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उदय प्रकाश का जीवन परिचय
उदय प्रकाश समकालीन हिंदी साहित्य के सबसे चर्चित, लोकप्रिय और प्रभावशाली कथाकारों में से एक हैं। उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, निबंध और वृत्तचित्र (documentaries) के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उन्हें हिंदी साहित्य में ‘जादुई यथार्थवाद’ (Magical Realism) को एक नई भारतीय पहचान देने का श्रेय दिया जाता है।
जन्म और शिक्षा –
उदय प्रकाश का जन्म 1 जनवरी, 1952 को मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के सीतापुर नामक गाँव में हुआ था। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया।
साहित्यिक विशेषताएँ –
उदय प्रकाश की रचनाएँ आधुनिक जीवन की विसंगतियों, महानगरीय भ्रष्टाचार, मध्यम वर्ग के अंतर्द्वंद्व और समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के संघर्ष को उजागर करती हैं। उनकी भाषा अत्यंत सरल, बोलचाल के करीब लेकिन बेहद मारक होती है। वे अपनी कहानियों में अक्सर फंतासी और यथार्थ का ऐसा मेल करते हैं कि पाठक दंग रह जाता है।
प्रमुख कृतियाँ –
उनकी रचनाओं ने हिंदी कहानी को एक नया मोड़ दिया है –
- कहानी संग्रह – ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘पालगोमरा का स्कूटर’, ‘पीली छतरी वाली लड़की’, ‘दत्तारेय के दुख’, ‘अरेबा-परेबा’।
- उपन्यास/लघु उपन्यास – ‘मोहन दास’, ‘वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड’।
- कविता संग्रह – ‘सुनो कारीगर’, ‘अबूतर-कबूतर’, ‘रात में हारमोनियम’।
- अनुवाद – उन्होंने विश्व साहित्य की कई महत्त्वपूर्ण रचनाओं का हिंदी में अनुवाद भी किया है।
सम्मान और पुरस्कार –
उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है –
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2010) – उनके कहानी संग्रह ‘मोहन दास’ के लिए।
- भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार
- ओम प्रकाश स्मृति सम्मान
- शिखर सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार)
पत्रकारिता और फिल्म –
साहित्य के अलावा, उदय प्रकाश का पत्रकारिता से भी गहरा जुड़ाव रहा है। वे ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’ और ‘संडे मेल’ जैसे प्रतिष्ठित पत्रों से जुड़े रहे। उन्होंने ‘पी.टी.आई. (भाषा)’ में भी कार्य किया। इसके अलावा उन्होंने कई वृत्तचित्रों और टीवी धारावाहिकों की पटकथाएँ भी लिखी हैं।
टेपचू – उदय प्रकाश
यहाँ जो कुछ लिखा हुआ है, वह कहानी नहीं है। कभी—कभी सच्चाई कहानी से भी ज्यादा हैरतअंगेज होती है। टेपचू के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद आपको भी ऐसा ही लगेगा।
टेपचू को मैं बहुत करीब से जानता हूँ। हमारा गाँव मड़र सोन नदी के किनारे एक—दो फ़र्लांग के फासले पर बसा हुआ है। दूरी शायद कुछ और कम हो, क्योंकि गाँव की औरतें सुबह खेतों में जाने से पहले और शाम को वहाँ से लौटने के बाद सोन नदी से ही घरेलू काम—काज के लिए पानी भरती है। ये औरतें कुछ ऐसी औरतें हैं, जिन्हें मैंने थकते हुए कभी नहीं देखा है। वे लगातार काम करती जाती है।
गाँव के लोग सोन नदी में ही डुबकियाँ लगा—लगाकर नहाते हैं। डुबकियाँ लगा पाने लायक पानी गहरा करने के लिए नदी के भीतर कुइयाँ खोदनी पड़ती है। नदी की बहती हुई धार के नीचे बालू को अंजुलियों से सरका दिया जाए तो कुइयाँ बन जाती है। गर्मी के दिनों में सोन नदी में पानी इतना कम होता है कि बिना कुइयाँ बनाए आदमी का धड़ ही नहीं भींगता। यही सोन नदी बिहार पहुँचते—पहुँचते कितनी बड़ी हो गई है, इसका अनुमान आप हमारे गाँव के घाट पर खड़े होकर नहीं लगा सकते।
हमारे गाँव में दस—ग्यारह साल पहले अब्बी नाम का एक मुसलमान रहता था। गाँव के बाहर जहाँ चमारों की बस्ती है, उसी से कुछ हटकर तीन—चार घर मुसलमानों के थे। मुसलमान, मुर्गियाँ, बकरियाँ पालते थे। लोग उन्हें चिकवा या कटुआ कहते थे। वे बकरे—बकरियों के गोश्त का धंधा भी करते थे। थोड़ी बहुत जमीन भी उनके पास होती थी।
अब्बी आवारा और फक्कड़ किस्म का आदमी था। उसने दो—दो औरतों के साथ शादी कर रखी थी। बाद में एक औरत जो ज्यादा खूबसूरत थी, कस्बे के दर्जी के घर जाकर बैठ गई। अब्बी ने गम नहीं किया। पंचायत ने दरजी को जितनी रकम भरने को कहा, उसने भर दी। अब्बी ने उन रूपयों से कुछ दिनों ऐश किया और फिर एक हारमोनियम खरीद लाया। अब्बी जब भी हाट जाता, उसी दर्जी के घर रुकता। खाता—पीता, जश्न मनाता, अपनी पुरानी बीवी को फुसलाकर कुछ रूपए ऐठता और फिर खरीदारी करके घर लौट आता।
कहते हैं, अब्बी खूबसूरत था। उसके चेहरे पर हल्की—सी लुनाई थी। दुबला—पतला था। बचपन में बीमार रहने और बाद में खाना—पीना नियमित न रहने के कारण उसका रंग हल्का—सा हल्दिया हो गया था। वह गोरा दिखता था। लगता था, जैसे उसके शरीर ने कभी धूप न खाई हो। अँधेरे में, धूप और हवा से दूर उगने वाले गेहूँ के पीले पौधे की तरह उसका रंग था। फिर भी, उसमें जाने क्या गुण था कि लड़कियाँ उस पर फिदा हो जाती थीं। शायद इसका एक कारण यह रहा हो कि दूर दराज शहर में चलने वाले फैशन सबसे पहले गाँव में उसी के द्वारा पहुँचते थे। जेबी कंघी, धूप वाला चश्मा, जो बाहर से आईने की तरह चमकता था, लेकिन भीतर से आर—पार दिखाई देता था, तौलिए जैसे कपड़े की नंबरदार पीली बनियान, पंजाबियों का अष्टधातु का कड़ा, रबर का हंटर वगैरह ऐसी चीजें थी, जो अब्बी शहर से गाँव लाया था।
जब से अब्बी ने हारमोनियम खरीदा था, तब से वह दिन भर चीपों—चीपों करता रहता था। उसकी जेब में एक—एक आने में बिकने वाली फिल्मी गानों की किताबें होतीं। उसने शहर में कव्वालों को देखा था और उसकी दिली ख्वाहिश थी कि वह कव्वाल बन जाए, लेकिन जी—तोड़ कोशिश करने के बाद भी “हमें तो लूट लिया मिल के हुस्नवालों ने” के अलावा और दूसरी कोई कव्वाली उसे याद ही नहीं हुई।
बाद में अब्बी ने अपनी दाढ़ी—मूंछ बिल्कुल सफाचट कर दी और बाल बढ़ा लिए। चेहरे पर मुरदाशंख पोतने लगा। गाँव के धोबी का लड़का जियावन उसके साथ—साथ डोलने लगा और दोनों गाँव—गाँव जाकर गाना—बजाना करने लगे। अब्बी इस काम को आर्ट कहता था, लेकिन गाँव के लोग कहते थे, “ससुर, भड़ैती कर रहा है।” अब्बी इतनी कमाई कर लेता था कि उसकी बीवी खा—पहन सके।
टेपचू इसी अब्बी का लड़का था।
टेपचू जब दो साल का था, तभी अब्बी की अचानक मौत हो गई।
अब्बी की मृत्यु भी बड़ी अजीबो—गरीब दुर्घटना में हुई। आषाढ़ के दिन थे। सोन उमड़ रही थी। सफेद फेन और लकड़ी के सड़े हुए लठ्ठे—पटरे धार में उतरा रहे थे। पानी मटैला हो गया था, चाय के रंग जैसा, और उसमें कचरा, काई, घास—फूस बह रहे थे। यह बाढ़ की पूर्व सूचना थी। घंटे—दो घंटे के भीतर सोन नदी में पानी बढ़ जाने वाला था। अब्बी और जियावन को जल्दी थी, इसलिए वे बाढ़ से पहले नदी पार कर लेना चाहते थे। जब तक वे पार जाने का फैसला करें और पानी में पाँव दे तब तक सोन में कमर तक पानी हो गया था। जहाँ कहीं गाँव के लोगों ने कुइयाँ खोदी थीं, वहाँ छाती तक पानी पहुँच गया था। कहते हैं कि जियावन और अब्बी बहुत इत्मीनान से नदी पार कर रहे थे। नदी के दूसरे तट पर गाँव की औरतें घड़ा लिए खड़ी थीं। अब्बी उन्हें देखकर मौज में आ गया। जियावन ने परदेसिया की लंबी तान खींची। अब्बी भी सुर मिलाने लगा। गीत कुछ गुदगुदीवाला था। औरतें खुश थीं और खिलखिला रही थीं। अब्बी कुछ और मस्ती में आ गया। जियावन के गले में अँगोछे से बँधा हारमोनियम झूल रहा था। अब्बी ने हारमोनियम उससे लेकर अपने गले में लटका लिया और रसदार साल्हो गाने लगा। दूसरे किनारे पर खड़ी हुई औरतें खिलखिला ही रही थीं कि उनके गले से चीख निकल गई। जियावन अवाक् होकर खड़ा ही रह गया। अब्बी का पैर शायद धोखे से किसी कुइयाँ या गड्ढ़े में पड़ गया था। वह बीच धार में गिर पड़ा। गले में लटके हुए हारमोनियम ने उसको हाथ-पाँव मारने तक का मौका न दिया। हुआ यह था कि अब्बी किसी फिल्म में देखे हुए वैजयंती माला के नृत्य की नकल उतारने में लगा हुआ था और इसी नृत्य के दौरान उसका पैर किसी कुइयाँ में पड़ गया। कुछ लोग कहते हैं कि नदी में चोर बालू भी होता है। ऊपर—ऊपर से देखने पर रेत की सतह बराबर लगती है, लेकिन उसके नीचे अतल गहराई होती है पैर रखते ही आदमी उसमें समा सकता है। अब्बी की लाश और हारमोनियम, दोनों को ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की गई। मलंगा जैसा मशहूर मल्लाह गोते लगाता रहा, लेकिन सब बेकार। कुछ पता ही नहीं चला।
अब्बी की औरत फिरोजा जवान थी। अब्बी के मर जाने के बाद फिरोजा के सिर पर मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़े। वह घर—घर जाकर दाल—चावल फटकने लगी। खेतों में मजदूरी शुरू की। बगीचों की तकवानी का काम करना शुरू किया, तब कहीं जाकर दो रोटी मिल पाती। दिन भर वह ढेंकी कूटती, सोन नदी से मटके भर—भरकर पानी ढोती, घर का सारा काम काज करना पड़ता, रात खेतों की तकवानी में निकल जाती। घर में एक बकरी थी, जिसकी देखभाल भी उसे ही करनी पड़ती। इतने सारे कामों के दौरान टेपचू उसके पेट पर, एक पुरानी साड़ी में बँधा हुआ चमगादड़ की तरह झूलता रहता।
