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कविता परिचय
यह कविता हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित है। इस कविता में कवि एक अकेले, स्नेह से भरे दीपक के माध्यम से व्यक्ति की महत्ता और उसके सामाजिक दायित्व को दर्शाते हैं। कवि का संदेश है कि व्यक्ति (दीप) भले ही अपनी विशिष्टता, गर्व और आत्मविश्वास (मदमाता) से परिपूर्ण हो, लेकिन उसकी सार्थकता और पूर्णता समाज (पंक्ति) से जुड़ने में ही है। यह दीप अकेला कविता का केंद्रीय भाव यह है कि व्यक्ति अपनी मौलिकता और सामर्थ्य में चाहे कितना भी महान क्यों न हो, उसका वास्तविक मूल्य और सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब वह समाज (पंक्ति), शक्ति (सामूहिक बल) और भक्ति (सामूहिक समर्पण) के साथ जुड़कर अपने गुणों का उपयोग व्यापक हित के लिए करता है। यह कविता व्यक्तिवाद और समष्टिवाद के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
यह दीप अकेला स्नेहभरा
है गर्वभरा, मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा?
पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लायेगा?
यह समिधाः ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा।
यह अद्वितीयः यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :
यह द्वीप, अकेला, स्नेहभरा,
है गर्वभरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गोरस : जीवन-कामधेनु का अमृत – पूत पय,
यह अंकुर : फोड़ धारा को रवि को ताकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्मअयुतः
इसको भी शक्ति को दे दो।
यह दीप, अकेला, स्नेहभरा,
है गर्वभरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
यह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में
यह सदा – द्रवित, चिर- जागरूक, अनुरक्त नेत्र,
उल्लंब— बाहु, यह चिर- अखंड अपनापा |
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय
इसको भी भक्ति को दे दो :
यह दीप, अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मदामाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
प्रतीक (Symbol) | सामान्य अर्थ (Literal Meaning) | कविता के अनुसार प्रतीकात्मक अर्थ (Symbolic Meaning) |
दीप (दीपक) | मिट्टी का दीया | अद्वितीय, विशिष्ट, आत्म-निर्भर व्यक्ति। यह व्यक्ति अपनी प्रतिभा, ज्ञान और आत्मविश्वास से परिपूर्ण है। |
अकेला | एकाकी, अकेलापन | व्यक्ति की मौलिकता और विशिष्टता; उसका असाधारण होना जो उसे भीड़ से अलग करता है। |
स्नेहभरा | तेल से भरा हुआ | प्रेम, करुणा, अपनत्व और आंतरिक भावुकता से भरा हुआ व्यक्ति। |
गर्वभरा, मदमाता | घमंड से भरा, मस्ती में चूर | आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास, और अपने सामर्थ्य पर गर्व से भरा हुआ व्यक्ति। |
पंक्ति | कतार, दीपों की माला | समाज, समष्टि, राष्ट्र या व्यापक सामूहिक संगठन। व्यक्ति की सार्थकता का मंच। |
जन | मनुष्य, लोग | वह विशिष्ट व्यक्ति जिसके विचार या रचनाएँ (गीत) मौलिक हों। |
पनडुब्बा | गोताखोर | वह व्यक्ति जो जीवन के गहन अनुभवों और ज्ञान (सच्चे मोती) को प्राप्त करता है। |
सच्चे मोती | असली मोती | दुर्लभ सत्य, मौलिक ज्ञान, मूल्यवान अनुभव या किसी व्यक्ति द्वारा अर्जित सर्वोत्तम उपलब्धि। |
