबी साँस ली और ‘श्रीराम, श्रीराम’, करती बाजरे के खेतों से होती घर की राह ली। कहीं-कहीं लिपे-पुते आँगनों पर से धुआँ उठ रहा था। टन टन—बैलों, की घंटियाँ बज उठती हैं। फिर भी…फिर भी…कुछ बँधा-बँधा-सा लग रहा है। ‘जम्मीवाला’ कुआँ भी आज नहीं चल रहा। ये शाहजी की ही असामियाँ हैं। शाहनी ने नज़र उठाई। यह मीलों फैले खेत अपने ही हैं। भरी-भराई नई फ़सल को देखकर शाहनी किसी अपनत्व के मोह में भीग गई। यह सब शाहजी की बरक़तें हैं। दूर-दूर गाँवों तक फैली हुई ज़मीनें, ज़मीनों में कुएँ—सब अपने हैं। साल में तीन फ़सल, ज़मीन तो सोना उगलती है। शाहनी कुएँ की ओर बढ़ी, आवाज़ दी, “शेरे, शेरे, हुसैना हुसैना…।”
शेरा शाहनी का स्वर पहचानता है। वह न पहचानेगा! अपनी माँ जैना के मरने के बाद वह शाहनी के पास ही पलकर बड़ा हुआ। उसने पास पड़ा गँडासा ‘शटाले’ के ढेर के नीचे सरका दिया। हाथ में हुक्का पकड़कर बोला, “ऐ हुसैना-हुसैना…” शाहनी की आवाज़ उसे कैसे हिला गई है! अभी तो वह सोच रहा था कि उस शाहनी की ऊँची हवेली की अँधेरी कोठरी में पड़ी सोने-चाँदी की संदूक़चियाँ उठाकर—कि तभी ‘शेरे शेरे’ शेरा ग़ुस्से से भर गया। किस पर निकाले अपना क्रोध? शाहनी पर! चीख़कर बोला “ऐ मर गईं क्या। रब्ब तुम्हें मौत दे…।”
हुसैना आटेवाली कनाली एक ओर रख, जल्दी-जल्दी बाहर निकल आई—“आती हूँ, आती हूँ—क्यों छा वेले (सुबह-सुबह) तड़पता एँ?”
अब तक शाहनी नज़दीक पहुँच चुकी थी। शेरे की तेज़ी सुन चुकी थी। प्यार से बोली, “हुसैना, यह वक़्त लड़ने का है? वह पागल है तो तू ही जिगरा कर लिया कर।”
“जिगरा!” हुसैना ने मान भरे स्वर में कहा, शाहनी, लड़का आख़िर लड़का ही है। कभी शेरे से भी पूछा है कि मुँह अँधेरे ही क्यों गालियाँ बरसाई हैं इसने?” शाहनी ने लाड़ से हुसैना की पीठ पर हाथ फेरा, हँसकर बोली, “पगली मुझे तो लड़के से बहू प्यारी है! शेरे”
“हाँ शाहनी!”
“मालूम होता है, रात को कुल्लूवाल के लोग आए हैं यहाँ?” शाहनी ने गंभीर स्वर में कहा।
शेरे ने ज़रा रुककर, घबराकर कहा, “नहीं—शाहनी…” शेरे के उत्तर की अनसुनी कर शाहनी ज़रा चिंतित स्वर से बोली, “जो कुछ भी हो रहा है, अच्छा नहीं। शेरे, आज शाहजी होते तो शायद कुछ बीच-बचाव करते। पर…” शाहनी कहते-कहते रुक गई। आज क्या हो रहा है। शाहनी को लगा जैसे जी भर-भर आ रहा है। शाहजी को बिछुड़े कई साल बीत गए, पर—पर आज कुछ पिघल रहा है—शायद पिछली स्मृतियाँ…आँसुओं को रोकने के प्रयत्न में उसने हुसैना की ओर देखा और हल्के-से हँस पड़ी। और शेरा सोच ही रहा है, क्या कह रही है शाहनी आज! आज शाहनी क्या, कोई भी कुछ नहीं कर सकता। यह होके रहेगा—क्यों न हो? हमारे ही भाई-बंदों से सूद ले-लेकर शाहजी सोने की बोरियाँ तोला करते थे। प्रतिहिंसा की आग शेरे की आँखों में उतर आई। गँड़ासे की याद हो आई। शाहनी की ओर देखा—नहीं-नहीं, शेरा इन पिछले दिनों में तीस-चालीस क़त्ल कर चुका था। पर वह ऐसा नीच नहीं… सामने बैठी शाहनी नहीं, शाहनी के हाथ उसकी आँखों में तैर गए। वह सर्दियों की रातें—कभी-कभी शाहजी की डाँट खाके वह हवेली में पड़ा रहता था। और फिर लालटेन की रोशनी में वह देखता है, शाहनी के ममता-भरे हाथ दूध का कटोरा थामे हुए ‘शेरे-शेरे, उठ, पी ले।’ शेरे ने शाहनी के झुर्रियाँ पड़े मुँह की ओर देखा तो शाहनी धीरे-से मुस्करा रही थी। शेरा विचलित हो गया—’आख़िर शाहनी ने क्या बिगाड़ा है हमारा? शाहजी की बात शाहजी के साथ गई, वह शाहनी को ज़रूर बचाएगा। लेकिन कल रात वाला मशवरा! वह कैसे मान गया था फिरोज़ की बात! “सब कुछ ठीक हो जाएगा…सामान बाँट लिया जाएगा!”
“शाहनी चलो तुम्हें घर तक छोड़ आऊँ!”
शाहनी उठ खड़ी हुई। किसी गहरी सोच में चलती हुई शाहनी के पीछे-पीछे मज़बूत क़दम उठाता शेरा चल रहा है। शंकित-सा-इधर उधर देखता जा रहा है। अपने साथियों की बातें उसके कानों में गूँज रही हैं। पर क्या होगा शाहनी को मारकर?
“शाहनी!”
“हाँ शेरे।”
शेरा चाहता है कि सिर पर आने वाले ख़तरे की बात कुछ तो शाहनी को बता दे, मगर वह कैसे कहे?”
“शाहनी”
शाहनी ने सिर ऊँचा किया। आसमान धुएँ से भर गया था। “शेरे”
शेरा जानता है यह आग है। जबलपुर में आज आग लगनी थी लग गई! शाहनी कुछ न कह सकी। उसके नाते रिश्ते सब वहीं हैं।
हवेली आ गई। शाहनी ने शून्य मन से ड्योढ़ी में क़दम रखा। शेरा कब लौट गया उसे कुछ पता नहीं। दुर्बल-सी देह और अकेली, बिना किसी सहारे के! न जाने कब तक वहीं पड़ी रही शाहनी। दुपहर आई और चली गई। हवेली खुली पड़ी है। आज शाहनी नहीं उठ पा रही। जैसे उसका अधिकार आज स्वयं ही उससे छूट रहा है! शाहजी के घर की मालकिन…लेकिन नहीं, आज मोह नहीं हो रहा। मानो पत्थर हो गई हो। पड़े-पड़े साँझ हो गई, पर उठने की बात फिर भी नहीं सोच पा रही। अचानक रसूली की आवाज़ सुनकर चौंक उठी।
“शाहनी-शाहनी, सुनो ट्रकें आती हैं लेने?”
“ट्रकें…?” शाहनी इसके सिवाय और कुछ न कह सकी। हाथों ने एक-दूसरे को थाम लिया। बात-की-बात में ख़बर गाँव भर में फैल गई। लाह बीबी ने अपने विकृत कंठ से कहा, शाहनी, “आज तक कभी ऐसा न हुआ, न कभी सुना। ग़ज़ब हो गया, अँधेर पड़ गया।”
शाहनी मूर्तिवत् वहीं खड़ी रही। नवाब बीबी ने स्नेह-सनी उदासी से कहा, “शाहनी, हमने तो कभी न सोचा था!”
शाहनी क्या कहे कि उसी ने ऐसा सोचा था। नीचे से पटवारी बेगू और जैलदार की बातचीत सुनाई दी। शाहनी समझी कि वक़्त आन पहुँचा। मशीन की तरह नीचे उतरी, पर ड्योढ़ी न लाँघ सकी। किसी गहरी, बहुत गहरी आवाज़ से पूछा” कौन? कौन हैं वहाँ?”
कौन नहीं है आज वहाँ? सारा गाँव है, जो उसके इशारे पर नाचता था कभी। उसकी असामियाँ हैं जिन्हें उसने अपने नाते-रिश्तों से कभी कम नहीं समझा। लेकिन नहीं, आज उसका कोई नहीं, आज वह अकेली है! यह भीड़-की-भीड़, उनमें कुल्लूवाल के जाट। वह क्या सुबह ही न समझ गई थी?
बेगू पटवारी और मसीत के मुल्ला इस्माइल ने जाने क्या सोचा। शाहनी के निकट आ खड़े हुए। बेगू आज शाहनी की ओर देख नहीं पा रहा। धीरे-से ज़रा गला साफ़ करते हुए कहा, ‘शाहनी, रब्ब को यही मंजूर था।’