फिरोजा को अकेला जानकर गाँव के कई खाते—पीते घरानों के छोकरों ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन टेपचू हर वक्त अपनी माँ के पास कवच की तरह होता। दूसरी बात, वह इतना घिनौना था कि फिरोजा की जवानी पर गोबर की तरह लिथड़ा हुआ लगता था। पतले—पतले सूखे हुए झुर्रीदार हाथ—पैर, कद्दू की तरह फूला हुआ पेट, फोड़ों से भरा हुआ शरीर। लोग टेपचू के मरने का इंतजार करते रहे। एक साल गुजरते—गुजरते हाड़—तोड़ मेहनत ने फिरोजा की देह को झिंझोड़कर रख दिया। वह बुढ़ा गई। उसके बाल उलझे हुए सूखे और गंदे रहते। कपड़ों से बदबू आती। शरीर मैल पसीने और गर्द से चीकट रहा करता। वह लगातार काम करती रही। लोगों को उससे घिन होने लगी।
टेपचू जब सात—आठ साल का हुआ, गाँव के लोगों की दिलचस्पी उसमें पैदा हुई।
हमारे गाँव के बाहर, दूर तक फैले धान के खेतों के पार आम का एक घना बगीचा था। कहा जाता है कि गाँव के संभ्रांत किसान घरानों, ठाकुरों—ब्राह्मणों की कुलीन कन्याएँ उसी बगीचे के अँधेरे कोनों में अपने अपने यारों से मिलतीं। हर तीसरे—चौथे साल उस बगीचे के किसी कोने में अलस्सुबह कोई नवजात शिशु रोता हुआ लावारिस मिल जाता था। इस तरह के ज्यादातर बच्चे स्वस्थ, सुंदर और गोरे होते थे। निश्चित ही गाँव के आदिवासी कोल—गोंडों के बच्चे वे नहीं कहे जा सकते थे। हर बार पुलिस आती। दरोगा ठाकुर साहब के घर में बैठा रहता। पूरी पुलिस पलटन का खाना वहाँ पकता। मुर्गे गाँव से पकड़वा लिए जाते। शराब आती। शाम को पान चबाते, मुस्कराते और गाँव की लड़कियों से चुहलबाजी करते पुलिस वाले लौट जाया करते। मामला हमेशा रफा—दफा हो जाता था।
इस बगीचे का पुराना नाम मुखियाजी का बगीचा था। वर्षों पहले चौधरी बालकिशन सिंह ने यह बगीचा लगाया था। मंशा यह थी कि खाली पड़ी हुई सरकारी जमीन को धीरे—धीरे अपने कब्जे में कर लिया जाए। अब तो वहाँ आम के दो—ढ़ाई सौ पेड़ थे, लेकिन इस बगीचे का नाम अब बदल गया था। इसे लोग भुतहा बगीचा कहते थे, क्योंकि मुखिया बालकिशन सिंह का भूत उसमें बसने लगा था। रात—बिरात उधर जाने वाले लोगों की घिग्घी बँध जाती थी। बालकिशन सिंह के बड़े बेटे चौधरी किशनपाल सिंह एक बार उधर से जा रहे थे तो उनको किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। जाकर देखा झाड़ियों, झुरमुटों को तलाशा तो कुछ नहीं। उनके सिर तक के बाल खड़े हो गए। धोती का फेंटा खुल गया और वे हनुमान—हनुमान करते भाग खड़े हुए।
तब से वहाँ अक्सर रात में किसी स्त्री की कराहने या रोने की करुण आवाज सुनी जाने लगी। दिन में जानवरों की हड्डियाँ, जबड़े या चूड़ियों के टुकड़े वहाँ बिखरे दिखाई देते। गाँव के कुछ लफंगों का कहना था कि उस बगीचे में भूत—ऊत कुछ नहीं रहता। सब मुखिया के घराने द्वारा फैलाई गई अफवाह है। साले ने उस बगीचे को ऐशगाह बना रखा है।
एक बार मैं पड़ोस के गाँव में शादी के न्यौते में गया था। लौटते हुए रात हो गई। बारह बजे होंगे। संग में राधे, संभारू और बालदेव थे। रास्ता बगीचे के बीच से गुजरता था। हम लोगों ने हाथ में डंडा ले रखा था। अचानक एक तरफ सूखे पत्तों की चरमराहट सुनाई पड़ी। लगा, जैसे कोई जंगली सूअर बेफिक्री से पत्तियों को रौंदता हुआ हमारी ओर ही चला आ रहा है। हम लोग रुककर आहट लेने लगे। गर्मी की रात थी। जेठ का महीना। अचानक आवाज जैसे ठिठक गई। सन्नाटा खिंच गया। हम टोह लेने लगे। भीतर से डर भी लग रहा था। बालदेव आगे बढ़ा, कौन है, बे, छोह—छोह। उसने जमीन पर लाठी पटकी हालाँकि उसकी नसें ढीली पड़ रही थीं। कहीं मुखिया का जिन्न हुआ तो? मैंने किसी तरह हिम्मत जुटाई, “अबे, होह, होह।” बालदेव को आगे बढ़ा देखा संभारू भी तिड़ी हो गया। पगलेटों की तरह दाएँ—बाएँ ऊपर—नीचे लाठियाँ भाँजता वह उसी ओर लपका।
तभी एक बारीक और तटस्थ सी आवाज सुनाई पड़ी, हम हन भइया, हम।
तू कौन है बे? बालदेव कड़का।
अँधेरे से बाहर निकलकर टेपचू आया, “काका, हम हन टेपचू।” वह बगीचे के बनते—मिटते घने अँधेरे में धुँधला-सा खड़ा था। हाथ में थैला था। मुझे ताज्जुब हुआ। “इतनी रात को इधर क्या कर रहा है कटुए?”
थोड़ी देर टेपचू चुप रहा। फिर डरता हुआ बोला, “अम्मा को लू लग गई थी। दोपहर मुखिया के खेत की तकवानी में गई थी, घाम खा गई। उसने कहा कि कच्ची अमिया का पानी मिल जाए तो जुड़ा जाएगी। बड़ा तेज जर था।”
“भूत—डाइन का डर नहीं लगा तुझे मुए? किसी दिन साले की लाश मिलेगी किसी झाड़—झंखाड़ में।” राधे ने कहा। टेपचू हमारे साथ ही गाँव लौटा। रास्ते भर चुपचाप चलता रहा। जब उसके घर जाने वाली गली का मोड़ आया तो बोला, “काका, मुखिया से मत खोलना यह बात नहीं तो मार—मार कर भरकस बना देगा हमें।”
टेपचू की उम्र उस समय मुश्किल से सात—आठ साल की रही होगी।
दूसरी बार यों हुआ कि टेपचू अपनी अम्मा फिरोजा से लड़कर घर से भाग गया। फिरोजा ने उसे जलती हुई चूल्हे की लकड़ी से पीटा था। सारी दोपहर, चिनचिनाती धूप में टेपचू जंगल में ढोर—ढंगरों के साथ फिरता रहा। फिर किसी पेड़ के नीचे छाँह में लेट गया। थका हुआ था। आँख लग गई। नींद खुली तो आँतों में खालीपन था। पेट में हल्की—सी आँच थी भूख की। बहुत देर तक वह यों ही पड़ा रहा, टुकुर—टुकुर आसमान ताकता। फिर भूख की आँच में जब कान के लरे तक गर्म होने लगे तो सुस्त—सा उठकर सोचने लगा कि अब क्या जुगाड़ किया जाए। उसे याद आया कि सरई के पेड़ों के पार जंगल के बीच एक मैदान है। वहीं पर पुरनिहा तालाब है।
वह तालाब पहुँचा। इस तालाब में, दिन में गाँव की भैंसें और रात में बनैले सूअर लोटा करते थे। पानी स्याह—हरा सा दिखाई दे रहा था। पूरी सतह पर कमल और कुई के फूल और पुरईन फैले हुए थे। काई की मोटी पर्त बीच में थी। टेपचू तालाब में घुस गया। वह कमल गट्टे और पुरइन की कांद निकालना चाहता था। तैरना वह जानता था।
बीच तालाब में पहुँचकर वह कमलगट्टे बटोरने लगा एक हाथ में ढेर सारे कमलगट्टे उसने खसोट रखे थे। लौटने के लिए मुड़ा, तो तैरने में दिक्कत होने लगी। जिस रास्ते से पानी काटता हुआ वह लौटना चाहता था, वहाँ पुरइन की घनी नालें आपस में उलझी हुई थीं। उसका पैर नालों में उलझ गया और तालाब के बीचों—बीच वह बक—बक करने लगा।
परमेसुरा जब भैंस को पानी पिलाने तालाब आया तो उसने गुड़प गुड़प की आवाज सुनी। उसे लगा, कोई बहुत बड़ी सौर मछली तालाब में मस्त होकर ऐंठ रही है। जेठ के महीने में वैसे भी मछलियों में गर्मी चढ़ जाती है। उसने कपड़े उतारे और पानी में हेल गया। जहाँ पर मछली तड़प रही थी वहाँ उसने गोता लगाकर मछली के गलफड़ों को अपने पंजों में दबोच लेना चाहा तो उसके हाथ में टेपचू की गर्दन आई। वह पहले तो डरा, फिर उसे खींचकर बाहर निकाल लाया। टेपचू अब मरा हुआ-सा पड़ा था। पेट गुब्बारे की तरह फूल गया था और नाक—कान से पानी की धार लगी हुई थी। टेपचू नंगा था और उसकी पेशाब निकल रही थी। परमेसुरा ने उसकी टाँगे पकड़कर उसे लटकाकर पेट में ठेहुना मारा तो भल—भल करके पानी मुँह से निकला।
एक बाल्टी पानी की उल्टी करने के बाद टेपचू मुस्कराया। उठा और बोला
‘काका, थोड़े—से कमलगट्टे तालाब से खींच दोगे क्या? मैंने इत्ता सारा तोड़ा था, साला सब छूट गया। बड़ी भूख लगी है।” परमेसुरा ने भैंस हाँकने वाले डंड़े से टेपचू के चूतड़ में चार—पाँच डंडे जमाए और गालियाँ देता हुआ लौट गया।
गाँव के बाहर, कस्बे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे सरकारी नर्सरी थी। वहाँ पर प्लांटेशन का काम चल रहा था। बिड़ला के पेपर मिल के लिए बाँस, सागौन और यूक्लिप्टस के पेड़ लगाए गए थे। उसी नर्सरी में, काफी भीतर ताड़ के भी पेड़ थे। गाँव में ताड़ी पीने वालों की अच्छी—खासी तादाद थी। ज्यादातर आदिवासी मजदूर, जो पी.डब्ल्यू.डी. में सड़क बनाने तथा राखड़ गिट्टी बिछाने का काम करते थे, दिन—भर की थकान के बाद रात में ताड़ी पीकर धुत हो जाते थे। पहले वे लोग साँझ का झुटपुटा होते ही मटका ले जाकर पेड़ में बाँध देते थे। ताड़ का पेड़ बिल्कुल सीधा होता है। उस पर चढ़ने की हिम्मत या तो छिपकली कर सकती है या फिर मजदूर। सुबह तक मटके में ताड़ी जमा हो जाती थी। लोग उसे उतार लाते।
ताड़ पर चढ़ने के लिए लोग बाँस की पक्सियाँ बनाते थे और उस पर पैर फँसा कर चढ़ते थे। इसमें गिरने का खतरा कम होता। अगर उतनी ऊँचाई से कोई आदमी गिर जाता तो उसकी हड्डियाँ बिखर सकती थीं।
अब ताड़ के उन पेड़ों पर किशनपाल सिंह की मिल्कियत हो गई थी। पटवारी ने उस सरकारी नर्सरी के भीतर भी उस जमीन को किशनपाल सिंह के पट्टे में निकाल दिया था। अब ताड़ी निकलवाने का काम वही करते थे। ग्राम पंचायत भवन के बैठकी वाले कमरे में, जहाँ महात्मा गांधी की तस्वीर टँगी हुई थी, उसी के नीचे शाम को ताड़ी बाँटी जाती। कमरे के भीतर और बाहर ताड़ीखोर मजदूरों की अच्छी—खासी जमात इकठ्ठा हो जाती थी। किशनपाल सिंह को भारी आमदनी होती थी।
एक बार टेपचू ने भी ताड़ी चखनी चाही। उसने देखा था कि जब गाँव के लोग ताड़ी पीते तो उनकी आँखें आह्लाद से भर जातीं। चेहरे से सुख टपकने लगता। मुस्कान कानों तक चौड़ी हो जाती, मंद—मंद। आनंद और मस्ती में डूबे लोग साल्हो—दादर गाते, ठहाके लगाते और एक—दूसरे की माँ—बहन की ऐसी तैसी करते। कोई बुरा नहीं मानता था। लगता जैसे लोग प्यार के अथाह समुंदर में एक साथ तैर रहे हो।