समिधा | हवन में जलाने वाली लकड़ी | त्याग, बलिदान और तपस्या की भावना या किसी बड़े उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करने की तत्परता। |
हठीली आग | जिद्दी आग | तीव्र संकल्प, क्रांति की भावना, या आत्म-त्याग जो किसी बिरले व्यक्ति में ही होती है। |
शक्ति | बल, ऊर्जा | सामूहिक शक्ति, एकता का बल या समाज का सामर्थ्य। |
मधु | शहद | युगों के संचित अनुभव, ज्ञान और मीठी यादें। समय की साधना से अर्जित सार तत्व। |
गोरस | दूध, दही, घी | जीवन की पवित्रता, शुद्धता और अमृतमय सार। जीवन-कामधेनु से प्राप्त सर्वोत्तम फल। |
अंकुर | छोटा पौधा | नवजीवन, भविष्य की संभावनाएँ, साहस और आशा। |
धारा | परंपरा | जीवन के बंधन, रूढ़ियाँ या पुरानी परंपराएँ जिसे तोड़कर व्यक्ति आगे बढ़ता है। |
विश्वास | आस्था, भरोसा | व्यक्ति का अटूट आत्म-बल, आत्म-ज्ञान और दृढ़ता। |
पीड़ा | दर्द, कष्ट | जीवन के गहन आत्म-अनुभूत दुख और कष्ट जिसकी गहराई केवल वह व्यक्ति स्वयं ही जानता है। |
भक्ति | पूजा, श्रद्धा | ईश्वर या किसी बड़े उद्देश्य के प्रति समर्पण, निष्ठा और आत्म-समर्पण। |
01
यह दीप अकेला स्नेहभरा
है गर्वभरा, मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा?
पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लायेगा?
यह समिधाः ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा।
यह अद्वितीयः यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :
यह द्वीप, अकेला, स्नेहभरा,
है गर्वभरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
प्रसंग
ऊपर लिखित अवतरण प्रयोगवाद और नयी कविता के शीर्षस्थ कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुचर्चित कविता ‘यह दीप अकेला’ से अवतरित है। अज्ञेय एक मनोविश्लेषणवादी कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में मानव मन की कुंठाओं और अभीप्साओं को भी चित्रित किया है। इस कवितांश में व्यक्ति और समाज के अंतरसंबंध को रेखांकित किया है।
व्याख्या
प्रस्तुत अंश में कवि का यह कहना है कि एक अकेला दीपक तेल से भरा हुआ लौ के साथ जलता है और वह जलते हुए, मदमाता रहते हुए अपने इर्द-गिर्द के अंधकार को दूर करता है। इसी तरह मनुष्य अकेला होने पर भी उसे पता होता है कि उसमें अंतर्निहित शक्तियाँ मौजूद हैं, सामर्थ्य है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर उसे गर्व होता है। ऐसी स्थिति में वह इठलाता-इतराता रहता है। लेकिन उसके गुणों से दूसरों का उपकार तब तक नहीं हो सकता है जब तक कि वह अकेला है। इसलिए कवि कहते हैं कि यदि अकेले दीपक को पंक्ति में रख दिया जाए तो उसका प्रकाश पंक्ति के दीपकों के प्रकाश के साथ मिलकर व्यापक अंधकार को दूर करने में सफल हो सकता है। मनुष्य की शक्ति में भी बढ़ोतरी तब होती है जब उसे समष्टि में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इससे पूरे समाज को लाभ मिलेगा। व्यक्ति अपने गुणों और प्रतिभा का समष्टि के हितों के लिए उपयोग करता है तो स्वतः वह समाज से जुड़ जाता है। उसके जुड़ाव से समाज को लाभ तो मिलता ही है, व्यक्ति का जीवन भी सार्थक समझा जाता है। समाज की प्रगति और उसके विकास में व्यक्ति का यह योगदान बड़े महत्त्व का समझा जाता है। यह