शाहनी के क़दम डोल गए। चक्कर आया और दीवार के साथ लग गई। इसी दिन के लिए छोड़ गए थे शाहजी उसे? बेजान-सी शाहनी की ओर देखकर बेगू सोच रहा है, क्या गुज़र रही है शाहनी पर! मगर क्या हो सकता है! सिक्का बदल गया है…
शाहनी का घर से निकलना छोटी-सी-बात नहीं। गाँव-का-गाँव खड़ा है हवेली के दरवाज़े से लेकर उस दारे तक जिसे शाहजी ने अपने पुत्र की शादी में बनवा दिया था। गाँव के सब फ़ैसले, सब मशविरे यहीं होते रहें हैं। इस बड़ी हवेली को लूट लेने की बात भी यहीं सोची गई थी! यह नहीं कि शाहनी कुछ न जानती हो। वह जानकर भी अनजान बनी रही। उसने कभी बैर नहीं जाना। किसी का बुरा नहीं किया। लेकिन बूढ़ी शाहनी यह नहीं जानती कि सिक्का बदल गया है…
देर हो रही थी। थानेदार दाऊद ख़ाँ ज़रा अकड़कर आगे आया और ड्योढ़ी पर खड़ी जड़ निर्जीव छाया को देखकर ठिठक गया! वही शाहनी है जिसके शाहजी उसके लिए दरिया के किनारे खेमे लगवा दिया करते थे। यह तो वही शाहनी है जिसने उसकी मँगेतर को सोने के कनफूल दिए थे मुँह दिखाई में। अभी उसी दिन जब वह ‘लीग’ के सिलसिले में आया था तो उसने उद्दंडता से कहा था, ‘शाहनी, भागोवाल मसीत बनेगी, तीन सौ रुपया देना पड़ेगा।’ शाहनी ने अपने उसी सरल स्वभाव से तीन सौ रुपए दिए थे। और आज…?
“शाहनी!” दाऊद खाँ ने आवाज़ दी। वह थानेदार है, नहीं तो उसका उसका स्वर शायद आँखों में उतर आता।
शाहनी गुम-सुम, कुछ न बोल पाई।
“शाहनी!” ड्योढ़ी के निकट जाकर बोला, “देर हो रही है शाहनी। (धीरे-से) कुछ साथ रखना हो तो रख लो। कुछ साथ बाँध लिया है? सोना-चाँदी।”
शाहनी अस्फुट स्वर से बोली, “सोना-चाँदी!” ज़रा ठहरकर सादगी से कहा, “सोना-चाँदी! बच्चा वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक ज़मीन में बिछा है।”
दाऊद ख़ाँ लज्जित-सा हो गया।—“शाहनी, तुम अकेली हो, अपने पास कुछ होना ज़रूरी है। कुछ नक़दी ही रख लो। वक़्त का कुछ पता नहीं…।”
“वक़्त?” शाहनी अपनी गीली आँखों से हँस पड़ी—“दाऊद ख़ाँ, इससे अच्छा वक़्त देखने के लिए क्या मैं ज़िंदा रहूँगी!” किसी गहरी वेदना और तिरस्कार से कह दिया शाहनी ने।
दाऊद ख़ाँ निरुत्तर है। साहस कर बोला, “शाहनी, …कुछ नक़दी ज़रूरी है।”
“नहीं बच्चा, मुझे इस घर से” शाहनी—का गला रुंध गया—“नक़दी प्यारी नहीं। यहाँ की नक़दी यहीं रहेगी।”
शेरा आन खड़ा हुआ पास। दूर खड़े-खड़े उसने दाउद खाँ को शाहनी के पास देखा तो शक गुज़रा कि हो ना हो कुछ मार रहा है शाहनी से। “ख़ाँ साहिब देर हो रही है…”
शाहनी चौंक पड़ी। देर—मेरे घर में मुझे देर! आँसुओं की भँवर में न जाने कहाँ से विद्रोह उमड़ पड़ा। मैं पुरखों के इस बड़े घर की रानी और यह मेरे ही अन्न पर पले हुए…नहीं, यह सब कुछ नहीं। ठीक है—देर हो रही है। देर हो रही है। शाहनी के कानो में जैसे यही गूँज रहा है—देर हो रही है—पर नहीं, शाहनी रो-रोकर नहीं, शान से निकलेगी इस पुरखों के घर से, मान से लाँघेगी यह देहरी, जिस पर एक दिन वह रानी बनकर आ खड़ी हुई थी। अपने लड़खड़ाते क़दमों को सँभालकर शाहनी ने दुपट्टे से आँखें पोछीं और ड्योढ़ी से बाहर हो गई। बड़ी-बूढ़ियाँ रो पड़ीं। उनके दुःख सुख की साथिन आज इस घर से निकल पड़ी है। किसकी तुलना हो सकती थी इसके साथ! ख़ुदा ने सब कुछ दिया था, मगर—मगर दिन बदले, वक़्त बदले…
शाहनी ने दुपट्टे से सिर ढाँपकर अपनी धुँधली आँखों में से हवेली को अंतिम बार देखा। शाहजी के मरने के बाद भी जिस कुल की अमानत को उसने सहेजकर रखा, आज वह उसे धोखा दे गई। शाहनी ने दोनों हाथ जोड़ लिए—यही अंतिम दर्शन था, यही अंतिम प्रणाम था। शाहनी की आँखें फिर कभी इस ऊँची हवेली को न देखी पाएँगी। प्यार ने ज़ोर मारा—सोचा, एक बार घूम-फिरकर पूरा घर क्यों न देख आई मैं? जी छोटा हो रहा है, पर जिनके सामने हमेशा बड़ी बनी रही है उनके सामने वह छोटी न होगी। इतना ही ठीक है। सब हो चुका। सिर झुकाया। ड्योढ़ी के आगे कुलवधू की आँखों से निकलकर कुछ बूँदें चू पड़ीं। शाहनी चल दी—ऊँचा-सा भवन पीछे खड़ा रह गया। दाऊद ख़ाँ, शेरा, पटवारी, जैलदार और छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े-मर्द औरतें सब पीछे-पीछे।
ट्रकें अब तक भर चुकी थीं। शाहनी अपने को खींच रही थी। गाँववालों के गलों में जैसे धुआँ उठ रहा है। शेरे, ख़ूनी शेरे का दिल टूट रहा है। दाऊद ख़ाँ ने आगे बढ़कर ट्रक का दरवाज़ा खोला। शाहनी बढ़ी। इस्माइल ने आगे बढ़कर भारी आवाज़ से कहा, “शाहनी, कुछ कह जाओ। तुम्हारे मुँह से निकली आसीस झूठ नहीं हो सकती।” और अपने साफ़े से आँखों का पानी पोंछ लिया। शाहनी ने उठती हुई हिचकी को रोककर रुँधे-रुँधे से कहा, “रब्ब तुम्हें सलामत रक्खे बच्चा, ख़ुशियाँ बक्शे…।”
वह छोटा-सा जनसमूह रो दिया। ज़रा भी दिल में मैल नहीं शाहनी के। और हम—हम शाहनी को नहीं रख सके। शेरे ने बढ़कर शाहनी के पाँव छुए—“शाहनी, कोई कुछ नहीं कर सका, राज ही पलट गया।” शाहनी ने काँपता हुआ हाथ शेरे के सिर पर रखा और रुक-रुककर कहा, “तुम्हें भाग लगे चन्ना।” दाऊद ख़ाँ ने हाथ का संकेत किया। कुछ बड़ी-बूढ़ियाँ शाहनी के गले लगीं और ट्रक चल पड़ी।
अन्न-जल उठ गया। वह हवेली, नई बैठक, ऊँचा चौबारा, बड़ा ‘पसार’ एक-एक करके घूम रहे हैं शाहनी की आँखों में! कुछ पता नहीं, ट्रक चल रहा है या वह स्वयं चल रही है। आँखें बरस रही हैं। दाऊद ख़ाँ विचलित होकर देख रहा है इस बूढ़ी शाहनी को। कहाँ जाएगी अब वह?
“शाहनी, मन में मैल न लाना। कुछ कर सकते तो उठा न रखते! वक़्त ही ऐसा है। राज पलट गया है, सिक्का बदल गया है…”
रात को शाहनी जब कैंप में पहुँचकर ज़मीन पर पड़ी तो लेटे-लेटे आहत मन से सोचा—‘राज पलट गया है…’ सिक्का क्या बदलेगा? वह तो मैं वहीं छोड़ आई…।’
और शाहजी की शाहनी की आँखें और भी गीली हो गईं!
आसपास के हरे-हरे खेतों से घिरे गाँवों में रात ख़ून बरसा रही थी।
शायद राज पलटा भी खा रहा था और—सिक्का बदल रहा था…