टेपचू को लगा कि ताड़ी जरूर कोई बहुत ऊँची चीज है। सवाल यह था कि ताड़ी पी कैसे जाए। काका लोगों से माँगने का मतलब था, पिट जाना। पिटने से टेपचू को सख्त नफरत थी। उसने जुगाड़ जमाया और एक दिन बिल्कुल तड़के, जब सुबह ठीक से हो भी नहीं पाई थी, आकाश में इक्का—दुक्का तारे छितरे हुए थे, वह झाड़ा फिरने के बहाने घर से निकल गया।
ताड़ की ऊँचाई और उस ऊँचाई पर टँगे हुए पके नींबू के आकार के मटके उसे डरा नहीं रहे थे, बल्कि अदृश्य उँगलियों से इशारा कर उसे आमंत्रित कर रहे थे। ताड़ के हिलते हुए डैने ताड़ी के स्वाद के बारे में सिर हिला—हिलाकर बतला रहे थे। टेपचू को मालूम था कि छपरा जिले का लठ्ठबाज मदना सिंह ताड़ी की रखवाली के लिए तैनात था। वह जानता था कि मदना सिंह अभी ताड़ी की खुमारी में कहीं खर्राटें भर रहा होगा। टेपचू के दिमाग में डर की कोई हल्की सी खरोंच तक नहीं थी।
वह गिलहरी की तरह ताड़ के एकसार सीधे तने से लिपट गया और ऊपर सरकने लगा। पैरों में न तो बाँस की पक्सियाँ थी और न कोई रस्सी ही। पंजों के सहारे वह ऊपर सरकता गया। उसने देखा, मदना सिंह दूर एक आम के पेड़ के नीचे अँगोछा बिछाकर सोया हुआ है। टेपचू अब काफी ऊँचाई पर था। आम, महुए बहेड़ा और सागौन के गबदू से पेड़ उसे और ठिंगने नजर आ रहे थे। “अगर मैं गीध की तरह उड़ सकता तो कित्ता मजा आता।” टेपचू ने सोचा। उस ने देखा, उसकी कुहनी के पास एक लाल चींटी रेंग रही थी, “ससुरी” उसने एक भद्दी गाली बकी और मटके की ओर सरकने लगा।
मदना सिंह जमुहाइयाँ लेने लगा था और हिल—डुलकर जतला रहा था कि उसकी नींद अब टूटने वाली है। धुँधलका भी अब उतना नहीं रह गया था। सारा काम फुर्ती से निपटाना पड़ेगा। टेपचू ने मटके को हिलाया। ताड़ी चौथाई मटके तक इकठ्ठी हो गई थी। उसने मटके में हाथ डालकर ताड़ी की थाह लेनी चाही और बस, यहीं सारी गड़बड़ हो गई।
मटके में फनियल करैत साँप घुसा हुआ था। असल नाग। ताड़ी पीकर वह भी धुत था। टेपचू का हाथ अंदर गया तो वह उसके हाथ में बौड़कर लिपट गया। टेपचू का चेहरा राख की तरह सफेद हो गया। गीध की तरह उड़ने जैसी हरकत उसने की। ताड़ का पेड़ एक तरफ हो गया और उसके समानांतर टेपचू वजनी पत्थर की तरह नींचे को जा रहा था। मटका उसके पीछे था।
जमीन पर टेपचू गिरा तो धप्प की आवाज के साथ एक मरते हुए आदमी की अंतिम कराह भी उसमें शामिल थी। इसके बाद मटका गिरा और उसके हिज्जे—हिज्जे बिखर गए। काला साँप एक ओर पड़ा हुआ ऐंठ रहा था। उसकी रीढ़ की हडि्ड़याँ टूट गई थीं।
मदना सिंह दौड़ा। उसने आकर देखा तो उसकी हवा खिसक गई। उसने ताड़ की फुनगी से मटके समेत टेपचू को गिरते हुए देखा था। बचने की कोई संभावना नहीं थी। उसने एक—दो बार टेपचू को हिलाया—डुलाया। फिर गाँव की ओर हादसे की खबर देने दौड़ गया।
धाड़ मार—मारकर रोती, छाती कूटती फिरोजा लगभग सारे गाँव के साथ वहाँ पहुँची। मदना सिंह उन्हें मौके की ओर ले गया, लेकिन मदना सिंह बक्क रह गया। ऐसा नहीं हो सकता — यही ताड़ का पेड़ था, इसी के नीचे टेपचू की लाश थी। उसने ताड़ी के नशे में सपना तो नहीं देखा था? लेकिन फूटा हुआ मटका अब भी वहीं पड़ा हुआ था। साँप का सिर किसी ने पत्थर के टुकड़े से अच्छी तरह थुर दिया था। लेकिन टेपचू का कहीं अता—पता नहीं था। आसपास खोज की गई, लेकिन टेपचू मियाँ गायब थे।
गाँववालों को उसी दिन विश्वास हो गया कि हों न हों टेपचू साला जिन्न है, वह कभी मर नहीं सकता।
फिरोजा की सेहत लगातार बिगड़ रही थी। गले के दोनों ओर की हड्डियाँ उभर आई थीं। स्तन सूखकर खाली थैलियों की तरह लटक गए थे। पसलियाँ गिनी जा सकती थीं। टेपचू को वह बहुत अधिक प्यार करती थी। उसी के कारण उसने दूसरा निकाह नहीं किया था।
टेपचू की हरकतों से फिरोजा को लगने लगा कि वह कहीं बहेतू और आवारा होकर न रह जाए। इसीलिए उसने एक दिन गाँव के पंडित भगवानदीन के पैर पकड़े। पंडित भगवानदीन के घर में दो भैंसें थीं और खेती पानी के अलावा दूध पानी बेचने का धंधा भी करते थे। उनको चरवाहे की ज़रूरत थी इसलिए पन्द्रह रूपए महीने और खाना खुराक पर टेपचू रख लिया गया। भगवानदीन असल काइयाँ थे। खाने के नाम पर रात का बचा—खुचा खाना या मक्के की जली—भूनी रोटियाँ टेपचू को मिलतीं। करार तो यह था कि सिर्फ भैसों की देखभाल टेपचू को करनी पड़ेगी, लेकिन वास्तव में भैसों के अलावा टेपचू को पंडित के घर से लेकर खेत—खलिहान तक का सारा काम करना पड़ता था। सुबह चार बजे उसे जगा दिया जाता और रात में सोते—सोते बारह बज जाते। एक महीने में ही टेपचू की हालत देखकर फिरोजा पिघल गई। छाती में भीतर से रूलाई का जोरदार भभका उठा। उसने टेपचू से कहा भी कि बेटा इस पंडित का द्वार छोड़ दे। कहीं और देख लेंगे। यह तो मुआ कसाई है पूरा, लेकिन टेपचू ने इंकार कर दिया।
टेपचू ने यहाँ भी जुगाड़ जमा लिया। भैसों को जंगल में ले जाकर वह छुट्टा छोड़ देता और किसी पेड़ के नीचे रात की नींद पूरी करता। इसके बाद उठता। सोन नदी में भैसों को नहलाता, कुल्ला वगैरह करता। फिर इधर—उधर अच्छी तरह से देख—ताककर डालडा के खाली डिब्बे में एक किलो भैंस का ताजा दूध दुहकर चढ़ा लेता। उसकी सेहत सुधरने लगी।
एक बार पंडिताइन ने उसे किसी बात पर गाली बकी और खाने के लिए सड़ा हुआ बासी भात दे दिया। उस दिन टेपचू को पंडित के खेत की निराई भी करनी पड़ी थी और थकान और भूख से वह बेचैन था। भात का कौर मुँह में रखते ही पहले तो खटास का स्वाद मिला, फिर उबकाई आने लगी। उसने सारा खाना भैसों की नाँद में डाल दिया और भैसों को हाँककर जंगल ले गया।
शाम को जब भैसें दुही जाने लगीं तो छटाँक भर भी दूध नहीं निकला। पंडित भगवानदीन को शक पड़ गया और उन्होंने टेपचू की जूतों से पिटाई की। देर तक मुर्गा बनाए रखा, दीवाल पर उकडू बैठाया, थप्पड़ चलाए और काम से उसे निकाल दिया।
इसके बाद टेपचू पी.डब्ल्यू.डी. में काम करने लगा। राखड़ मुरम, बजरी बिछाने का काम। सड़क पर डामर बिछाने का काम। बड़े—बड़े मर्दों के लायक काम। चिलचिलाती धूप में। फिरोजा मकई के आटे में मसाला — नमक मिलाकर रोटियाँ सेंक देती। टेपचू काम के बीच में, दोपहर उन्हें खाकर दो लोटा पानी सड़का लेता।
ताज्जुब था कि इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद टेपचू सिझ—पककर मजबूत होता चला गया। काठी कढ़ने लगी। उसकी कलाई की हडि्ड़याँ चौड़ी होती गईं, पेशियों में मछलियाँ मचलने लगीं। आँखों में एक अक्खड़ रौब और गुस्सा झलकने लगा। पंजे लोहे की माफिक कड़े होते गए।
एक दिन टेपचू एक भरपूर आदमी बन गया। जवान।
पसीने, मेहनत, भूख, अपमान, दुर्घटनाओं और मुसीबतों की विकट धार को चीरकर वह निकल आया था। कभी उसके चेहरे पर पस्त होने, टूटने या हार जाने का गम नहीं उभरा।
उसकी भौहों को देखकर एक चीज हमेशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराती—गुस्सा, या शायद घृणा की थरथराती हुई रोशन पर्त।
मैंने इस बीच गाँव छोड़ दिया और बैलाडिला के आयरन ओर मिल में नौकरी करने लगा। इस बीच फिरोजा की मौत हो गई। बालदेव, संभारू और राधे के अलावा गाँव के कई और लोग बैलाडिला में मजदूरी करने लगे। पंडित भगवानदीन को हैजा हो गया और वे मर गए। हाँ, किशनपाल सिंह उसी तरह ताड़ी उतरवाने का धंधा करते रहे। वे कई सालों से लगातार सरपंच बन रहे थे। कस्बे में उनकी पक्की हवेली खड़ी हो गई और बाद में वे एम.एल.ए. हो गए।
लंबा अर्सा गुजर गया। टेपचू की खबर मुझे बहुत दिनों तक नहीं मिली लेकिन यह निश्चित था कि जिन हालात में टेपचू काम कर रहा था, अपना खून निचोड़ रहा था, अपनी नसों की ताकत चट्टानों में तोड़ रहा था — वे हालात किसी के लिए भी जानलेवा हो सकते थे।
टेपचू से मेरी मुलाकात पर तब हुई, जब वह बैलाडिला आया। पता लगा कि किशनपाल सिंह ने गुंडों से उसे बुरी तरह पिटवाया था। गुंडों ने उसे मरा हुआ जानकर सोन नदी में फेंक दिया था, लेकिन वह सही सलामत बच गया और उसी रात किशनपाल सिंह की पुआल में आग लगाकर बैलाडिला आ गया। मैंने उसकी सिफारिश की और वह मजदूरी में भर्ती कर लिया गया।
वह सन् अठहत्तर का साल था।
हमारा कारखाना जापान की मदद से चल रहा था। हम जितना कच्चा लोहा तैयार करते, उसका बहुत बड़ा हिस्सा जापान भेज दिया जाता। मजदूरों को दिन—रात खदान में काम करना पड़ता।
टेपचू इस बीच अपने साथियों से पूरी तरह घुल—मिल गया था। लोग उसे प्यार करते। मैंने वैसा बेधड़क, निडर और मुँहफट आदमी और नहीं देखा। एक दिन उसने कहा था, “काका, मैंने अकेले लड़ाइयाँ लड़ी है। हर बार मैं पिटा हूँ। हर बार हारा हूँ। अब अकेले नहीं, सबके साथ मिलकर देखूँगा कि सालों में कितना जोर है।
इन्हीं दिनों एक घटना हुई। जापान ने हमारे कारखाने से लोहा खरीदना बंद कर दिया, जिसकी वजह से सरकारी आदेश मिला कि अब हमें कच्चे लोहे का उत्पादन कम करना चाहिए। मजदूरों की बड़ी तादाद में छँटनी करने का सरकारी फरमान जारी हुआ। मजदूरों की तरफ से माँग की गई कि पहले उनकी नौकरी का कोई दूसरा बंदोबस्त कर दिया जाए तभी उनकी छँटनी की जाए। इस माँग पर बिना कोई ध्यान दिए मैनेजमेंट ने छँटनी पर फौरन अमल शुरू कर दिया। मजदूर यूनियन ने विरोध में हड़ताल का नारा दिया। सारे मजदूर अपनी झुग्गियों में बैठ गए। कोई काम पर नहीं गया।