वह व्यक्ति है जो जनकल्याण और देशहित के गीत गाता है। यदि उसे समाज में शामिल नहीं किया गया तो मधुर गीत कौन गाएगा क्योंकि गीत की सार्थकता तभी है जब उसे कोई सुननेवाला हो। यह वह गोताखोर है जो हृदयरूपी समुद्र में डुबकी लगाकर कठोर साधना के पश्चात् रचना रूपी मोती खोज कर लाता है। यदि उसे समाज से अलग-थलग रखा जाए तो सुंदर सृजन भला कौन करेगा जो अनमोल मोती के रूप में साहित्य और समाज की शोभा का विस्तार करेगा? यह यज्ञ या हवन की लकड़ी अर्थात् समिधा के समान है जो स्वयं सुलगकर वातावरण को सुगंधित और पावन बनाती है। इस चेतनारूपी अग्नि को कोई विरला, हठीला ही सुलगा सकता है जिससे समाज का कल्याण होता है। कवि ने दीपक के प्रतीक के लिए जन, पनडुब्बा तथा समिधा का चयन किया है जो व्यक्ति की विशिष्टता के द्योतक हैं तथा सामूहिकता की पूर्णता के लिए सहायक हैं।
02
यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गोरस : जीवन-कामधेनु का अमृत – पूत पय,
यह अंकुर : फोड़ धारा को रवि को ताकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्मअयुतः
इसको भी शक्ति को दे दो।
यह दीप, अकेला, स्नेहभरा,
है गर्वभरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
प्रसंग
यह पद्यखंड अज्ञेय की कविता ‘यह दीप अकेला’ का दूसरा पद है। कवि ने दीपक अर्थात् व्यक्ति के लिए मधु, गोरस और अंकुर के प्रतीकों के माध्यम से अपने विचार को पुष्ट किया है। इन पंक्तियों में कवि ने अन्योक्ति के सहारे व्यक्ति के महत्त्व को रेखांकित किया है।
व्याख्या
यह दीप अर्थात् एकाकी जन जो सदियों से अपने में ज्ञान, विज्ञान, कला, कौशल आदि को संजो कर तमाम भावों को संजोकर अपने में अनेक मधुर भावों का संचय करता है। यह एकाकी जन का गुण गोरस है जो वास्तव में कामधेनु के समान है। इसमें कामधेनु के समान अमृत प्रदान करने की शक्ति निहित है। यह जीवनरूपी कामधेनु की उस गोरस के समान है जो अमृत प्रदान करता है। यह एक विशेष अंकुर के समान है जो पृथ्वी के वक्ष स्थल को चीरकर सूर्य की ओर अनिमेष नयनों से निर्भय होकर देखता रहता है। इसमें जीने की अद्भुत क्षमता है। प्रबल जिजीविषा तो है ही। यह स्वयं प्रकृति और ब्रह्म स्वरूप है किंतु इसका पूर्ण विकास नहीं हुआ है। एकाकी निर्जन में व्याप्त है। इसे विशिष्ट शक्ति प्रदान करना परम आवश्यक है। अतः इसे भी पंक्ति में रखा जाए ताकि इसमें छिपे समस्त गुण विकसित हो सकें। इससे समाज लाभान्वित होगा।
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के समरसतापूर्ण सह-अस्तित्व से देश अथवा राष्ट्र का चहुँमुखी विकास संभव होता है। इसलिए व्यक्ति रूपी शक्ति के ऊर्जावान कणों को पंक्ति अर्थात् समाज से जोड़ना अति आवश्यक है।
03
यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
यह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में
यह सदा – द्रवित, चिर- जागरूक, अनुरक्त नेत्र,
उल्लंब— बाहु, यह चिर- अखंड अपनापा |
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय
इसको भी भक्ति को दे दो :
यह दीप, अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मदामाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
प्रसंग
उपर्युक्त पंक्तियाँ ‘यह दीप अकेला’ शीर्षक कविता से ली गई हैं। इस कविता के कवि अज्ञेय हैं। इन पंक्तियों में कवि ने दीप को व्यंजित किया है।