 

 

पृष्ठभूमि

कृष्णा सोबती द्वारा लिखित कहानी ‘सिक्का बदल गया’ हिंदी साहित्य की उन कालजयी रचनाओं में से एक है, जो भारत-विभाजन (1947) की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह कहानी केवल एक राजनैतिक घटना का विवरण नहीं है, बल्कि यह मानवीय संबंधों के टूटने और बिखरने की एक मर्मस्पर्शी दास्ताँ है।

  1. पृष्ठभूमि

इसका कहानी प्रथम प्रकाशन 1948 में प्रतीक नामक पत्रिका में हुआ था। यह कहानी 1947 के भारत-विभाजन के समय की है। पश्चिमी पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) के एक गाँव में रहने वाली एक संपन्न हिंदू महिला, शाहनी के जीवन के अंतिम पलों को दिखाया गया है जब उसे अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ता है।

  1. कथानक

कहानी की नायिका शाहनी है, जो गाँव की सबसे प्रतिष्ठित और अमीर महिला है। उसके पति (शाहजी) अब नहीं रहे। उसने गाँव के कई लोगों (जैसे शेरा) को पाल-पोसकर बड़ा किया है। विभाजन की घोषणा के साथ ही गाँव का माहौल बदल जाता है। कल तक जो लोग शाहनी का सम्मान करते थे, आज वे ही उसकी हवेली को लूटने और उसे गाँव से बाहर निकालने को तैयार हैं। अंततः, शाहनी को भारी मन से, केवल एक दुपट्टे में अपनी यादें समेटकर, ट्रक में बैठकर कैंप की ओर जाना पड़ता है।

  1. शीर्षक की सार्थकता

‘सिक्का बदल गया’ का अर्थ है—वक्त बदल जाना या सत्ता का पलट जाना। पहले शाहजी का सिक्का चलता था अर्थात् उनका राज था, सम्मान था।

अब नया ‘सिक्का’ (नई हुकूमत/पाकिस्तान) आ गया है, जहाँ शाहनी जैसी पुरानी मालकिन अब केवल एक ‘शरणार्थी’ है। यह शीर्षक मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को भी दर्शाता है।

  1. मुख्य संवेदना

विस्थापन का दर्द – अपनी जड़ों, घर और मिट्टी से बिछड़ने की पीड़ा।

मानवीय रिश्तों का अंत – मज़हब और राजनीति के कारण पुराने प्रेम और वफ़ादारी का खत्म हो जाना।

स्त्री का स्वाभिमान – विपरीत परिस्थितियों में भी शाहनी का अपनी गरिमा और ममता को न छोड़ना।

 

 

सृजन के पीछे की प्रेरणा

कृष्णा सोबती की कहानी ‘सिक्का बदल गया’ के सृजन के पीछे की प्रेरणा अत्यंत व्यक्तिगत और ऐतिहासिक है। लेखिका ने इस कहानी को केवल कल्पना के आधार पर नहीं, बल्कि अपने स्वयं के अनुभवों और उस दौर की भयावह हकीकत के आधार पर लिखा है।

  1. लेखिका का अपना भोगा हुआ यथार्थ

कृष्णा सोबती का जन्म गुजरात (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) में हुआ था। विभाजन के समय उन्हें भी अपनी मिट्टी, अपना घर और अपनी जड़ों को छोड़कर भारत आना पड़ा था। ‘शाहनी’ के चरित्र में कहीं न कहीं लेखिका ने उन हज़ारों महिलाओं के दर्द को पिरोया है, जिन्हें उन्होंने अपनी आँखों से उजड़ते देखा था। यह कहानी उनके अपने विस्थापन (Displacement) की मानसिक और भावनात्मक उपज है।

  1. इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी (1947 का विभाजन)

1947 में भारत-पाकिस्तान का बँटवारा केवल मानचित्र पर खींची गई एक लकीर नहीं थी, बल्कि यह रिश्तों, संस्कृतियों और साझा विरासत का बँटवारा था। लेखिका इस बात से बेहद प्रभावित और आहत थीं कि कैसे रातों-रात पड़ोसी, दुश्मन बन गए। इसी ऐतिहासिक और सामाजिक बदलाव को दर्ज करने की प्रेरणा ने इस कहानी को जन्म दिया।

  1. मानवीय संबंधों का बदलता स्वरूप

लेखिका इस बात को गहराई से महसूस करती थीं कि राजनैतिक सत्ता (सिक्का) बदलते ही इंसान की नैतिकता कैसे बदल जाती है। शाहनी और शेरा का माँ-पुत्र जैसा रिश्ता भी सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ने लगता है। इस मनोवैज्ञानिक बदलाव को पकड़ना और समाज को दिखाना ही उनके सृजन का मुख्य उद्देश्य था।

  1. स्त्री-दृष्टिकोण और उसकी गरिमा

विभाजन पर बहुत कुछ लिखा गया, लेकिन कृष्णा सोबती ने एक बुज़ुर्ग स्त्री अर्थात् शाहनी के माध्यम से उस त्रासदी को देखा। उनकी प्रेरणा यह दिखाना थी कि एक स्त्री, जो घर की धुरी होती है, जब वही बेघर होती है तो उसका पूरा संसार कैसे ढह जाता है। शाहनी की उदारता और उसका स्वाभिमान लेखिका की उस अटूट श्रद्धा का परिणाम है जो वे मानवीय मूल्यों में रखती थीं।

कहानी के शीर्षक की प्रेरणा

कहानी का शीर्षक ‘सिक्का बदल गया’ एक मुहावरे की तरह प्रयोग हुआ है। इसकी प्रेरणा इस विचार से आई कि सत्ता परिवर्तन (Power Shift) केवल सरकारें नहीं बदलता, बल्कि वह मनुष्य की पहचान और उसके अस्तित्व को भी पलट देता है। जो कल तक ‘दाता’ था, वह आज ‘याचक’ (भिखारी) बन गया—यही इस कहानी के सृजन की मूल प्रेरणा है।

पात्र परिचय

“सिक्का बदल गया” दरअसल उस अविश्वास की कहानी है जहाँ बरसों का पुराना ‘सिक्का’ अर्थात् भरोसा और प्यार अचानक अमान्य (Demonetized) हो जाता है।

पात्र परिचय

कृष्णा सोबती द्वारा रचित कहानी ‘सिक्का बदल गया’ भारत-विभाजन की त्रासदी पर आधारित एक मार्मिक कहानी है। इसके प्रमुख पात्रों और उनकी विशेषताओं का विवरण कुछ इस प्रकार है –

  1. शाहनी (मुख्य पात्र)

शाहनी इस कहानी की केंद्रीय पात्र है। वह गाँव की एक प्रतिष्ठित और संपन्न महिला है, जो विभाजन के कारण अपनी जड़ों से उखड़ने को मजबूर है।

ममतामयी और उदार – शाहनी का हृदय दया और ममता से भरा है। उसने शेरे जैसे अनाथ बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया है और गाँव वालों की हमेशा मदद की है।

स्वाभिमानी – वह अंत तक अपना स्वाभिमान बनाए रखती है। जब थानेदार उसे गहने या नकदी साथ रखने को कहता है, तो वह यह कहकर मना कर देती है कि “मेरा सोना तो एक-एक ज़मीन में बिछा है।” वह रोकर नहीं बल्कि शान से अपने घर से निकलना चाहती है।

धार्मिक और सहनशील – वह ईश्वर पर अटूट विश्वास रखती है और कठिन समय में भी किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखती। जाते समय भी वह सबको दुआएँ देकर जाती है।