चारों तरफ पुलिस तैनात कर दी गई। कुछ गश्ती टुकड़ियाँ भी रखी गई, जो घूम—घूमकर स्थिति को कुत्तों की तरह सूँघने का काम करती थीं। टेपचू से मेरी भेंट उन्हीं दिनों शेरे पंजाब होटल के सामने पड़ी लकड़ी की बेंच पर बैठे हुए हुई। वह बीड़ी पी रहा था। काले रंग की निकर पर उसने खादी का एक कुर्ता पहन रखा था।
मुझे देखकर वह मुस्कराया, “सलाम काका, लाल सलाम।” फिर अपने कत्थे—चूने से रंगे मैले दांत निकालकर हँस पड़ा, मनेजमेंट की गाँड़ में हमने मोटा डंडा घुसेड़ रखा है। साले बिलबिला रहे हैं, लेकिन निकाले निकलता नहीं काका, दस हजार मजदूरों को भुक्खड़ बनाकर ढोरों की माफिक हाँक देना कोई हँसी—ठठ्ठा नहीं है। छँटनी ऊपर की तरफ से होनी चाहिए। जो पचास मजदूरों के बराबर पगार लेता हो, निकालो सबसे पहले उसे, छाँटो अजमानी साहब को पहले।
टेपचू बहुत बदल गया था। मैंने गौर से देखा उसकी हँसी के पीछे घृणा, वितृष्णा और गुस्से का विशाल समुंदर पछाड़े मार रहा था। उसकी छाती उघड़ी हुई थी। कुर्ते के बटन टूटे हुए थे। कारखाने के विशालकाय फाटक की तरह खुले हुए कुर्ते के गले के भीतर उसकी छाती के बाल हिल रहे थे, असंख्य मजदूरों की तरह, कारखाने के मेन गेट पर बैठे हुए। टेपचू ने अपने कंधे पर लटकते हुए झोले से पर्चे निकाले और मुझे थमाकर तीर की तरह चला गया।
कहते हैं, तीसरी रात यूनियन ऑफिस पर पुलिस ने छापा मारा। टेपचू वहीं था। साथ में और भी कई मजदूर थे। यूनियन ऑफिस शहर से बिल्कुल बाहर दूसरी छोर पर था। आस—पास कोई आबादी नहीं थी। इसके बाद जंगल शुरू हो जाता था। जंगल लगभग दस मील तक के इलाके में फैला हुआ था।
मजदूरों ने पुलिस को रोका, लेकिन दरोगा करीम बख्श तीन—चार कांस्टेबुलों के साथ जबर्दस्ती अंदर घुस गया। उसने फाइलों, रजिस्टरों, पर्चों को बटोरना शुरू किया। तभी टेपचू सिपाहियों को धकियाते हुए अंदर पहुँचा और चीखा, “कागज—पत्तर पर हाथ मत लगाना दरोगाजी, हमारी डूटी आज यूनियन की तकवानी में हैं। हम कहे दे रहे हैं। आगा—पीछा हम नहीं सोचते, पर तुम सोच लो, ठीक तरह से।”
दरोगा चौंका। फिर गुस्से में उसकी आँखें गोल हो गई, और नथुने साँढ़ की तरह फड़कने लगे, “कौन है मादर तूफानी सिंह, लगाओ साले को दस डंडे।”
सिपाही तूफानी सिंह आगे बढ़ा तो टेपचू की लंगड़ी ने उसे दरवाजे के आधा बाहर और आधा भीतर मुर्दा छिपकली की तरह जमीन पर पसरा दिया। दरोगा करीम बख्श ने इधर—उधर देखा। सिपाही मुस्तैद थे, लेकिन कम पड़ रहे थे। उन्होंने इशारा किया लेकिन तब तक उनकी गर्दन टेपचू की भुजाओं में फँस चुकी थी।
मजदूरों का जत्था अंदर आ गया और तड़ातड़ लाठियाँ चलने लगीं। कई सिपाहियों के सिर फूटे। वे रो रहे थे और गिड़गिड़ा रहे थे। टेपचू ने दरोगा को नंगा कर दिया था।
पिटी हुई पुलिस पलटन का जुलूस निकाला गया। आगे—आगे दरोगाजी, फिर तूफानी सिंह, लाइन से पाँच सिपाहियों के साथ। पीछे—पीछे मजदूरों का हुजूम ठहाके लगाता हुआ। पुलिस वालों की बुरी गत बनी थी। यूनियन ऑफिस से निकलकर जुलूस कारखाने के गेट तक गया, फिर सिपाहियों को छोड़कर मस्ती और गर्व में डूबे हुए लोग लौट गए। टेपचू की गर्दन अकड़ी हुई थी और वह साल्हो दादर गाने लगा था।
अगले दिन सबेरे टेपचू झुग्गी से निकलकर टट्टी करने जा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। और भी बहुत से लोग पकड़े गए थे। चारों तरफ गिरफ्तारियाँ चल रही थीं।
टेपचू को जब पकड़ा गया तो उसने टट्टीवाला लोटा खींचकर तूफानीसिंह को मारा। लोटा माथे के बीचोंबीच बैठा और गाढ़ा गंदा खून छलछला आया। टेपचू ने भागने की कोशिश की, लेकिन वह घेर लिया गया। गुस्से में पागल तूफानी सिंह ने तड़ातड़ डंडे चलाए। मुँह से बेतहाशा गालियाँ फूट रही थीं।
सिपाहियों ने उसे जूते से ठोकर मारी। घूँसे—लात चलाए। दरोगा करीम बख्श भी जीप से उतर आए। यूनियन ऑफिस में की गई अपनी बेइज्जती उन्हें भूली नहीं थी। दरोगा करीम बख्श ने तूफानी सिंह से कहा कि टेपचू को नंगा किया जाए और गाँड़ में एक लकड़ी ठोंक दी जाए। तूफानी सिंह ने यह काम सिपाही गजाधर शर्मा के सुपुर्द किया।
गजाधर शर्मा ने टेपचू का निकर खींचा तो दरोगा करीम बख्श का चेहरा फक हो गया। फिरोजा ने टेपचू की बाकायदा खतौनी कराई थी। टेपचू दरोगा का नाम तो नही जानता था, लेकिन उसका चेहरा देखकर जात जरूर जान गया। दरोगा करीम बख्श ने टेपचू की कनपटी पर एक डंडा जमाया, “मादर ऩाम क्या है तेरा?
टेपचू ने कुर्ता उतारकर फेंक दिया और मादरजाद अवस्था में खड़ा हो गया, “अल्ला बख्श बलद अब्दुल्ला बख्श साकिन मड़र मौजा पौंड़ी, तहसील सोहागपुर, थाना जैतहरी, पेशा मजदूरी” इसके बाद उसने टाँगे चौड़ी कीं, घूमा और गजाधर शर्मा, जो नीचे की ओर झुका हुआ था, उसके कंधे पर पेशाब की धार छोड़ दी, “ज़िला शहडोल, हाल बासिंदा बैलाडिला”
टेपचू को जीप के पीछे रस्सी से बाँधकर डेढ़ मील तक घसीटा गया। सड़क पर बिछी हुई बजड़ी और मुरम ने उसकी पीठ की पर्त निकाल दी। लाल टमाटर की तरह जगह—जगह उसका गोश्त बाहर झाँकने लगा।
जीप कस्बे के पार आखिरी चुंगी नाके पर रूकी। पुलिस पलटन का चेहरा खूँखार जानवरों की तरह दहक रहा था। चुंगी नाकेपर एक ढाबा था। पुलिस वाले वहीं चाय पीने लगे।
टेपचू को भी चाय पीने की तलब महसूस हुई, “एक चा इधर मारना छोकड़े, कड़क।” वह चीखा। पुलिस वाले एक—दूसरे की ओर कनखियों से देखकर मुस्कराए। टेपचू को चाय पिलाई गई। उसकी कनपटी पर गूमड़ उठ आया था और पूरा शरीर लोथ हो रहा था। जगह—जगह से लहू चुहचुहा रहा था।
जीप लगभग दस मील बाद जंगल के बीच रूकी। जगह बिलकुल सुनसान थी। टेपचू को नीचे उतारा गया। गजाधर शर्मा ने एक दो डंडे और चलाए। दरोगा करीम बख्श भी जीप से उतरे और उन्होंने टेपचू से कहा, “अल्ला बख्श उर्फ टेपचू, तुम्हें दस सेकेंड का टाइम दिया जाता है। सरकारी हुकुम मिला है कि तुम्हारा जिला बदल कर दिया जाए। सामने की ओर सड़क पर तुम जितनी जल्द दूर—से—दूर भाग सकते हो, भागो। हम दस तक गिनती गिनेंगे।
टेपचू लँगड़ाता—डगमगाता चल पड़ा। करीम बख्श खुद गिनती गिन रहे थे। एक—दो—तीन—चार—पाँच। लंगड़े, बूढ़े, बीमार बैल की तरह खून में नहाया हुआ टेपचू अपने शरीर को घसीट रहा था। वह खड़ा तक नहीं हो पा रहा था, चलने और भागने की तो बात दूर थी।
अचानक दस की गिनती खत्म हो गई। तूफानी सिंह ने निशाना साधकर पहला फायर किया धाँय।
गोली टेपचू की कमर में लगी और वह रेत के बोरे की तरह जमीन पर गिर पड़ा। कुछ सिपाही उसके पास पहुँचे। कनपटी पर बूट मारी। टेपचू कराह रहा था, “हरामजादो।
गजाधर शर्मा ने दरोगा से कहा, “साब अभी थोड़ा बहुत बाकी है।” दरोगा करीम बख्श ने तूफानी सिंह को इशारा किया। तूफानी सिंह ने करीब जाकर टेपचू के दोनों कंधों के पास, दो—दो इंच नीचे दो गोलियाँ और मारीं, बंदूक की नाल लगभग सटाकर। नीचे की जमीन तक उधड़ गई।
टेपचू धीमे—धीमे फड़फड़ाया। मुँह से खून और झाग के थक्के निकले। जीभ बाहर आई। आँखें उलटकर बुझीं। फिर वह ठंडा पड़ गया।
उसकी लाश को जंगल के भीतर महुए की एक डाल से बाँधकर लटका दिया गया था। मौके की तस्वीर ली गई पुलिस ने दर्ज किया कि मजदूरों के दो गुटों में हथियारबंद लड़ाई हुई। टेपचू उर्फ अल्ला बख्श को मारकर पेड़ में लटका दिया गया था। पुलिस ने लाश बरामद की। मुजरिमों की तलाश जारी है।
इसके बाद टेपचू की लाश को सफेद चादर से ढककर संदूक में बंद कर दिया गया और जीप में लादकर पुलिस चौकी लाया गया।
रायगढ़ बस्तर, भोपाल सभी जगह से पुलिस की टुकडियाँ आ गई थीं। सी.आर.पी.वाले गश्त लगा रहे थे। चारों ओर धुआँ उठ रहा था। झुग्गियाँ जला दी गई थीं। पचासों मजदूर मारे गए। पता नहीं क्या—क्या हुआ था।
सुबह टेपचू की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा गया। डॉ. एडविन वर्गिस ऑपरेटर थिएटर में थे। वे बड़े धार्मिक किस्म के ईसाई थे। ट्राली—स्ट्रेचर में टेपचू की लाश अंदर लाई गई। डॉ. वर्गिस ने लाश की हालत देखी। जगह—जगह थ्री—नॉट—थ्री की गोलियाँ धँसी हुई थीं। पूरी लाश में एक सूत जगह नहीं थी, जहाँ चोट न हो।
उन्होंने अपना मास्क ठीक किया, फिर उस्तरा उठाया। झुके और तभी टेपचू ने अपनी आँखें खोलीं। धीरे से कराहा और बोला, “डॉक्टर साहब, ये सारी गोलियाँ निकाल दो। मुझे बचा लो। मुझे इन्हीं कुत्तों ने मारने की कोशिश की है।
डॉक्टर वर्गिस के हाथ से उस्तरा छूटकर गिर गया। एक घिघियाई हुई चीख उनके कंठ से निकली और वे ऑपरेशन रूम से बाहर की ओर भागे।
आप कहेंगे कि ऐसी अनहोनी और असंभव बातें सुनाकर मैं आपका समय खराब कर रहा हूँ। आप कह सकते हें कि इस पूरी कहानी में सिवा सफेद झूठ के और कुछ नहीं है।
मैंने भी पहले ही अर्ज किया था कि यह कहानी नहीं है, सच्चाई है। आप स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि जीवन की वास्तविकता किसी भी काल्पनिक साहित्यिक कहानी से ज्यादा हैरत अंगेज होती है। और फिर ऐसी वास्तविकता जो किसी मजदूर के जीवन से जुड़ी हुई हो।
हमारे गाँव मड़र के अलावा जितने भी लोग टेपचू को जानते हैं वे यह मानते हैं कि टेपचू कभी मरेगा नहीं — साला जिन्न है।
आपको अब भी विश्वास न होता हो तो जहाँ, जब, जिस वक्त आप चाहें, मैं आपको टेपचू से मिलवा सकता हूँ।
पात्र परिचय
उदय प्रकाश की कहानी ‘टेपचू’ के पात्र समाज के विभिन्न वर्गों, उनकी क्रूरता और एक साधारण मजदूर की अदम्य जिजीविषा अर्थात् जीने की इच्छा को दर्शाते हैं। यहाँ कहानी के मुख्य पात्रों का विस्तृत परिचय कुछ इस प्रकार समझ सकते हैं –