व्याख्या
यह वह व्यक्ति है जो उपकारी है, स्नेह से भरा है और अपने लघु स्वरूप से भयभीत नहीं है। बावजूद इसके वह अपने व्यक्तित्व को विशालता प्रदान करते हुए अपने सत्कर्मों के प्रति समर्पित होता है। जिस प्रकार दीपक अपने में अग्नि धारण किए हुए होता है और स्वयं को जलाने का दुख वह अच्छी तरह जानता है। फिर भी वह स्नेह से भरा है और स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाशित करता है। दुनिया के अंधकार को दूर करता है। वह सदैव जागरूक और सावधान रहता है कि सबको समान रूप से समान प्रेम भाव से प्रकाशवान करे। ऐसा मनुष्य जो जिज्ञासु प्रवृत्ति का है, जिसमें स्नेह है और जो ज्ञानवान है, श्रद्धा से परिपूर्ण है वह भी दीप की भाँति होता है। ऐसा व्यक्ति जब समाज से जुड़ता है तो वह समाज को धन्य कर देता है। लघु मानव अपने लघु स्वरूप से घबराता नहीं है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अनुकूल आचरण करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रतिकूलता को अनुकूलता में तब्दील कर देता है।
जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर तकलीफें सहते हुए भी स्नेह से भरपूर होता है और रौशन करता है ठीक उसी तरह मनुष्य ज्ञान का प्रकाश फैलाता रहता है। जब कभी समाज में निंदा, अपमान, घृणा, अनादर, उपेक्षा आदि के कारण अंधकार व्याप्त हो जाता है तो दीप रूपी मनुष्य अपने प्रकाश रूपी ज्ञान से अंधकार रूपी अज्ञानता को दूर करता है। कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों के समक्ष वह घुटने नहीं टेकता बल्कि उसे अनुकूल वातावरण में बदल देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी वह करुणामय, द्रवित होकर जागरूकता का परिचय देते हुए सभी को अनुराग भरे नयनों से देखता है। अर्थात् उसके मन में सबके प्रति अनुराग और दया भाव बना रहता है। उसका आत्मविश्वास डिगता नहीं है। स्वयं अपनी पीड़ा का साक्षी बनकर दूसरों के हितार्थ अपनी बाहुएँ फैलाए रहता है। उन हाथों में अपनापा भरा रहता है। वह दूसरों को आत्मीयता से भर देता है। ऐसा मनुष्य श्रद्धावान होता है। अपने समय के अनुकूल कर्म के माध्यम से समाज का उत्थान करता है। ऐसे दीप रूपी व्यक्ति को पंक्तिरूपी समाज के विकास हेतु समर्पित करना श्रेयस्कर है। इससे उसका जीवन सार्थक हो जाएगा। इसीलिए उसे भक्ति को देना राष्ट्र हित के लिए है।
निष्कर्ष
इस कविता में व्यष्टि से समष्टि के मानवीय संबंध को भी कवि ने उजागर किया है। यहाँ लघु मानव की प्रतिष्ठा भी स्थापित है।
आपने ध्यान दिया होगा कि ‘यह दीप अकेला‘ कविता में कवि अज्ञेय ने प्रतीकों के माध्यम से अपने विचार की पुष्टि की है। व्यक्ति और समाज के अन्योनाश्रित संबंध को कविता में महत्त्व दिया गया है। कवि का मानना है कि व्यष्टि और समष्टि के समन्वय से ही विकास संभव होता है।
इस कविता में लघु मानव की प्रतिष्ठा सफलतापूर्वक की गई है। कविता की भाषा प्रतीकात्मक है। गंभीर विचार को कविता के साँचे में ढालने का सफल प्रयास हुआ है। इसलिए संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों की बहुलता परिलक्षित होती है। अज्ञेय की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाओं में से ‘यह दीप अकेला‘ शीर्षक कविता का स्थान उल्लेखनीय है।