अकेलापन – पति (शाहजी) और पुत्र के न होने के कारण वह हवेली में अकेली है, जो उसकी विवशता को और गहरा बनाता है।

  1. शेरा

शेरा शाहनी का वफ़ादार सेवक रहा है, जिसे शाहनी ने बेटे की तरह पाला है, लेकिन बदलती परिस्थितियों में वह भटक जाता है।

मानसिक द्वंद्व – शेरा के चरित्र में गहरा अंतर्द्वंद्व (Conflict) है। एक तरफ वह शाहनी को लूटने की योजना बनाता है, तो दूसरी तरफ शाहनी की ममता उसे भावुक कर देती है।

हिंसक और विद्रोही – वह विभाजन के दंगों में सक्रिय है और कई हत्याएँ कर चुका है। वह शाहजी के पुराने ऋणों (कर्ज़ और सूद) का बदला लेना चाहता है।

अंतरात्मा का जागना – अंत में जब वह शाहनी के झुर्रियों भरे चेहरे को देखता है, तो उसका दिल पिघल जाता है। वह अंत में शाहनी के पैर छूकर अपनी बेबसी ज़ाहिर करता है।

  1. दाऊद खाँ (थानेदार)

दाऊद खाँ सरकारी व्यवस्था और कर्तव्य के बीच फँसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

कर्तव्यपरायण परंतु भावुक – वह पुलिस विभाग में है और उसे शाहनी को कैंप पहुँचाने की ज़िम्मेदारी मिली है। वह अपनी ड्यूटी कर रहा है, लेकिन शाहनी के प्रति उसके मन में गहरा सम्मान है।

कृतज्ञ – वह उस समय को याद करता है जब शाहनी ने उसकी मँगेतर को मुँह दिखाई में सोने के कनफूल दिए थे।

असहाय – वह चाहता है कि शाहनी कुछ धन साथ ले जाए ताकि उसे आगे कष्ट न हो, लेकिन वह समय के आगे विवश है।

  1. हुसैना

हुसैना शेरे की पत्नी है और शाहनी के प्रति सम्मान का भाव रखती है।

व्यावहारिक – वह शेरे के गुस्से और उसके बदलते व्यवहार को समझती है।

सेवाभावी – वह शाहनी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करती है और शेरे की कड़वाहट को कम करने की कोशिश करती है।

  1. अन्य गौण पात्र

बेगू पटवारी और इस्माइल – ये गाँव के प्रभावशाली लोग हैं। वे जानते हैं कि शाहनी के साथ अन्याय हो रहा है, लेकिन ‘सिक्का बदल जाने’ अर्थात् सत्ता परिवर्तन के कारण वे चुप रहने और उसे विदा करने को मजबूर हैं।

नवाब बीबी और लाली – गाँव की ये औरतें शाहनी की विदाई पर दुखी हैं, जो दर्शाता है कि शाहनी ने सबके साथ मधुर संबंध बनाए रखे थे।

मुख्य संदेश – ‘सिक्का बदल गया’

इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने स्पष्ट किया है कि जब सत्ता और राजनीति (सिक्का) बदलती है, तो सदियों पुराने मानवीय रिश्ते और प्रेम भी पीछे छूट जाते हैं। शाहनी जैसी प्रतिष्ठित महिला भी अपने ही घर में शरणार्थी बन जाती है।

 

 

मूल संवेदना

कृष्णा सोबती द्वारा रचित ‘सिक्का बदल गया’ विभाजन की त्रासदी पर आधारित एक अत्यंत भावुक कहानी है। यह कहानी केवल देश के बँटवारे की नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों और सत्ता के बदलने की कहानी है।

  1. सुबह की शांति और बदलता परिवेश

कहानी की शुरुआत पंजाब के चिनाब दरिया के किनारे एक सुबह से होती है। शाहनी, जो गाँव के दिवंगत ज़मींदार शाहजी की पत्नी है, हर रोज़ की तरह दरिया में स्नान करने जाती है। सूर्य को जल देते समय उसे रेत पर अनगिनत पैरों के निशान दिखते हैं, जिससे वह सहम जाती है। उसे वातावरण में एक अजीब सी खामोशी और डर महसूस होता है।

  1. पुरानी यादें और वर्तमान का अकेलापन

नहाकर लौटते हुए शाहनी अपनी पिछली ज़िंदगी के बारे में सोचती है। वह पिछले पचास सालों से यहाँ रह रही है। एक समय था जब वह दुल्हन बनकर इस गाँव में आई थी। तब घर में शाहजी थे, उनका पढ़ा-लिखा लड़का था और पूरे इलाके में उनकी धाक थी। लेकिन आज वह अकेली है। उसके पास हज़ारों एकड़ ज़मीन है, कुएँ हैं और सोने उगलने वाले खेत हैं, लेकिन उसका अपना कोई नहीं है।

  1. शेरे का अंतर्द्वंद्व

शाहनी जब घर लौटती है, तो वह शेरे को आवाज़ देती है। शेरा वह लड़का है जिसे शाहनी ने अपनी औलाद की तरह पाला है। लेकिन विभाजन की आग ने शेरे के मन में ज़हर भर दिया है। वह अपनी माँ जैसी शाहनी की हत्या करने और उसकी हवेली लूटने की योजना बना रहा है। वह सोचता है कि शाहजी ने लोगों का खून चूसकर यह दौलत बनाई है। लेकिन जब शाहनी प्यार से उसके सिर पर हाथ रखती है, तो उसका पुराना मोह जाग उठता है और वह चाहकर भी हमला नहीं कर पाता।

  1. अचानक विदाई का हुक्म

दोपहर होते-होते गाँव में यह खबर फैल जाती है कि ट्रकें आ रही हैं और सभी सिखों व हिंदुओं को कैंप में ले जाया जाएगा। शाहनी को अपनी हवेली छोड़ने का आदेश मिलता है। पूरा गाँव, जो कभी शाहनी के इशारों पर चलता था, आज उसे बेगाना महसूस करा रहा है। थानेदार दाऊद खाँ आता है, जो कभी शाहनी का बहुत सम्मान करता था। वह शाहनी से कहता है कि समय (सिक्का) बदल गया है और अब उसे यह घर छोड़ना ही होगा।

  1. स्वाभिमान की मिसाल

दाऊद खाँ शाहनी से कहता है कि वह थोड़ा सोना-चाँदी या नकद अपने साथ रख ले क्योंकि आगे का समय कठिन है। इस पर शाहनी एक ऐतिहासिक जवाब देती है – “सोना-चाँदी! बच्चा, वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो इस ज़मीन के एक-एक हिस्से में बिछा है।” वह रोने के बजाय शान से अपनी देहरी लाँघती है। वह पीछे मुड़कर अपनी हवेली को अंतिम प्रणाम करती है।

  1. भारी मन से विदाई

जब शाहनी ट्रक की ओर बढ़ती है, तो पूरा गाँव रो पड़ता है। शेरा, जो सुबह उसे मारने की सोच रहा था, अब उसके पैर छूकर रोने लगता है। वह कहता है, “शाहनी, राज पलट गया है, कोई कुछ नहीं कर सका।” शाहनी उसे भी दुआ देती है। ट्रक में बैठते समय गाँव के लोग उससे ‘आसीस’ (आशीर्वाद) माँगते हैं। शाहनी का दिल इतना बड़ा है कि वह अपने लुटेरों को भी ‘सलामत रहने’ का आशीर्वाद देकर जाती है।

  1. निष्कर्ष – सिक्का बदल गया

रात को जब शाहनी रिफ्यूजी कैंप अर्थात् शरणार्थी शिविर में ज़मीन पर लेटी होती है, तो उसे थानेदार की बात याद आती है कि ‘सिक्का बदल गया है’। वह सोचती है कि राज्य तो बदल गया, राजा भी बदल गया, लेकिन क्या सच में सिक्का बदल गया है? वह तो अपनी सारी दौलत, मान-सम्मान और अपनी पहचान उसी हवेली में छोड़ आई है। बाहर दंगे हो रहे हैं, खून बरस रहा है और मानवता हार रही है।

मुख्य भाव – यह कहानी दिखाती है कि राजनीति और मज़हब की दीवारों के पीछे कैसे इंसानियत दम तोड़ देती है, लेकिन शाहनी जैसे पात्र अपनी गरिमा और प्रेम से नफरत को हरा देते हैं।

 