- टेपचू (मुख्य पात्र)
टेपचू कहानी का नायक है, जो एक गरीब मुसलमान ‘अब्बी’ का बेटा है।
- अदम्य साहस – टेपचू का पूरा जीवन दुर्घटनाओं और संघर्षों से भरा है। वह बचपन में कुपोषण का शिकार था, लेकिन बाद में अपनी मेहनत से एक मजबूत और अक्खड़ मजदूर बनता है।
- विद्रोही स्वभाव – वह अन्याय के खिलाफ खड़ा होने वाला व्यक्ति है। चाहे गाँव का दबंग किशनपाल सिंह हो या पुलिस का दरोगा, वह किसी से नहीं डरता।
- अमरता का प्रतीक – उसे कहानी में ‘जिन्न’ की तरह दिखाया गया है। वह नदी में डूबने से, ताड़ के पेड़ से गिरकर, नदी में फेंके जाने के बाद और पुलिस की गोलियाँ खाकर भी जीवित बच जाता है। वह मजदूर वर्ग की कभी न हारने वाली शक्ति का प्रतीक है।
- फिरोजा (टेपचू की माँ)
फिरोजा एक संघर्षशील और ममतामयी भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व करती है।
- कठिन परिश्रम – पति की मृत्यु के बाद उसने अकेले टेपचू को पाला। वह दिन-भर खेतों में मजदूरी करती और रात को तकवानी अर्थात् रखवाली करती थी।
- कवच – उसने समाज के दुराचारी पुरुषों से टेपचू की रक्षा की और उसे पालने के लिए अपनी जवानी और स्वास्थ्य सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
- अब्बी (टेपचू के पिता)
अब्बी एक फक्कड़, आवारा और संगीत प्रेमी व्यक्ति था।
- कला प्रेमी – वह हारमोनियम बजाता था और कव्वाल बनना चाहता था।
- अजीब मौत – उसकी मृत्यु एक फिल्मी नृत्य की नकल करते समय नदी के गड्ढे में डूबने से हुई। वह टेपचू के जीवन में एक धुंधली याद की तरह है।
- किशनपाल सिंह (प्रतिनायक/विलेन)
किशनपाल सिंह गाँव के दबंग और शोषक वर्ग का प्रतीक है।
- सत्ता और क्रूरता – वह पहले सरपंच और बाद में एम.एल.ए. बनता है। वह सरकारी जमीनों पर कब्जा करता है और मजदूरों का शोषण करता है।
- दमनकारी – टेपचू जब उसके खिलाफ आवाज उठाता है, तो वह उसे मरवाने की कोशिश करता है। वह कहानी में उस सामंती व्यवस्था को दर्शाता है जो गरीबों को कुचलना चाहती है।
- दरोगा करीम बख्श और तूफानी सिंह
ये पात्र पुलिस प्रशासन की बर्बरता और संवेदनहीनता को दिखाते हैं।
- भ्रष्ट और क्रूर – दरोगा करीम बख्श और सिपाही तूफानी सिंह टेपचू को फर्जी मुठभेड़ में मारने की कोशिश करते हैं।
- मानवता का अभाव – वे एक निहत्थे मजदूर को जीप के पीछे घसीटते हैं और उसे अधमरा करने के बाद भी गोलियाँ मारते हैं।
- डॉ. एडविन वर्गिस
डॉक्टर वर्गिस कहानी के अंत में आते हैं और एक महत्त्वपूर्ण मोड़ लाते हैं।
- मानवीय संवेदना – वे एक धार्मिक और दयालु डॉक्टर हैं। जब वे देखते हैं कि गोलियों से छलनी टेपचू अभी भी जीवित है और उनसे मदद माँग रहा है, तो वे डर और आश्चर्य से भर जाते हैं।
निष्कर्ष –
इस कहानी के पात्रों के माध्यम से उदय प्रकाश ने यह दिखाया है कि जहाँ एक ओर समाज में शोषण (किशनपाल) और दमन (पुलिस) है, वहीं दूसरी ओर संघर्ष (टेपचू) और ममता (फिरोजा) भी है। टेपचू कोई व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि वह हर उस मजदूर का प्रतिनिधित्व करता है जिसे व्यवस्था मिटाना चाहती है, पर वह फिर से जी उठता है।
‘टेपचू’ – कथावस्तु
उदय प्रकाश की कहानी ‘टेपचू’ एक साधारण मजदूर की असाधारण जिजीविषा और व्यवस्था के क्रूर दमन के बीच के संघर्ष की गाथा है। इसकी कथावस्तु को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है –
- टेपचू का जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
कहानी सोन नदी के किनारे बसे मड़र गाँव से शुरू होती है। टेपचू एक फक्कड़ मुसलमान अब्बी और मेहनतकश फिरोजा की संतान है। अब्बी कव्वाल बनने का शौकीन था और उसकी मृत्यु एक अजीबोगरीब हादसे में सोन नदी के गड्ढे में डूबने से हो गई। टेपचू का बचपन घोर गरीबी और कुपोषण में बीता। वह इतना दुर्बल और फोड़ों से भरा था कि लोग उसके मरने का इंतज़ार करते थे, लेकिन फिरोजा ने हाड़-तोड़ मेहनत कर उसे पाल-पोसकर बड़ा किया।
- बचपन के हैरतअंगेज हादसे
टेपचू बचपन से ही मृत्यु को मात देने वाला सिद्ध हुआ। कहानी में उसके जीवन के तीन प्रमुख हादसे उसकी ‘अमरता’ की नींव रखते हैं –
- भुतहा बगीचा – सात साल की उम्र में वह रात के अँधेरे में ‘भुतहा बगीचे’ से अपनी माँ के लिए अमिया तोड़ लाता है, जहाँ जाने से बड़े-बड़े सूरमा डरते थे।
- कमलगट्टे का हादसा – तालाब में कमलगट्टे तोड़ते समय वह डूबने ही वाला था कि उसे बचा लिया गया। होश आते ही वह फिर से कमलगट्टों की माँग करता है।
- ताड़ का पेड़ और काला साँप – ताड़ी पीने के लालच में वह ताड़ के ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया, जहाँ मटके में छिपे साँप ने उसे डँस लिया। वह उतनी ऊँचाई से नीचे गिरा, लेकिन मरा नहीं। जब गाँव वाले उसकी लाश लेने पहुँचे, तो वह गायब था। गाँव में यह बात फैल गई कि टेपचू ‘जिन्न’ है।
- मजदूरी और संघर्ष का आरंभ
जैसे-जैसे टेपचू बड़ा हुआ, वह शारीरिक रूप से बेहद मजबूत और स्वभाव से अक्खड़ हो गया। उसने पंडित भगवानदीन के यहाँ चरवाहे का काम किया, जहाँ उसने पंडित की चालाकी का जवाब भैंसों का दूध खुद पीकर दिया। बाद में उसने पीडबल्यूडी में सड़क बनाने का भारी काम किया। गाँव के सरपंच और दबंग किशनपाल सिंह से उसका विवाद हुआ, जिसके बाद उसे बुरी तरह पिटवाकर नदी में फेंक दिया गया। टेपचू फिर जीवित बच गया और किशनपाल की पुआल में आग लगाकर बैलाडिला (बस्तर) की खदानों में काम करने चला गया।
- बैलाडिला का श्रमिक आंदोलन
बैलाडिला में टेपचू एक सचेत मजदूर बन गया। 1978 के दौरान जब कारखाने में छँटनी शुरू हुई, तो टेपचू ने यूनियन के साथ मिलकर विरोध किया। उसने पुलिस की बर्बरता का डटकर मुकाबला किया। एक झड़प के दौरान उसने दरोगा को नंगा कर उसका जुलूस निकलवाया। यह व्यवस्था की नाक पर एक सीधा प्रहार था।
- पुलिस दमन और फर्जी मुठभेड़
अगले ही दिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। दरोगा करीम बख्श ने अपना बदला लेने के लिए उसे अमानवीय यातनाएँ दीं। उसे जीप के पीछे बाँधकर घसीटा गया और फिर जंगल में ले जाकर ‘जिला बदर’ करने के बहाने फर्जी मुठभेड़ (Fake Encounter) में गोलियों से छलनी कर दिया। पुलिस ने उसे मरा हुआ समझकर महुए के पेड़ से लटका दिया और सरकारी कागजों में ‘मजदूरों की आपसी लड़ाई’ का मामला दर्ज कर दिया।
- विस्मयकारी अंत (सच्चाई या मिथक)
जब टेपचू की ‘लाश’ को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल ले जाया गया, तो वहाँ डॉक्टर एडविन वर्गिस के सामने एक चमत्कार हुआ। जैसे ही डॉक्टर ने उस्तरा उठाया, गोलियों से छलनी टेपचू ने आँखें खोलीं और बोला—“डॉक्टर साहब, ये सारी गोलियाँ निकाल दो, मुझे बचा लो।” डॉक्टर डर के मारे भाग खड़े हुए।
निष्कर्ष
कहानी का अंत एक गहरा संदेश छोड़ता है। लेखक कहता है कि यह कहानी नहीं, सच्चाई है। टेपचू उस मजदूर वर्ग का प्रतीक है जिसे पूँजीपति, पुलिस और सत्ता बार-बार मारना चाहती है, लेकिन वह अपनी ‘जीवन शक्ति’ और ‘विद्रोह’ के कारण हर बार मौत के मुँह से वापस आ जाता है। इसीलिए लोग कहते हैं—”टेपचू कभी मरेगा नहीं।”
‘टेपचू’ – मूल संवेदना
- अदम्य जिजीविषा और संघर्ष (Indomitable Will to Live)
कहानी की सबसे प्रमुख संवेदना मजदूर वर्ग की अदम्य जीवन-शक्ति है। टेपचू केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस सर्वहारा वर्ग का प्रतीक है जिसे व्यवस्था (पुलिस, सामंत और पूँजीपति) बार-बार मिटाने का प्रयास करती है। बचपन के रोगों से लेकर पुलिस की गोलियों तक, टेपचू हर मौत को मात देकर वापस आता है। यह दर्शाता है कि जब तक दुनिया में अन्याय रहेगा, प्रतिरोध की आवाज़ (टेपचू) कभी मर नहीं सकती।
- व्यवस्था बनाम हाशिए का समाज
कहानी सत्ता और आम आदमी के बीच के क्रूर अंतर्संबंधों को उजागर करती है।
- सामंती दमन – किशनपाल सिंह जैसे पात्र दर्शाते हैं कि कैसे ग्रामीण भारत में रसूखदार लोग गरीबों का शोषण करते हैं।
- पुलिसिया बर्बरता – दरोगा करीम बख्श और फर्जी मुठभेड़ का दृश्य यह दिखाता है कि कानून के रक्षक ही कैसे भक्षक बन जाते हैं। टेपचू को जीप से घसीटना और गोलियों से छलनी करना आधुनिक लोकतंत्र के भीतर छिपी बर्बरता पर कड़ा प्रहार है।
- जादुई यथार्थवाद (Magical Realism)
उदय प्रकाश ने इस कहानी में ‘सच्चाई’ और ‘अतिमानवीयता’ का अद्भुत मिश्रण किया है।
- टेपचू का ‘जिन्न’ होना – गाँव वालों का यह मानना कि वह कभी मर नहीं सकता, उसकी सहनशक्ति को एक मिथकीय विस्तार देता है।
- अस्पताल का दृश्य – पोस्टमार्टम की मेज पर उसका बोल उठना जादुई यथार्थवाद का बेहतरीन उदाहरण है। यह इस बात का प्रतीक है कि जिसे व्यवस्था ‘मुर्दा’ घोषित कर चुकी है, उसके भीतर अभी भी न्याय की माँग जीवित है।
- श्रम का गौरव और शोषण
कहानी श्रम के सौंदर्य और उसकी त्रासदी को साथ-साथ दिखाती है। फिरोजा का दिन-रात मेहनत करना और टेपचू का पीडबल्यूडी की सड़कों से लेकर बैलाडिला की खदानों तक अपना खून-पसीना एक करना, श्रमिक वर्ग के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता है। लेखक यह सवाल उठाता है कि जो वर्ग देश की नींव रखता है लोहा निकालता है, सड़कें बनाता है, उसे ही ‘छँटनी’ और ‘गोलियों’ का सामना क्यों करना पड़ता है?