काव्य सौष्ठव भाव-पक्ष
- व्यक्ति और समष्टि का समन्वय
यह कविता व्यक्तिवाद (Individualism) और समष्टिवाद (Collectivism) के बीच एक दार्शनिक सेतु का निर्माण करती है।
- कवि व्यक्ति की असाधारणता (‘यह अद्वितीय‘, ‘यह मेरा‘) को स्वीकार करते हैं, पर उसकी अंतिम सार्थकता सामाजिक समर्पण (‘पंक्ति‘, ‘शक्ति‘, ‘भक्ति‘) में पाते हैं। यह भारतीय दर्शन के ‘अहम् ब्रह्मास्मि‘ (व्यक्तिगत चेतना) को ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म‘ (सामूहिक चेतना) में विसर्जित करने का भाव है।
- गहन प्रतीकात्मकता
कविता में प्रयुक्त प्रत्येक उपमान साधारण न होकर गहन अर्थ रखता है:
- दीप: आत्म-विश्वास, ज्ञान, प्रेम और विशिष्टता का प्रतीक।
- पनडुब्बा: आत्म-साधना से प्राप्त दुर्लभ अनुभवों का प्रतीक।
- मधु और गोरस: जीवन-तत्व की पवित्रता, संचित सार और निश्छलता का प्रतीक।
- अंकुर: नवोदित शक्ति, साहस और भविष्य की आशा का प्रतीक।
- उदात्त मानवीय मूल्य
कविता में करुणा, दृढ़ता और आत्म-गौरव जैसे उदात्त मानवीय मूल्य समाहित हैं।
- यह उस व्यक्ति की गाथा है जो “कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम” में भी “सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त नेत्र” और “चिर-अखंड अपनापा” बनाए रखता है। यह निराशा में भी आशा का संदेश है।
कला-पक्ष
- प्रतीकात्मक शैली (Symbolic Style)
कवि ने पूरी कविता में लाक्षणिक (metaphorical) और प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग किया है। पूरी कविता एक विस्तारित रूपक (Extended Metaphor) है, जहाँ दीपक और उसकी विशेषताएँ व्यक्ति के जीवन और गुणों को दर्शाती हैं।
- बिंब-विधान (Imagery)
कविता में जीवंत और मूर्त बिंबों का प्रयोग हुआ है, जो पाठक के मन में चित्र खींच देते हैं:
- दृष्टि बिंब: “यह दीप अकेला स्नेहभरा,” “फोड़ धारा को रवि को ताकता निर्भय,” “धुँधुआते कड़वे तम में” (दृश्य को जीवंत बनाते हैं)।
- स्पर्श बिंब: “कड़वे तम” (पीड़ा के भाव को तीव्र करता है)।
- भाषा
- सरल और तत्सम प्रधान: भाषा सरल होते हुए भी तत्सम (संस्कृत मूल के) शब्दों का प्रयोग करती है, जिससे कविता में गंभीरता (dignity) और भावनात्मकता (pathos) आ जाती है (जैसे: समिधा, कृती, मौना, अयुत, गोरस, पय, कुत्सा, अवज्ञा)।
- ओज और प्रसाद गुण: कविता में जहाँ एक ओर ओज गुण है जो व्यक्ति की दृढ़ता (‘हठीला‘, ‘निर्भय‘) को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर प्रसाद गुण है जो सहजता से अर्थ को हृदयंगम कराता है (‘स्नेहभरा‘, ‘भक्ति को दे दो‘)।
- छंद और लय (Rhythm and Meter)
- अतुकांत और मुक्त छंद: यह कविता मुक्त छंद (Free Verse) में रची गई है, जो ‘नई कविता‘ की प्रमुख विशेषता है। इसमें पंक्तियों की लंबाई और मात्राएँ निश्चित नहीं हैं।
- लय (Internal Rhythm): मुक्त छंद में होते हुए भी कवि ने आंतरिक लय (Internal Rhythm) का अद्भुत प्रयोग किया है, जिससे कविता गेय बनी रहती है। यह लय पुनरावृत्ति (Repetition) से आती है:
“यह दीप, अकेला, स्नेहभरा, / है गर्वभरा, मदमाता, पर / इसको भी पंक्ति को दे दो।” इस पंक्ति की आवृत्ति कविता को एक संगीतात्मक दृढ़ता प्रदान करती है।