 

‘सिक्का बदल गया’ की मूल संवेदना

कृष्णा सोबती की कहानी ‘सिक्का बदल गया’ की मूल संवेदना अत्यंत गहरी और बहुआयामी है। यह केवल देश के विभाजन की कहानी नहीं है, बल्कि मानवीय मूल्यों के टूटने और राजनीति के कारण रिश्तों के बेगाने होने की त्रासदी है।

  1. सत्ता परिवर्तन और मनुष्य की विवशता

कहानी का शीर्षक ‘सिक्का बदल गया’ स्वयं में एक बड़ा अर्थ छिपाए हुए है। यहाँ ‘सिक्का बदलना’ केवल मुद्रा बदलने का प्रतीक नहीं है, बल्कि ‘राज’ (सत्ता) और ‘वक़्त’ (समय) के बदलने का प्रतीक है। जब राजनैतिक परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो सदियों से चले आ रहे आपसी प्रेम और भाईचारे पर डर और स्वार्थ हावी हो जाता है। शाहनी, जो कल तक गाँव की मालकिन थी, आज एक ही पल में ‘शरणार्थी’ बन जाती है।

  1. मानवीय संवेदनाओं पर सांप्रदायिकता की विजय

कहानी दिखाती है कि कैसे सांप्रदायिक आग इंसान को अंधा कर देती है। शेरा, जिसे शाहनी ने अपने बेटे की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया, वही शेरा उसे लूटने और मारने की योजना बनाता है। यह संवेदना इस कड़वे सच को उजागर करती है कि मजहब और राजनीति के आगे कभी-कभी ‘ममता’ और ‘कृतज्ञता’ जैसे पवित्र रिश्ते भी बौने साबित होते हैं।

  1. विस्थापन और जड़ों से टूटने का दर्द

शाहनी के माध्यम से लेखिका ने अपनी मिट्टी और घर छोड़ने की जो वेदना दिखाई है, वह पाठक के दिल को झकझोर देती है।

एक स्त्री के लिए उसका घर केवल ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि उसकी यादों और सम्मान का प्रतीक होता है।

शाहनी का यह कहना कि “मेरा सोना तो एक-एक ज़मीन में बिछा है”, उसकी अपनी मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है। अपनी जड़ों से उखड़ने का दुख आर्थिक नुकसान से कहीं बड़ा होता है।

  1. मानवीय गरिमा और उदारता

कहानी की मूल संवेदना में शाहनी का अजेय व्यक्तित्व भी शामिल है। इतना सब होने के बावजूद, वह अपनी गरिमा (Dignity) नहीं खोती। वह किसी से घृणा नहीं करती। विदाई के समय जब वह शेरे को ‘आसीस’ देती है और पूरे गाँव के लिए दुआ करती है, तो वह नफरत पर प्रेम की जीत का संदेश देती है।

  1. नैतिकता का पतन

कहानी यह सवाल उठाती है कि समाज और व्यक्ति कितने जल्दी अपनी नैतिकता बदल लेते हैं। वही गाँव वाले जो शाहनी के इशारे पर नाचते थे, आज उसकी हवेली लूटने की तैयारी में हैं। थानेदार दाऊद खाँ के माध्यम से लेखिका ने उस ‘मजबूरी’ को भी दिखाया है जहाँ व्यवस्था के आगे व्यक्तिगत संवेदनाएँ हार जाती हैं।

निष्कर्ष

संक्षेप में, इस कहानी की मूल संवेदना सांप्रदायिकता के दौर में मानवीय संवेदनाओं का ह्रास, विस्थापन की त्रासदी और बदलती राजनैतिक परिस्थितियों में मनुष्य की बेबसी को चित्रित करना है। यह बताती है कि ‘सिक्का’ (सत्ता) बदलने से इंसान के घर और भाग्य तो बदल जाते हैं, पर जो ‘मानवता’ वह पीछे छोड़ आता है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

 

 

  1. मुख्य और कठिन शब्द (Main & Difficult Words)

क्र.सं.

शब्द (हिंदी Word)

हिंदी अर्थ (Meaning in हिंदी)

अंग्रेज़ी Meaning

1

पौ फटना

सुबह होना / भोर

Dawn / Daybreak

2

लालिमा

लाली / सुर्खी

Redness / Glow

3

सर्द

ठंडा

Cold

4

अंजलि

दोनों हथेलियों को मिलाकर बना पात्र

Cupped palms

5

उनींदी

नींद से भरी हुई

Drowsy / Sleepy

6

भँवर

जल का चक्र

Whirlpool

7

कगारे

नदी का ऊँचा किनारा

River banks / Precipice

8

नीरवता

सन्नाटा

Silence / Stillness

9

भयावना

डरावना

Dreadful / Scary

10

अरसा

समय / काल

Period / Duration

11

असामियाँ

प्रजा / किसान (जो लगान दें)

Tenants / Subjects

12

अपनत्व

अपनापन

Sense of belonging

13

बरक़तें

सौभाग्य / वृद्धि

Blessings / Prosperity

14

गँडासा

चारा काटने का औजार

Chopper / Fodder cutter

15

विचलित

बेचैन / डगमगाया हुआ

Disturbed / Unsettled

16

मशवरा

सलाह

Consultation / Advice

17

शंकित

डरा हुआ / संदेही

Suspicious / Apprehensive

18

ड्योढ़ी

मुख्य द्वार / देहली

Threshold / Entrance

19

विकृत

बिगड़ा हुआ

Distorted / Deformed

20

मूर्तिवत्

मूर्ति की तरह स्थिर

Statue-like / Motionless

21

मसीत

मस्जिद

Mosque

22

जैलदार

गाँव का बड़ा अधिकारी

Village headman / Official

23

निर्जीव

जिसमें जान न हो

Lifeless

24

उद्दंडता

ढिठाई / बदतमीजी

Insolence / Impertinence

25

अस्फुट

जो साफ न हो

Indistinct / Mumbled

26

तिरस्कार

अपमान

Contempt / Scorn

27

आसीस

आशीर्वाद

Blessing / Benediction

28

विद्रोही

बगावत करने वाला

Rebel

29

अमानत

धरोहर

Trust / Deposit

30

चौबारा

छत पर बना कमरा

Attic / Rooftop room

31

पसार

दालान / बरामदा

Veranda / Courtyard

32

साफ़ा

पगड़ी

Turban

33

सहम जाना

डर जाना

To be terrified

34

अगणित

अनगिनत

Innumerable

35

प्रभा

चमक / रोशनी

Radiance

36

दुनियादारी

सांसारिक व्यवहार

Worldliness

37

मोह

लगाव / ममता

Attachment / Infatuation

38

जिगरा

साहस / कलेजा

Courage / Heart

39

प्रतिहिंसा

बदले की हिंसा

Retaliation / Revenge

40

लज्जित

शर्मिंदा

Ashamed / Embarrassed

41

निरुत्तर

जिसके पास जवाब न हो

Answerless / Speechless

42

अन्न-जल

भोजन और पानी

Sustenance / Living

43

विभीषिका

भयंकर डर / त्रासदी

Horror / Catastrophe

44

त्रासदी

दुखद घटना

Tragedy

45

विस्थापन

जगह से हटाया जाना

Displacement

46

आंचलिक

क्षेत्रीय

Regional

47

हवेली

विशाल पक्का मकान

Mansion

48

दहाड़

जोर की आवाज

Roar

49

स्मृति

याद

Memory

50

अदृश्य

जो दिखाई न दे

Invisible

51

झुर्रियाँ

खाल का सिकुड़ना

Wrinkles

52

ममता

माँ का प्यार

Maternal love

53

नक़दी

नकद पैसा

Cash

54

रुँधा हुआ

भारी (आवाज)

Choked (voice)

55

पुरखों

पूर्वजों

Ancestors

56

देहरी

चौखट

Threshold

57

कुलवधू

खानदान की बहू

Daughter-in-law of a family

58

जनसमूह

भीड़ / लोग

Crowd / Mass

59

मैल लाना

बुरा सोचना

To have ill feelings

60

आहत

दुखी / घायल

Hurt / Wounded

61

सिक्का

मुद्रा (यहाँ शासन का प्रतीक)

Coin (here, Power/Regime)

62

बाजरा

एक प्रकार का अनाज

Pearl Millet

63

सुलगना

जलना (धीमी आग)

Smolder

64

हुक्का

धूम्रपान का यंत्र

Hubble-bubble / Hookah

65

क्रोध

गुस्सा

Anger / Rage

66

कनाली

परात (बड़ा बर्तन)