- माँ का संघर्ष और प्रेम
फिरोजा का चरित्र कहानी को भावनात्मक गहराई देता है। एक विधवा माँ का अपने ‘घिनौने’ और बीमार बच्चे को पालने के लिए अपनी जवानी और गरिमा को दाँव पर लगा देना, मानवीय संवेदना की पराकाष्ठा है। टेपचू का अस्तित्व उसकी माँ के संघर्षों की ही परिणति है।
निष्कर्ष –
‘टेपचू’ हमें यह सिखाती है कि सच्चाई अक्सर कल्पना से अधिक हैरतअंगेज होती है। यह कहानी मजदूर के अपमानित जीवन की नहीं, बल्कि उसकी अपराजेयता (Invincibility) की महागाथा है।
‘टेपचू’ – सामाजिक विसंगतियाँ
उदय प्रकाश की कहानी ‘टेपचू’ भारतीय समाज की उन गहरी दरारों और विसंगतियों को उघाड़कर सामने रखती है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में अनदेखा कर दिया जाता है। इस कहानी में सामाजिक विसंगतियों के कई रूप दिखाई देते हैं –
- सामंती व्यवस्था और शोषक वर्ग (Feudal Oppression)
कहानी में चौधरी किशनपाल सिंह के माध्यम से ग्रामीण भारत की सामंती विसंगति को दिखाया गया है।
- जमीन पर अवैध कब्जा – किशनपाल सिंह सरकारी नर्सरी और बगीचों पर पट्टा कराकर कब्जा कर लेता है।
- शक्ति का दुरुपयोग – वह सरपंच से एम.एल.ए. तक का सफर तय करता है, जो यह दिखाता है कि राजनीति और सत्ता पर अपराधी और शोषक वर्ग का नियंत्रण किस कदर बढ़ गया है। वह गरीबों की ताड़ी से लेकर उनकी मेहनत तक सब कुछ डकार जाता है।
- जातीय और धार्मिक पूर्वाग्रह (Caste and Religious Bias)
टेपचू के पिता अब्बी और उसकी माँ फिरोजा के प्रति गाँव का नजरिया सामाजिक भेदभाव का प्रमाण है।
- हाशिए पर मुसलमान – मुसलमानों की बस्ती को चमारों की बस्ती के पास, गाँव से बाहर रखा गया है। उन्हें ‘चिकवा’ या ‘कटुआ’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है।
- सांस्कृतिक तिरस्कार – अब्बी जब गाना-बजाना करता है, तो उसे ‘आर्ट’ नहीं बल्कि ‘भड़ैती’ माना जाता है। समाज की यह संकीर्णता किसी गरीब की कला को सम्मान देने के बजाय उसे हिकारत से देखती है।
- लिंग आधारित शोषण और स्त्री की त्रासदी (Gender Exploitation)
टेपचू की माँ फिरोजा के माध्यम से लेखक ने विधवा और गरीब स्त्री की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
- गंदी नजरें – फिरोजा को अकेला जानकर गाँव के ‘खाते-पीते घरानों के छोकरे’ उसे पकड़ने की ताक में रहते हैं।
- श्रम की अनदेखी – फिरोजा हाड़-तोड़ मेहनत करती है, लेकिन समाज उसे सहानुभूति देने के बजाय उसके ‘मैले और पसीने’ से भरे शरीर से घिन करता है। एक माँ का संघर्ष समाज के लिए केवल एक ‘मजदूरी’ बनकर रह जाता है।
- पुलिस और प्रशासन का अपराधीकरण (Criminalization of Police)
कहानी की सबसे बड़ी विसंगति पुलिस व्यवस्था का बर्बर चेहरा है।
- फर्जी मुठभेड़ – पुलिस का दरोगा करीम बख्श और सिपाही तूफानी सिंह कानून की रक्षा करने के बजाय दबंगों के इशारे पर काम करते हैं।
- अमानवीय यातनाएँ – एक निहत्थे मजदूर को जीप से घसीटना और उसे मरा हुआ मानकर फर्जी रिपोर्ट तैयार करना यह दर्शाता है कि कानून केवल रसूखदारों की रखैल बनकर रह गया है।
- औद्योगिक विकास और मजदूरों की छँटनी (Industrial Mismanagement)
बैलाडिला के माध्यम से कहानी औद्योगिक विसंगति को भी उजागर करती है।
- जापान की मदद और मजदूरों का बलिदान – लोहा जापान भेजा जाता है, मुनाफा मैनेजमेंट कमाता है, लेकिन जब संकट आता है तो सबसे पहले मजदूरों की ‘छँटनी’ की जाती है।
- संसाधनों पर अधिकार – जिस मिट्टी से लोहा निकलता है, उसे निकालने वाले मजदूर ही भूखे मरने को मजबूर कर दिए जाते हैं।
- संभ्रांत वर्ग का पाखंड (Hypocrisy of the Elite)
‘भुतहा बगीचे’ की कहानी के माध्यम से लेखक ने उच्च कुलीन परिवारों के पाखंड को उजागर किया है।
- अवैध संतानें – बगीचे में अक्सर स्वस्थ और गोरे नवजात शिशुओं का लावारिस मिलना यह संकेत देता है कि ‘कुलीन’ और ‘संभ्रांत’ होने का ढोंग करने वाले परिवारों के भीतर कितनी गंदगी छुपी है। पुलिस इन मामलों को रफा-दफा कर देती है क्योंकि इसमें रसूखदार लोग शामिल होते हैं।
निष्कर्ष –
‘टेपचू’ केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन तमाम सामाजिक विसंगतियों का कोलाज है जो भारत की आत्मा को लहूलुहान कर रही हैं। यह कहानी दिखाती है कि कैसे गरीबी, जाति, धर्म और सत्ता मिलकर एक साधारण मनुष्य को कुचलने का चक्रव्यूह रचते हैं।
‘टेपचू’ – उज्जवल पक्ष
उदय प्रकाश की कहानी ‘टेपचू’ यद्यपि शोषण, गरीबी और पुलिसिया बर्बरता की एक स्याह तस्वीर पेश करती है, लेकिन इसके भीतर मानवीय जिजीविषा और संघर्ष का एक अत्यंत ‘उज्ज्वल पक्ष’ भी है। यह उज्ज्वल पक्ष निराशा के बीच आशा और पराजय के बीच विजय का प्रतीक है।
1. अपराजेय जिजीविषा (Invincible Willpower)
कहानी का सबसे उज्ज्वल पक्ष टेपचू की ‘कभी न हारने वाली हिम्मत’ है। वह मौत के मुँह से बार-बार वापस आता है। चाहे वह ताड़ के पेड़ से गिरना हो, ताड़ी के मटके में साँप का मिलना हो या पुलिस की गोलियाँ—टेपचू हर बार जीवित बच जाता है। यह इस सत्य को स्थापित करता है कि सत्य और संघर्ष की शक्ति को दुनिया की कोई भी दमनकारी ताकत पूरी तरह मिटा नहीं सकती।
2. मातृ-शक्ति और निस्वार्थ प्रेम
टेपचू की माँ फिरोजा का चरित्र उज्ज्वलता का एक बड़ा स्रोत है। एक विधवा और गरीब माँ का अपने कुपोषित बच्चे को बचाने के लिए समाज की बुरी नज़रों और हाड़-तोड़ मेहनत से लोहा लेना, मानवीय गरिमा का सर्वोच्च उदाहरण है। उसका संघर्ष ही टेपचू को वह आधार देता है जिससे वह आगे चलकर एक मजबूत योद्धा बनता है।
3. ‘मजदूर एकता’ का स्वर
कहानी के दूसरे भाग में बैलाडिला की पृष्ठभूमि में श्रमिक एकजुटता का उज्ज्वल पक्ष उभरता है। टेपचू जो पहले अकेले लड़ता था, अब यूनियन के साथ मिलकर ‘लाल सलाम’ के नारे के साथ खड़ा होता है। यह व्यक्तिगत संघर्ष के सामूहिक क्रांति में बदलने का प्रतीक है। जब टेपचू कहता है—“अब अकेले नहीं, सबके साथ मिलकर देखूँगा कि सालों में कितना जोर है”, तो यह मजदूर वर्ग की जागृति का एक प्रेरणादायक संदेश है।
4. निर्भीकता और आत्म-सम्मान
टेपचू का चरित्र ‘अक्खड़पन’ और ‘निर्भीकता’ से भरा है। वह गरीब और शोषित होने के बावजूद कभी दीन-हीन नहीं दिखता। वह दरोगा को चुनौती देता है, किशनपाल सिंह की आँखों में आँखें डालकर देखता है और अंतिम क्षणों में भी ‘हरामजादो’ कहकर व्यवस्था को ललकारता है। उसका यह आत्म-सम्मान और निडरता उसे एक साधारण पीड़ित से ऊपर उठाकर एक नायक (Hero) बना देती है।
5. सत्य की अमरता
कहानी का अंत जहाँ टेपचू पोस्टमार्टम की मेज पर बोल उठता है, वह सत्य की विजय का जादुई चित्रण है। यह संदेश देता है कि व्यवस्था भले ही किसी को ‘मृत’ घोषित कर दे या उसे मिटाने के दस्तावेज़ तैयार कर ले, लेकिन न्याय की पुकार और सत्य की आवाज़ को दफन नहीं किया जा सकता। गाँव वालों का यह विश्वास कि “टेपचू कभी मरेगा नहीं”, वास्तव में आम आदमी के अटूट विश्वास का उज्ज्वल पक्ष है।
निष्कर्ष –
‘टेपचू’ का उज्ज्वल पक्ष हमें यह सिखाता है कि मनुष्य की चेतना और उसका संघर्ष भौतिक विनाश से कहीं बड़ा है। यह कहानी अँधेरे में जलती हुई उस लौ की तरह है जो हमें विश्वास दिलाती है कि दमन कितना भी क्रूर क्यों न हो, मनुष्य की ‘जीने की इच्छा’ और ‘न्याय की माँग’ हमेशा जीवित रहती है।
‘टेपचू’ – प्राप्त सीखें
उदय प्रकाश की कहानी ‘टेपचू’ पाठक को केवल झकझोरती ही नहीं, बल्कि जीवन, समाज और संघर्ष से जुड़ी कई गहरी शिक्षाएँ (सीख) भी देती है।
- अदम्य साहस और जिजीविषा (Resilience)
कहानी की सबसे बड़ी सीख यह है कि मनुष्य की जीने की इच्छा (जिजीविषा) सबसे बड़ी शक्ति है। टेपचू का बार-बार मौत को मात देना यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों, यदि मन में साहस और लड़ने का जज्बा हो, तो व्यक्ति हर असंभव बाधा को पार कर सकता है।
- अन्याय के विरुद्ध मुखर होना (Resistance against Injustice)
टेपचू का चरित्र हमें सिखाता है कि चुपचाप अन्याय सहना गुलामी को बढ़ावा देना है। टेपचू ने कभी भी दबंग किशनपाल सिंह या भ्रष्ट पुलिस प्रशासन के सामने घुटने नहीं टेके। वह हमें सिखाता है कि अपने हक के लिए लड़ना और व्यवस्था की आँखों में आँखें डालकर सच बोलना एक गरिमामय जीवन के लिए अनिवार्य है।
- ‘एकता में शक्ति’ का महत्त्व (Strength in Unity)
कहानी के दूसरे भाग में जब टेपचू मजदूर यूनियन से जुड़ता है, तो हमें यह सीख मिलती है कि व्यक्तिगत संघर्ष की तुलना में सामूहिक संघर्ष अधिक प्रभावशाली होता है। अकेले टेपचू को कुचलना व्यवस्था के लिए आसान था, लेकिन जब वह हजारों मजदूरों के साथ ‘लाल सलाम’ के नारे के साथ खड़ा हुआ, तो उसने पूरी मशीनरी को हिला दिया।
- बाहरी स्वरूप बनाम आंतरिक शक्ति
बचपन में टेपचू ‘घिनौना’, दुर्बल और कुपोषित था, जिसे देखकर लोग उसके मरने की दुआ करते थे। लेकिन वही बच्चा आगे चलकर एक फौलादी मजदूर बना। यह हमें सीख देता है कि किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन उसके बाहरी रूप-रंग या वर्तमान विपत्ति से नहीं करना चाहिए। मनुष्य के भीतर छिपी आंतरिक शक्ति अद्भुत होती है।
- माँ के त्याग और संघर्ष का सम्मान
फिरोजा का चरित्र हमें सिखाता है कि एक माँ का निस्वार्थ प्रेम और कठिन परिश्रम किसी भी असंभव कार्य को संभव बना सकता है। यह सीख हमें उन अदृश्य और उपेक्षित हाथों (श्रमिक महिलाओं) के प्रति सम्मान विकसित करने की प्रेरणा देती है, जो समाज की नींव रखते हैं।
- व्यवस्था के प्रति सजगता और आलोचनात्मक दृष्टि
कहानी हमें समाज और प्रशासन के दोहरे चरित्र के प्रति सचेत करती है। यह हमें सिखाता है कि हमें सत्ता, पुलिस और संभ्रांत वर्ग द्वारा पेश की गई ‘सच्चाई’ को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके पीछे छिपे शोषण और पाखंड को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