Large wooden bowl

67

छा वेले

सुबह का समय (नाश्ता)

Early morning (breakfast time)

68

गंभीर

गहरा / शांत

Serious / Solemn

69

बीच-बचाव

सुलह कराना

Mediation

70

सूद

ब्याज

Interest

71

नीच

अधम / बुरा

Vile / Mean

72

लालटेन

रोशनी का लैंप

Lantern

73

मज़बूत

शक्तिशाली

Strong

74

खतरा

डर / संकट

Danger / Peril

75

धुँआ

धूम

Smoke

76

शून्य

खाली

Void / Empty

77

दुर्बल

कमजोर

Weak / Feeble

78

अधिकार

हक

Right / Authority

79

पत्थर होना

सुन्न हो जाना

To be petrified / Numb

80

साँझ

शाम

Evening

81

ग़ज़ब

आश्चर्यजनक / आफत

Disaster / Amazing event

82

अँधेर

अन्याय

Injustice / Chaos

83

स्नेह

प्यार

Affection

84

पटवारी

जमीन का लेखापाल

Village Accountant

85

मशीन

यंत्रवत

Mechanical

86

इशारा

संकेत

Gesture / Signal

87

मंजूर

स्वीकार

Accepted / Approved

88

बेजान

बिना जान के

Lifeless / Numb

89

बैर

दुश्मनी

Enmity / Hatred

90

अकड़

गर्व / घमंड

Pride / Stiffness

91

मँगेतर

होने वाली पत्नी

Fiancée

92

कनफूल

कान का गहना

Earrings

93

सिलसिले

क्रम

Series / Sequence

94

स्वभाव

प्रकृति

Nature / Temperament

95

सादगी

सरलता

Simplicity

96

जिंदा

जीवित

Alive

97

वेदना

दर्द

Pain / Agony

98

विद्रोह

बगावत

Mutiny / Revolt

99

रानी

राज्ञी

Queen

100

सँभालना

नियंत्रण करना

To manage / Handle

101

तुलना

बराबरी

Comparison

102

अंतिम

आखिरी

Final / Last

103

धोखा

छल

Betrayal / Deception

104

प्रणाम

नमस्कार

Salutation / Bow

105

अमानत

धरोहर

Trust / Safeguard

106

मैला

गंदा

Dirty / Impure

107

सलामत

सुरक्षित

Safe / Secure

108

हिचकी

कण्ठ रुकना

Hiccup

109

मुस्कराना

मंद हँसना

To smile

110

विदाई

प्रस्थान

Farewell / Departure

111

शिविर (कैंप)

अस्थायी पड़ाव

Camp

112

खून बरसना

हिंसा होना

Bloodbath / Violence

113

पलटा खाना

उलट जाना

To flip / Turn over

114

खामोश

चुप

Silent

115

पहाड़

पर्वत

Mountain

116

पिघलना

गलना

To melt

117

रेत

बालू

Sand

118

परछाई

छाया

Shadow

119

दुलहिन

वधू

Bride

120

हवेली

बड़ा मकान

Mansion

121

घंटी

टंकार

Bell

122

कुआँ

कूप

Well

123

फ़सल

उपज

Crop / Harvest

124

सोना उगलना

बहुत पैदावार होना

To yield gold (be fertile)

125

कौंधना

चमकना (विचार)

To flash (a thought)

126

कोठरी

छोटा कमरा

Small room / Cell

127

संदूक

बक्सा

Box / Trunk

128

क्रोध

गुस्सा

Anger

129

मौत

मृत्यु

Death

130

तड़पना

बेचैन होना

To writhe / Suffer

131

पागल

विक्षिप्त

Crazy / Mad

132

लाड़

दुलार

Fondness / Pampering

133

बहू

पुत्रवधू

Daughter-in-law

134

चिंतित

परेशान

Worried / Concerned

135

बिछुड़ना

अलग होना

Separation

136

सूदखोर

ब्याज लेने वाला

Usurer / Moneylender

137

बोरी

थैला

Sack

138

क़त्ल

हत्या

Murder

139

दूध

दुग्ध

Milk

140

कटोरा

प्याला

Bowl

141

विचलित

अस्थिर

Unsteady / Agitated

142

सामान

वस्तुएँ

Luggage / Goods

143

मज़बूत

पुख्ता

Solid / Strong

144

आसमान

आकाश

Sky

145

नाते-रिश्ते

संबंधी

Relatives / Kinship

146

सहारा

मदद

Support

147

मोह

प्रेम / भ्रम

Attachment / Illusion

148

मूर्ति

बुत

Statue

149

भीड़

हुजूम

Crowd

150

चक्कर

घूर्णन

Dizziness / Round

151

दीवार

भित्ति

Wall

152

बैर

शत्रुता

Enmity

153

खड़ा होना

उपस्थित होना

To stand / Present

154

सोना

स्वर्ण

Gold

155

चाँदी

रजत

Silver

156

वक़्त

समय

Time

157

तिरस्कार

उपेक्षा

Disdain / Rejection

158

रुँधा गला

दबी आवाज

Choked throat

159

सम्मान

आदर

Respect / Honor

160

राज

शासन

Rule / Regime

 

  1. क्षेत्रीय और सांस्कृतिक शब्द (Regional/Cultural Words)

शब्द (Word)

हिंदी अर्थ

Context/Meaning

खद्दर (Khaddar)

खादी का कपड़ा

Hand-spun cotton cloth

हवेली (Haveli)

बड़ा पक्का मकान

Mansion

बाजरा (Bajra)

एक अनाज

Pearl Millet

छाह वेले (Chah-vele)

कलेवे का समय (सुबह)

Early morning breakfast time

सूद (Sood)

ब्याज

Interest on money

मसीत (Maseet)

मस्जिद

Mosque

जैलदार (Zaildar)

गाँव का प्रभावशाली व्यक्ति

A local influential officer

कनाली (Kanali)

परात (बड़ा बर्तन)

A large wooden/metal bowl

साफ़ा (Safa)

पगड़ी

Turban

चौबारा (Chaubara)

छत पर बना कमरा

Attic / Room on the terrace

पसार (Pasar)

बरामदा / आँगन

Veranda / Courtyard

 

  1. वाक्यांश और मुहावरे (Phrases & Idioms)
  2. सिक्का बदल गया (Sikka Badal Gaya) –

हिंदी सत्ता या शासन का बदल जाना।

अंग्रेज़ी Change of regime or power shift.

  1. अन्न-जल उठना

हिंदी किसी स्थान से संबंध समाप्त होना।

अंग्रेज़ी To be forced to leave a place for good.

  1. जी छोटा होना

हिंदी उदास या हतोत्साहित होना।

अंग्रेज़ी To feel discouraged or disheartened.

  1. मन में मैल लाना

हिंदी मन में द्वेष या बुरा विचार लाना।

अंग्रेज़ी To hold a grudge or have ill feelings.

  1. रब्ब तुम्हें भाग लगाए

हिंदी ईश्वर तुम्हारी किस्मत अच्छी करे।

अंग्रेज़ी May God bless your destiny.

 

 

1. परीक्षा का तनाव और पलायन

कहानी की शुरुआत नायक जयदेवशरण वर्मा की मानसिक स्थिति से होती है। जयदेव एल.एल.बी. (LLB) की परीक्षा दे चुके हैं और परिणाम का इंतज़ार कर रहे हैं। परीक्षा के फल की प्रतीक्षा में वे बेहद तनाव में हैं। उन्हें हर समय डाकिया या चपरासी के आने का डर सताता है। इस मानसिक बोझ से राहत पाने के लिए वे अपनी बाइसिकिल उठाते हैं और सैर के लिए निकल पड़ते हैं।

2. बाइसिकिल का पंक्चर और कमला से भेंट

रास्ते में जयदेव प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेते हैं। वे अपने एक सनकी मित्र से मिलने कालानगर की ओर बढ़ते हैं। तभी अचानक उनकी बाइसिकिल पंक्चर हो जाती है। जेठ की चिलचिलाती धूप में वे थककर चूर हो जाते हैं। तभी उन्हें एक मीठी आवाज़ सुनाई देती है— “बाबूजी, क्या बाइसिकिल में पंक्चर हो गया?” यह आवाज़ कमला की थी, जो एक सोलह-सत्रह वर्ष की सुंदर कन्या थी। कमला उन्हें अपने चाचा के घर आमंत्रित करती है जहाँ पंक्चर सुधारने की सुविधा थी। जयदेव उसकी आँखों की चमक और सादगी देखकर पहली ही नज़र में अपना दिल हार बैठते हैं।

3. ‘सुखमय जीवन’ का रहस्य और लेखक का सम्मान

जब कमला को पता चलता है कि यह ‘सुखमय जीवन’ पुस्तक के लेखक जयदेवशरण वर्मा हैं, तो वह बहुत प्रसन्न होती है। वह बताती है कि उसके चाचा इस पुस्तक के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। कमला के चाचा गुलाबराय वर्मा जयदेव का बहुत गर्मजोशी से स्वागत करते हैं। गुलाबराय जी का मानना है कि जयदेव को गृहस्थ जीवन का बहुत गहरा अनुभव है, क्योंकि उन्होंने पुस्तक में पति-पत्नी के संबंधों को बहुत आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है।

यहाँ व्यंग्य यह है कि जयदेव ने वह पुस्तक बिना किसी व्यक्तिगत अनुभव के केवल कल्पना और किताबी ज्ञान के आधार पर लिखी थी। कमला की माँ (चाचीजी) हालाँकि इस पुस्तक को ‘किताबों का कीड़ा’ और ‘बिना अनुभव की बातें’ कहती हैं, पर गुलाबराय जी जयदेव को एक अनुभवी गृहस्थ मानकर उनका बहुत सत्कार करते हैं।

4. प्रेम का इजहार और विवाद

जयदेव दिन भर वहीं रुकते हैं। शाम को बग़ीचे में उन्हें कमला अकेले फूल चुनती हुई दिखती है। जयदेव अपने प्रेम को रोक नहीं पाते और अंग्रेज़ी उपन्यासों के प्रभाव में आकर आवेश में कमला का हाथ पकड़ लेते हैं और प्रेम का प्रस्ताव रखते हैं। कमला इस धृष्टता पर बहुत क्रोधित होती है। वह जयदेव को उनके ‘घृणित चरित्र’ के लिए धिक्कारती है और कहती है कि ‘सुखमय जीवन’ जैसा पवित्र ग्रंथ लिखने वाला व्यक्ति इतना गिरा हुआ कैसे हो सकता है? वह चिल्लाकर अपने चाचा को बुला लेती है।

5. अंत – वास्तविकता और मिलन

चाचा गुलाबराय जी भी आग-बबूला हो जाते हैं। वे जयदेव को ‘कपटी’ और ‘शैतान’ कहते हैं। तब जयदेव साहस बटोरकर स्पष्ट करते हैं कि वे कोई विवाहित व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि कुँवारे हैं और कमला से विवाह करना चाहते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनकी पुस्तक केवल कल्पना थी और वे कमला के साथ मिलकर ‘वास्तविक सुखमय जीवन’ का अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं।

यह सुनकर चाचा का क्रोध शांत हो जाता है और उन्हें खुशी होती है कि उनकी भतीजी के लिए एक सुयोग्य और विद्वान वर मिल गया है। कमला भी अपनी लज्जा और सहमति प्रकट करती है। अंत में, जयदेव स्वीकार करते हैं कि कमला की माँ ही सच कहती थीं—अनुभव के बिना ज्ञान अधूरा है। वे निश्चय करते हैं कि अब वे दस साल बाद अनुभव के आधार पर नई पुस्तक लिखेंगे।

‘सिक्का बदल गया’ पर आधारित दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर

  1. ‘सिक्का बदल गया’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – इस कहानी का शीर्षक ‘सिक्का बदल गया’ अत्यंत सार्थक और प्रतीकात्मक है। ‘सिक्का बदलना’ एक मुहावरा है जिसका अर्थ है सत्ता का परिवर्तन या वक्त का बदल जाना। विभाजन के कारण रातों-रात राजनैतिक सत्ता बदल गई। जो शाहनी कल तक पूरे गाँव की मालकिन और ‘दाता’ थी, वह आज अपने ही घर में शरणार्थी बन गई। शीर्षक यह भी दर्शाता है कि मानवीय मूल्यों और रिश्तों का सिक्का खोटा हो गया है, जहाँ प्रेम और विश्वास की जगह नफरत और स्वार्थ ने ले ली है।

  1. शाहनी का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर – शाहनी कहानी की केंद्रीय पात्र है जो ममता, उदारता और स्वाभिमान का प्रतीक है। वह एक संपन्न ज़मींदार परिवार की विधवा है, जिसका पूरे गाँव पर दबदबा था। वह धार्मिक प्रवृत्ति की है और शेरे जैसे अनाथों को पुत्रवत पालती है। कठिन समय में भी वह अपना धैर्य नहीं खोती। जब उसे घर छोड़ने को कहा जाता है, तो वह बिना रोए शान से निकलती है। जाते समय वह उन लोगों को भी आशीर्वाद देती है जो उसे उजाड़ रहे हैं, जो उसकी महानता को दर्शाता है।

  1. शेरे के मन में चल रहे अंतर्द्वंद्व (Conflict) का वर्णन कीजिए।

उत्तर – शेरे के चरित्र में गहरा मानसिक संघर्ष है। एक ओर वह सांप्रदायिक नफरत और लालच के वश में होकर शाहनी को मारने और उसकी हवेली लूटने की योजना बनाता है। उसे लगता है कि शाहजी ने उसके पूर्वजों का शोषण किया है। दूसरी ओर, शाहनी द्वारा बचपन में दी गई ममता और उसके हाथ से पिए दूध का स्वाद उसे भावुक कर देता है। वह हिंसा और कृतज्ञता के बीच झूलता रहता है, लेकिन अंत में शाहनी की ममता के आगे उसका क्रोध पराजित हो जाता है।

  1. विभाजन की त्रासदी ने मानवीय रिश्तों को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर – विभाजन की त्रासदी ने सदियों पुराने भाईचारे और रिश्तों को तहस-नहस कर दिया। कहानी में दिखाया गया है कि कैसे मज़हब की दीवार खड़ी होते ही पड़ोसी, दुश्मन बन गए। शेरा, जिसे शाहनी ने पाला था, वही उसका खून करने की सोचने लगता है। गाँव के लोग, जो शाहनी के सम्मान में खड़े रहते थे, उसकी विदाई पर मूक दर्शक बने रहे या उसकी संपत्ति हड़पने की ताक में रहे। यह दर्शाता है कि राजनैतिक बदलाव मानवीय संवेदनाओं को सुखा देता है।

  1. शाहनी ने दाऊद खाँ के नकद और सोना ले जाने के प्रस्ताव को क्यों ठुकरा दिया?

उत्तर – जब थानेदार दाऊद खाँ ने शाहनी को भविष्य की सुरक्षा के लिए सोना-चाँदी साथ रखने की सलाह दी, तो शाहनी ने उसे ठुकरा दिया। उसका मानना था कि जिस घर और मिट्टी से उसका अस्तित्व जुड़ा था, जब वही छूट गया तो इस धन-दौलत का कोई मूल्य नहीं। उसने स्वाभिमान से कहा कि उसका असली सोना तो उस ज़मीन के कण-कण में बिखरा है। यह उत्तर शाहनी के अपनी जड़ों के प्रति प्रेम और उसकी भौतिक संपत्ति के प्रति अनासक्ति को प्रकट करता है।

  1. कहानी के अंत में शाहनी की मनोदशा का चित्रण कीजिए।

उत्तर – कहानी के अंत में शाहनी गहरे विषाद और अकेलेपन में है। जब वह ट्रक में बैठकर कैंप पहुँचती है और रात को ज़मीन पर लेटती है, तो उसे अपनी हवेली, पुराने दिन और दाऊद खाँ की बातें याद आती हैं। उसे अहसास होता है कि राज्य और सत्ता तो बदल गए, लेकिन उसकी आत्मा और पहचान वहीं हवेली में छूट गई है। उसकी आँखें गीली हैं, पर उसमें किसी के प्रति नफरत नहीं, बल्कि अपने भाग्य और उजड़ते हुए संसार के प्रति एक मौन स्वीकारोक्ति है।

  1. ‘सिक्का बदल गया’ कहानी में परिवेश और वातावरण की क्या भूमिका है?