| क्र.सं. | शब्द (Hindi Word) | अर्थ (Meaning in Hindi) | English Meaning |
| 1 | हैरतअंगेज | आश्चर्यजनक | Amazing / Astonishing |
| 2 | फ़र्लांग | दूरी मापने की एक इकाई | Furlong (A unit of distance) |
| 3 | कुइयाँ | छोटा कुआँ | A small shallow well |
| 4 | अंजुलियों | दोनों हथेलियों को मिलाकर बना पात्र | Cupped palms |
| 5 | चिकवा / कटुआ | मांस बेचने वाला (स्थानीय गालीनुमा शब्द) | Meat seller / Butcher |
| 6 | फक्कड़ | मस्तमौला / लापरवाह | Carefree / Bohemian |
| 7 | जश्न | उत्सव | Celebration / Festivity |
| 8 | लुनाई | कोमलता / सुंदरता | Softness / Beauty |
| 9 | हल्दिया | पीलापन लिए हुए | Yellowish |
| 10 | जेबी | जेब में रखने लायक | Pocket-sized |
| 11 | अष्टधातु | आठ धातुओं का मिश्रण | Octo-alloy (Mix of 8 metals) |
| 12 | ख्वाहिश | इच्छा | Desire / Wish |
| 13 | सफाचट | बिल्कुल साफ (बिना बालों के) | Clean-shaven / Bare |
| 14 | मुरदाशंख | एक सफेद खनिज पाउडर | Litharge / White mineral powder |
| 15 | भड़ैती | भांडपन / हँसी-मजाक का पेशा | Buffoonery / Farce |
| 16 | उमड़ना | उफान पर होना | To overflow / To surge |
| 17 | मटैला | मिट्टी के रंग का | Muddy / Earthy colored |
| 18 | परदेसिया | एक प्रकार का लोकगीत | A type of folk song |
| 19 | गुदगुदीवाला | उत्तेजक / रोमांचक | Ticklish / Exciting |
| 20 | रसदार | आनंद से भरा | Juicy / Melodious |
| 21 | अवाक् | हैरान / चुप | Speechless / Stunned |
| 22 | अतल | बहुत गहरा | Bottomless / Abyss |
| 23 | तय करनी | देख-रेख | Guarding / Watching over |
| 24 | ढेंकी | अनाज कूटने का उपकरण | Grain crusher (Manual) |
| 25 | चीकट | बहुत गंदा / मैला | Extremely filthy / Grimy |
| 26 | संभ्रांत | प्रतिष्ठित / उच्च कुल का | Elite / Noble / Sophisticated |
| 27 | कुलीन | ऊँचे खानदान का | High-born / Aristocratic |
| 28 | अलस्सुबह | बहुत सवेरे | Early at dawn |
| 29 | चुहलबाजी | छेड़खानी / मजाक | Banter / Flirting |
| 30 | रफा-दफा | सुलझा लेना / खत्म करना | To settle / To hush up |
| 31 | ऐशगाह | विलास का स्थान | Luxury resort / Den of pleasure |
| 32 | घिग्घी बँधना | डर के मारे आवाज़ न निकलना | To be choked with fear |
| 33 | ठिठकना | अचानक रुक जाना | To stop short / To hesitate |
| 34 | तिड़ी होना | भाग जाना या अकड़ना | To flee / To show bravado |
| 35 | तटस्थ | निष्पक्ष / स्थिर | Neutral / Detached |
| 36 | भरकस | बहुत अधिक पिटाई | Severe beating |
| 37 | जुगाड़ | प्रबंध | Improvisation / Arrangement |
| 38 | कमलगट्टे | कमल के बीज | Lotus seeds |
| 39 | पुरइन | कमल का पत्ता | Lotus leaf |
| 40 | हेल जाना | तैरकर अंदर जाना | To wade into water |
| 41 | गलफड़ों | मछली के साँस लेने का अंग | Gills |
| 42 | ठेहुना | घुटना | Knee |
| 43 | चूतड़ | नितंब | Buttocks |
| 44 | नर्सरी | पौधशाला | Plant nursery |
| 45 | आह्लाद | अत्यधिक खुशी | Joy / Rapture |
| 46 | अदृश्य | जो दिखाई न दे | Invisible |
| 47 | खुमारी | नशा / आलस्य | Hangover / Drowsiness |
| 48 | एकसार | समान / बराबर | Even / Uniform |
| 49 | फुनगी | पेड़ की चोटी | Treetop / Apex |
| 50 | जिन्न | भूत / प्रेत | Genie / Ghost |
| 51 | निकाह | विवाह | Marriage (Islamic) |
| 52 | बहेतू | भटकने वाला | Vagabond / Wanderer |
| 53 | काइयाँ | चतुर / मक्कार | Cunning / Shrewd |
| 54 | निराई | खेत से घास निकालना | Weeding |
| 55 | मचलना | तड़पना / उत्तेजित होना | To writhe / To quiver |
| 56 | अक्खड़ | उद्दंड / जिद्दी | Rude / Stubborn |
| 57 | रौब | प्रभाव / दबदबा | Awe / Command |
| 58 | पस्त होना | हार मान लेना | To be exhausted / Defeated |
| 59 | वितृष्णा | घृणा / अरुचि | Aversion / Disgust |
| 60 | हड़ताल | काम बंद करना | Strike |
| 61 | फरमान | आदेश | Decree / Command |
| 62 | धकियाते | धक्का देते हुए | Pushing / Shoving |
| 63 | मुस्तैद | तैयार | Alert / Ready |
| 64 | हुजूम | भीड़ | Crowd / Mob |
| 65 | मादरजाद | जन्मजात (नग्न अवस्था) | Stark naked / Innate |
| 66 | बजड़ी / मुरम | कंकड़-पत्थर | Gravel / Pebbles |
| 67 | तलब | इच्छा / चाहत | Craving / Urge |
| 68 | कनखियों | तिरछी नज़रों से | From the corner of eyes |
| 69 | लोथ होना | बेदम होकर गिरना | To be limp / Lifeless |
| 70 | चूहचुहाना | टपकना (खून) | To ooze / To drip |
| 71 | बरामद | प्राप्त करना | Recovered / Found |
| 72 | पोस्टमार्टम | शव परीक्षा | Autopsy |
| 73 | थ्री-नॉट-थ्री | एक प्रकार की बंदूक/गोली | .303 (Rifle/Bullet) |
| 74 | हैरतअंगेज | चकित करने वाला | Astonishing |
| 75 | आंचलिक | क्षेत्रीय | Regional |
| 76 | लठ्ठबाज़ | लाठी चलाने में निपुण | Staff-fighter |
| 77 | फनियल | फन वाला (साँप) | Hooded (Snake) |
| 78 | अतल | जिसकी थाह न हो | Bottomless |
| 79 | सरपंची | प्रधानगी | Headmanship |
| 80 | खदान | माइंस | Mine / Quarry |
| 81 | छाँटना | अलग करना (मजदूरों को) | To retrench / To trim |
| 82 | अजमानी | स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति | Local influential person |
| 83 | पगार | वेतन | Salary / Wages |
| 84 | झुग्गी | झोपड़ी | Shanty / Hut |
| 85 | गश्ती | पहरा देने वाली | Patroling |
| 86 | भद्दी | गंदी | Vulgar / Ugly |
| 87 | नथुने | नाक के छेद | Nostrils |
| 88 | कनपटी | सिर का हिस्सा | Temple (Side of head) |
| 89 | गूमड़ | सूजन | Swelling / Bump |
| 90 | लोथ | शव | Corpse / Lifeless body |
| 91 | बदकिस्मती | बुरा भाग्य | Misfortune |
| 92 | हकीकत | सच्चाई | Reality |
| 93 | काल्पनिक | बनावटी | Fictional |
| 94 | धुआँधार | बहुत तेज | Vigorous / Smoking |
| 95 | हादसा | दुर्घटना | Accident / Mishap |
| 96 | मशहूर | प्रसिद्ध | Famous |
| 97 | गोताखोर | पानी में डूबने वाला | Diver |
| 98 | तहसील | प्रशासनिक क्षेत्र | Administrative block / Tehsil |
| 99 | बाशिंदा | निवासी | Resident |
| 100 | अनहोनी | जो संभव न हो | Improbable / Unheard of |
‘टेपचू’ महत्त्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर
1. टेपचू के ‘जिन्न’ होने का मिथक कहानी में कैसे विकसित होता है?
उत्तर – टेपचू के बचपन से ही उसके साथ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनमें बचना असंभव था। वह ताड़ के ऊँचे पेड़ से गिरा जहाँ उसे साँप ने डँसा था, पर वह जीवित बचा। वह सोन नदी में डूबते-डूबते बचा और पुलिस की गोलियाँ खाने के बाद भी पोस्टमार्टम की मेज पर बोल उठा। इन अविश्वसनीय घटनाओं के कारण गाँव वालों में यह विश्वास पक्का हो गया कि वह साधारण मनुष्य नहीं बल्कि एक ‘जिन्न’ है। यह मिथक वास्तव में मजदूर वर्ग की उस अपराजेय शक्ति का प्रतीक है जिसे व्यवस्था बार-बार मारना चाहती है पर वह फिर जी उठता है।
2. फिरोजा का चरित्र एक माँ के संघर्ष की किस पराकाष्ठा को दर्शाता है?
उत्तर – फिरोजा एक विधवा और निर्धन माँ है जो समाज की कुदृष्टि और घोर दरिद्रता के बीच टेपचू को पालती है। वह दिन-भर मजदूरी करती है और रात भर खेतों की रखवाली। टेपचू के बचपन में वह उसे अपनी साड़ी में लपेटकर काम करती थी ताकि उसे सुरक्षा दे सके। उसने टेपचू को पालने के लिए अपनी जवानी और स्वास्थ्य सब कुछ होम कर दिया। उसका चरित्र यह दिखाता है कि एक माँ का निस्वार्थ प्रेम और संघर्ष किसी भी विपत्ति से लोहा ले सकता है और एक बीमार बच्चे को मजबूत इंसान बना सकता है।
3. ताड़ के पेड़ वाले हादसे का कहानी में क्या प्रतीकात्मक महत्त्व है?
उत्तर – ताड़ का पेड़ ऊँचाई और जोखिम का प्रतीक है। टेपचू का उस पर चढ़ना उसकी जिज्ञासा और वर्जनाओं को तोड़ने की इच्छा को दर्शाता है। मटके में साँप का मिलना उस धोखे और खतरे का प्रतीक है जो गरीब के हर सुख के पीछे छिपा होता है। इतनी ऊँचाई से गिरकर भी टेपचू का बच जाना और फिर वहाँ से गायब हो जाना, कहानी में उसके ‘रहस्यमयी’ और ‘अमर’ होने के गुण को पहली बार स्थापित करता है। यह दृश्य व्यवस्था के खिलाफ उसकी पहली शारीरिक जीत को दर्शाता है।
4. किशनपाल सिंह किस प्रकार की सामाजिक विसंगति का प्रतिनिधित्व करते हैं?
उत्तर – किशनपाल सिंह भारतीय ग्रामीण समाज के उस सामंती और शोषक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो राजनीति और धन के बल पर गरीबों का दमन करता है। वह सरकारी जमीनों पर कब्जा करता है, सरपंच से एम.एल.ए. बनता है और मजदूरों को अपने हितों के लिए पिटवाता है। उसका चरित्र यह दिखाता है कि कैसे सत्ता और अपराध का गठबंधन आम आदमी के जीवन को नरक बना देता है। वह उस ‘लोकतंत्र’ का चेहरा है जहाँ न्याय केवल ताकतवर की रखैल बनकर रह जाता है।
5. बैलाडिला के श्रमिक आंदोलन में टेपचू की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर – बैलाडिला में टेपचू एक सचेत और जागरूक मजदूर के रूप में उभरता है। वह अब केवल व्यक्तिगत लड़ाई नहीं लड़ता, बल्कि सामूहिक हक की बात करता है। वह छँटनी के खिलाफ यूनियन का नेतृत्व करता है और दरोगा करीम बख्श जैसे क्रूर अधिकारियों को चुनौती देता है। वह मजदूरों को संगठित करता है और पुलिस के दमन का निडरता से सामना करता है। टेपचू की भूमिका यह दर्शाती है कि जब एक शोषित व्यक्ति संगठित होकर लड़ता है, तो वह पूरी व्यवस्था को हिलाने की क्षमता रखता है।
6. पुलिस दमन और ‘फर्जी मुठभेड़’ के चित्रण के पीछे लेखक का क्या उद्देश्य है?
उत्तर – लेखक ने पुलिस की बर्बरता और फर्जी मुठभेड़ के माध्यम से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के क्रूर और भ्रष्ट चेहरे को बेनकाब किया है। दरोगा करीम बख्श द्वारा टेपचू को जीप से घसीटना और फिर जंगल में ले जाकर मारना यह दिखाता है कि कानून के रखवाले ही कैसे अपराधियों की तरह व्यवहार करते हैं। लेखक का उद्देश्य यह उजागर करना है कि ‘न्याय’ की आड़ में व्यवस्था कैसे हाशिए के लोगों की आवाज़ को दबाने के लिए एनकाउंटर जैसे हिंसक रास्तों का सहारा लेती है।
7. कहानी के अंत में डॉक्टर एडविन वर्गिस के साथ घटित घटना का क्या संदेश है?
उत्तर – कहानी का अंत जहाँ गोलियों से छलनी टेपचू पोस्टमार्टम की मेज पर बोल उठता है, वह ‘जादुई यथार्थवाद’ का उदाहरण है। यह संदेश देता है कि सत्य और न्याय की पुकार को भौतिक रूप से मिटाया नहीं जा सकता। जिसे व्यवस्था ‘मुर्दा’ घोषित कर चुकी है, उसकी आवाज़ आज भी न्याय की माँग कर रही है। यह डॉक्टर के डर के माध्यम से व्यवस्था के अपराधबोध को भी दर्शाता है। यह अंत पाठकों को विश्वास दिलाता है कि मजदूर की जिजीविषा और उसका संघर्ष शाश्वत है।
8. ‘टेपचू’ कहानी में ‘सच्चाई’ और ‘कहानी’ के बीच के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – लेखक शुरुआत में ही कहता है कि यह ‘कहानी’ नहीं, ‘सच्चाई’ है। उदय प्रकाश यहाँ यह तर्क देते हैं कि एक मजदूर का वास्तविक जीवन किसी भी काल्पनिक कथा से अधिक विस्मयकारी और हैरतअंगेज होता है। टेपचू के साथ होने वाले हादसे भले ही अविश्वसनीय लगें, पर वे उस वर्ग के वास्तविक संघर्षों का रूपक हैं। लेखक ‘कहानी’ के माध्यम से उस कड़वे यथार्थ को सामने लाना चाहते हैं जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है, और यह सिद्ध करते हैं कि यथार्थ कल्पना से बड़ा है।
9. इस कहानी में ‘जिन्न’ शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है?
उत्तर – ‘जिन्न’ यहाँ कोई पारलौकिक प्राणी नहीं है, बल्कि वह उस अजेय शक्ति का प्रतीक है जो हर दमन के बाद फिर से जीवित हो उठती है। गाँव वालों के लिए टेपचू इसलिए जिन्न है क्योंकि उसने मौत को कई बार मात दी। प्रतीकात्मक रूप से, ‘जिन्न’ वह श्रमिक वर्ग है जिसे पूँजीवाद और सत्ता बार-बार कुचलती है, पर वह अपनी सामूहिक शक्ति और जिजीविषा से बार-बार खड़ा हो जाता है। यह शब्द टेपचू के प्रतिरोध को एक मिथकीय गरिमा प्रदान करता है।
10. कहानी में ‘सोन नदी’ और ‘मड़र गाँव’ की क्या भूमिका है?
उत्तर – सोन नदी और मड़र गाँव कहानी को एक आंचलिक और यथार्थवादी पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं। सोन नदी जहाँ जीवन का आधार है (पानी और नहाना), वहीं वह अब्बी की मौत का कारण भी बनती है और टेपचू के जीवन के रहस्यों को समेटे हुए है। मड़र गाँव उस भारतीय ग्रामीण परिवेश का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ जातिवाद, गरीबी और सामंती शोषण की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह परिवेश टेपचू के चरित्र के विकास और उसके संघर्षों की नींव तैयार करता है।
11. दरोगा करीम बख्श और टेपचू के बीच का टकराव वर्ग-संघर्ष को कैसे दर्शाता है?
उत्तर – दरोगा करीम बख्श सत्ता और दमनकारी मशीनरी का प्रतिनिधि है, जबकि टेपचू पीड़ित और विद्रोही मजदूर वर्ग का। दरोगा का टेपचू को नंगा करना और अपमानित करना उस ‘शक्ति’ के अहंकार को दिखाता है जो गरीब के आत्म-सम्मान को कुचलना चाहती है। वहीं टेपचू का पलटकर प्रहार करना और दरोगा का जुलूस निकालना शोषित वर्ग के बढ़ते आक्रोश और साहस का प्रतीक है। यह व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं और वर्गों के बीच का तीखा संघर्ष है।
12. ‘टेपचू’ कहानी समकालीन समाज के लिए कितनी प्रासंगिक है?
उत्तर – आज के दौर में भी मजदूरों की छँटनी, पुलिस की बर्बरता, फर्जी मुठभेड़ और सामंती सोच समाज में व्याप्त है। ‘टेपचू’ कहानी हमें सिखाती है कि जब तक व्यवस्था में शोषण रहेगा, तब तक टेपचू जैसे पात्रों की जरूरत बनी रहेगी। यह कहानी हमें हाशिए के लोगों के मानवाधिकारों और उनके संघर्षों के प्रति संवेदनशील बनाती है। यह आज के ‘पूँजीवादी विकास’ के पीछे छिपी मानवीय त्रासदी को उजागर करने के कारण अत्यंत प्रासंगिक है।
‘टेपचू’ – महत्त्वपूर्ण अंशों की सप्रसंग व्याख्या
- जीवन की कठोर सच्चाई
“यहाँ जो कुछ लिखा हुआ है, वह कहानी नहीं है। कभी—कभी सच्चाई कहानी से भी ज्यादा हैरतअंगेज होती है। टेपचू के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद आपको भी ऐसा ही लगेगा।”
- प्रसंग – यह कहानी की शुरुआती पंक्तियाँ हैं, जहाँ लेखक पाठक को सचेत कर रहा है कि वह जो पढ़ने जा रहा है, वह मात्र कल्पना नहीं है।
- व्याख्या – लेखक का तर्क है कि हम जिसे ‘कहानी’ मानकर पढ़ते हैं, वास्तविक जीवन के संघर्ष उससे कहीं अधिक विस्मयकारी (Astonishing) होते हैं। टेपचू के जीवन के हादसे और उसकी सहनशक्ति इतनी अविश्वसनीय है कि वह कल्पना से बड़ी लगती है। यहाँ लेखक ‘यथार्थ’ (Reality) को ‘साहित्य’ से ऊँचा दर्जा दे रहा है।
- उपेक्षित बचपन का चित्र
“वह इतना घिनौना था कि फिरोजा की जवानी पर गोबर की तरह लिथड़ा हुआ लगता था। पतले—पतले सूखे हुए झुर्रीदार हाथ—पैर, कद्दू की तरह फूला हुआ पेट, फोड़ों से भरा हुआ शरीर। लोग टेपचू के मरने का इंतजार करते रहे।”
- प्रसंग – यह अंश टेपचू के बचपन की शारीरिक अवस्था का वर्णन करता है।
- व्याख्या – लेखक ने यहाँ गरीबी और कुपोषण (Malnutrition) की वीभत्स तस्वीर खींची है। समाज उसे सहानुभूति की दृष्टि से नहीं, बल्कि घृणा से देखता है। लोग उसकी सहायता करने के बजाय उसके मरने की प्रतीक्षा करते हैं। यह समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है जहाँ एक गरीब और बीमार बच्चा केवल एक ‘बोझ’ समझा जाता है।
- मौत को मात देने की कला
“मदना सिंह ने ताड़ की फुनगी से मटके समेत टेपचू को गिरते हुए देखा था। बचने की कोई संभावना नहीं थी… लेकिन टेपचू मियाँ गायब थे। गाँववालों को उसी दिन विश्वास हो गया कि हों न हों टेपचू साला जिन्न है, वह कभी मर नहीं सकता।”
- प्रसंग – ताड़ के पेड़ से गिरने वाले हादसे के बाद गाँव वालों की प्रतिक्रिया।
- व्याख्या – ताड़ की ऊँचाई और ज़हरीले साँप के डँसने के बाद भी टेपचू का बच जाना उसे एक ‘मिथकीय’ (Mythical) चरित्र बना देता है। ‘जिन्न’ शब्द यहाँ उसकी अलौकिक शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि उसकी असाधारण ‘जीजीविषा’ (Will to live) का प्रतीक है। यह अंश टेपचू की अमरता के मिथक की शुरुआत करता है।
- मजदूर का उदय और रूपांतरण
“ताज्जुब था कि इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद टेपचू सिझ—पककर मजबूत होता चला गया। काठी कढ़ने लगी। उसकी कलाई की हड्डियाँ चौड़ी होती गईं, पेशियों में मछलियाँ मचलने लगीं। आँखों में एक अक्खड़ रौब और गुस्सा झलकने लगा।”
- प्रसंग – टेपचू के जवान होने और कठिन शारीरिक श्रम (W.D. के काम) के दौरान आए बदलाव का वर्णन।
- व्याख्या – यह अंश ‘श्रम के सौंदर्य’ को दर्शाता है। अपमान, भूख और मुसीबतों ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत (फौलादी) बना दिया। उसके शरीर की बनावट और आँखों का ‘गुस्सा’ यह संकेत देता है कि अब वह शोषित होने वाला निर्बल बच्चा नहीं, बल्कि व्यवस्था से टकराने वाला एक सचेत ‘मजदूर’ बन चुका है।
- सामूहिक शक्ति का बोध
“काका, मैंने अकेले लड़ाइयाँ लड़ी है। हर बार मैं पिटा हूँ। हर बार हारा हूँ। अब अकेले नहीं, सबके साथ मिलकर देखूँगा कि सालों में कितना जोर है।”
- प्रसंग – बैलाडिला में टेपचू का अपने साथियों और लेखक से संवाद।
- व्याख्या – यहाँ टेपचू का ‘वर्ग-बोध’ (Class Consciousness) उभरता है। उसे समझ आ गया है कि व्यक्तिगत वीरता व्यवस्था को नहीं बदल सकती। यह अंश व्यक्तिगत संघर्ष के ‘संगठित आंदोलन’ में बदलने की प्रक्रिया को दिखाता है। यह मजदूर एकता की शक्ति का शंखनाद है।
- दमन का क्रूर चेहरा (एनकाउंटर)
“अल्ला बख्श उर्फ टेपचू, तुम्हें दस सेकेंड का टाइम दिया जाता है… सामने की ओर सड़क पर तुम जितनी जल्द दूर—से—दूर भाग सकते हो, भागो। हम दस तक गिनती गिनेंगे।”
- प्रसंग – पुलिस द्वारा जंगल में टेपचू का ‘फर्जी एनकाउंटर’ करने का दृश्य।
- व्याख्या – यह अंश भारतीय पुलिस प्रशासन की बर्बरता और अमानवीयता का चरम है। ‘जिला बदर’ करने के बहाने उसे भागने को कहना और फिर पीछे से गोली मारना यह दिखाता है कि सत्ता के रक्षक किस कदर अपराधियों जैसा व्यवहार करते हैं। यह कानून के नाम पर की जाने वाली ‘सरकारी हत्या’ का वीभत्स रूप है।
- जादुई यथार्थवाद और विस्मयकारी अंत
“उन्होंने अपना मास्क ठीक किया, फिर उस्तरा उठाया। झुके और तभी टेपचू ने अपनी आँखें खोलीं। धीरे से कराहा और बोला, ‘डॉक्टर साहब, ये सारी गोलियाँ निकाल दो। मुझे बचा लो। इन्हीं कुत्तों ने मारने की कोशिश की है।'”
- प्रसंग – पोस्टमार्टम की मेज पर टेपचू का जीवित होकर डॉक्टर से बात करना।
- व्याख्या – यह कहानी का सबसे प्रभावशाली दृश्य है। यह ‘जादुई यथार्थवाद’ (Magical Realism) का प्रयोग है। जिसे व्यवस्था ने कागजों में ‘मृत’ घोषित कर दिया है, वह अन्याय के खिलाफ गवाही देने के लिए जी उठता है। यह संदेश देता है कि मजदूर की चेतना और न्याय की माँग को गोलियों से खत्म नहीं किया जा सकता।
- सच्चाई और जिजीविषा की अमरता
“हमारे गाँव मड़र के अलावा जितने भी लोग टेपचू को जानते हैं वे यह मानते हैं कि टेपचू कभी मरेगा नहीं — साला जिन्न है।”
- प्रसंग – कहानी की अंतिम पंक्तियाँ।
- व्याख्या – यहाँ ‘जिन्न’ होना एक मुहावरा बन गया है। यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक है कि जब तक दुनिया में शोषण रहेगा, प्रतिरोध का स्वर (टेपचू) जीवित रहेगा। टेपचू की अमरता वास्तव में आम आदमी के संघर्ष और उसकी कभी न हारने वाली हिम्मत की अमरता है।