उत्तर – लेखिका ने चिनाब दरिया, रेतीले किनारों और सुबह के धुँधलके के माध्यम से एक डरावना और अनिश्चित वातावरण रचा है। दरिया की खामोशी और रेत पर पैरों के निशान आने वाले खतरे का संकेत देते हैं। खेतों में उठ रहा धुआँ और ‘जम्मीवाला’ कुआँ न चलना गाँव के बदलते मिजाज़ को दिखाते हैं। यह परिवेश पाठक को विभाजन की उस भयावहता और सन्नाटे का अनुभव कराता है, जिसमें लोग अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करने लगे थे।

  1. दाऊद खाँ थानेदार होने के बावजूद शाहनी के प्रति नरम क्यों था?

उत्तर – दाऊद खाँ के मन में शाहनी के प्रति गहरा सम्मान और कृतज्ञता थी। उसे याद था कि शाहनी ने उसकी मँगेतर को मुँह-दिखाई में सोने के गहने दिए थे और मस्जिद के लिए माँगे जाने पर उदारता से पैसे दिए थे। हालांकि वह अब नई हुकूमत का कर्मचारी था, लेकिन उसका मानवीय पक्ष जीवित था। वह कर्तव्य और संवेदना के बीच फँसा था। वह चाहता था कि शाहनी सुरक्षित रहे, इसलिए वह उसे बार-बार कुछ धन साथ रखने का आग्रह करता है।

  1. कहानी में ‘हवेली’ किस बात का प्रतीक है?

उत्तर – हवेली केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि शाहनी के सुहाग, उसके गौरव, अतीत की संपन्नता और साझा संस्कृति की प्रतीक है। यह उस सामंती व्यवस्था को भी दर्शाती है जो अब ढह रही है। हवेली का छोड़ना शाहनी के लिए एक युग के अंत जैसा है। ड्योढ़ी लाँघते समय शाहनी का ठिठकना यह दिखाता है कि उसका पूरा जीवन उसी दहलीज के भीतर सिमटा हुआ था और उसे लाँघना अपनी पहचान को खत्म करने जैसा था।

  1. शेरे ने अंत में शाहनी के पैर क्यों छुए?

उत्तर – शेरे के भीतर भले ही नफरत और लूट की भावना भर गई थी, लेकिन जब शाहनी वास्तव में गाँव छोड़कर जाने लगी, तो उसका पाखंडी और हिंसक मुखौटा उतर गया। शाहनी की निस्वार्थ ममता और उसके आशीर्वाद ने शेरे को उसकी नीचता का अहसास कराया। पैर छूना उसकी आत्मग्लानि और पश्चाताप का प्रतीक है। वह स्वीकार करता है कि “राज पलट गया” है, जिससे वह अपनी बेबसी और व्यवस्था के आगे समर्पण को भी ज़ाहिर करता है।

  1. शाहनी की विदाई के समय गाँव वालों की क्या प्रतिक्रिया थी?

उत्तर – शाहनी की विदाई के समय गाँव में सन्नाटा और शोक का माहौल था। बड़ी-बूढ़ियाँ रो रही थीं क्योंकि उनकी सुख-दुख की साथिन जा रही थी। मुल्ला इस्माइल जैसे लोग भी दुखी थे और शाहनी से ‘आसीस’ माँग रहे थे। हालांकि गाँव के कुछ लोग उसकी हवेली लूटने की योजना बना रहे थे, लेकिन शाहनी का व्यक्तित्व इतना ऊँचा था कि उसकी विदाई पर कोई भी खुशी ज़ाहिर नहीं कर सका। हर किसी के मन में एक अनजाना डर और अपराध बोध था।

  1. इस कहानी का मुख्य संदेश या उद्देश्य क्या है?

उत्तर – इस कहानी का मुख्य उद्देश्य विभाजन की विभीषिका के बीच मानवीय मूल्यों की रक्षा और विस्थापन के दर्द को उजागर करना है। लेखिका यह संदेश देती हैं कि राजनैतिक लकीरें ज़मीन को बाँट सकती हैं, लेकिन वे उस ममता और प्रेम को नहीं मिटा सकतीं जो वर्षों से लोगों के बीच रहा है। शाहनी का चरित्र यह सिखाता है कि कठिनतम परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपनी गरिमा, उदारता और सकारात्मकता नहीं छोड़नी चाहिए।

 

 

 

“सिक्का बदल गया है…” – महत्त्वपूर्ण अंशों की व्याख्या

  1. विस्थापन और जड़ों का बिछड़ना

अंश – “सोना-चाँदी! बच्चा वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक ज़मीन में बिछा है।”

सप्रसंग व्याख्या – जब थानेदार दाऊद खाँ मानवीयता के नाते शाहनी को भविष्य की सुरक्षा के लिए कुछ गहने या नकदी साथ रखने को कहता है, तब शाहनी यह उत्तर देती है।

आलोचनात्मक टिप्पणी – यह अंश शाहनी के वैराग्य और स्वाभिमान को दर्शाता है। उसके लिए धन केवल भौतिक वस्तु है, जबकि उसकी असली पूँजी वह ज़मीन और मिट्टी है जिसमें उसका पूरा जीवन और यादें रची-बसी हैं। यहाँ ‘सोना’ मेहनत और ममता का प्रतीक है।

 

  1. सत्ता परिवर्तन की क्रूरता

अंश – “शाहनी, मन में मैल न लाना। कुछ कर सकते तो उठा न रखते! वक़्त ही ऐसा है। राज पलट गया है, सिक्का बदल गया है…”

सप्रसंग व्याख्या – ट्रक में बैठते समय दाऊद खाँ अपनी बेबसी ज़ाहिर करते हुए शाहनी से क्षमा भाव से यह कहता है।

आलोचनात्मक टिप्पणी – यहाँ ‘सिक्का बदल गया’ का प्रयोग दो अर्थों में हुआ है—एक राजनैतिक सत्ता का बदलना और दूसरा मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन। यह वाक्य उस असाहयता को रेखांकित करता है जहाँ व्यक्तिगत इच्छाएँ राजनैतिक फैसलों के आगे दम तोड़ देती हैं।

 

  1. स्मृतियों का अंत और नया यथार्थ

अंश – “अन्न-जल उठ गया। वह हवेली, नई बैठक, ऊँचा चौबारा, बड़ा ‘पसार’ एक-एक करके घूम रहे हैं शाहनी की आँखों में!”

सप्रसंग व्याख्या – जब शाहनी ट्रक में बैठकर गाँव छोड़ रही है, तब उसकी आँखों के सामने उसके घर का एक-एक कोना स्मृति चित्र बनकर उभरता है।

आलोचनात्मक टिप्पणी – ‘अन्न-जल उठना’ एक मुहावरा है जो भाग्य के अंत को दर्शाता है। यहाँ चित्रात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। हवेली के विभिन्न हिस्से (चौबारा, पसार) शाहनी के गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं, जो अब केवल यादों में शेष रह गए हैं।

 

  1. नफरत पर प्रेम की विजय

अंश – “शाहनी ने काँपता हुआ हाथ शेरे के सिर पर रखा और रुक-रुककर कहा, ‘तुम्हें भाग लगे चन्ना’…”

सप्रसंग व्याख्या – शेरा, जो शाहनी को लूटने की योजना बना रहा था, अंत में आत्मग्लानि से भर जाता है। शाहनी उसे पहचान लेती है और उसे आशीर्वाद देती है।

आलोचनात्मक टिप्पणी – यह अंश शाहनी के करुणा और क्षमा के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करता है। वह जानती है कि शेरा भी इस ‘वक्त की मार’ का शिकार है। एक माँ की ममता नफरत की आग से कहीं अधिक शक्तिशाली दिखाई गई है।

 

  1. अकेलापन और अस्तित्व का संकट

अंश – “रात को शाहनी जब कैंप में पहुँचकर ज़मीन पर पड़ी तो लेटे-लेटे आहत मन से सोचा—‘राज पलट गया है…’ सिक्का क्या बदलेगा? वह तो मैं वहीं छोड़ आई…।”

सप्रसंग व्याख्या – कहानी के अंतिम दृश्य में कैंप की कठोर ज़मीन पर लेटी शाहनी अपनी स्थिति का विश्लेषण करती है।

आलोचनात्मक टिप्पणी – यह बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक अंश है। शाहनी सोचती है कि दुनिया के लिए ‘सिक्का’ (मुद्रा/सत्ता) बदला होगा, लेकिन उसका असली ‘सिक्का’ (उसकी पहचान, उसका मान और उसका घर) तो पीछे छूट गया। अब जो बचा है, वह केवल एक अस्तित्वहीन शरीर है।

 

 

 

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