सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म सन् 1897 ई० में बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ।
इन्होंने बाँग्ला, अंग्रेजी, संस्कृत और हिंदी हाई स्कूल की कक्षा तक आते-आते सीख ली।
निराला जी का पारिवारिक जीवन कष्टमय रहा।
सन् 1916 में इन्होंने ‘जूही की कली’ की रचना की। 1922 में रामकृष्णमिशन के पत्र ‘समन्वय’ का संपादन किया और 1923-24 में ‘मतवाला’ का संपादन किया। तीन वर्ष बाद ये लखनऊ आ गए और ‘गंगा पुस्तक माला’ का संपादन करने लगे। ये स्वभाव से विद्रोही तथा निर्भीक थे। ये बहुत स्पष्टवादी थे।
निराला जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ‘परिमल’, ‘जूही की कली’, ‘गीतिका’, ‘अनामिका’, ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘अपरा’, ‘तुलसीदास’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘अप्सरा’, ‘प्रभावती’ आदि इनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।
15 अक्तूबर, 1961 को इनका देहावसान हुआ।
भिक्षुक
वह आता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
साथ में दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओंठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
ठहरो, अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा।
अभिमन्यु-जैसे हो सकोगे तुम,
तुम्हारे दु:ख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
भिक्षुक कविता की सप्रसंग व्याख्या
01
वह आता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘भिक्षुक’ कविता से उद्धृत हैं।
प्रसंग:
कवि ने एक अत्यंत निर्धन और भूखे भिखारी का सजीव चित्रण किया है जो सड़क पर अपनी जीविका अर्थात् भीख प्राप्ति की आशा लिए संघर्ष कर रहा है।
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि वह भिक्षुक सड़क पर आ रहा है। उसकी दशा इतनी करुणाजनक है कि उसे देखकर देखने वाले का कलेजा मुँह को आता है अर्थात् हृदय काँप उठता है। वह अपनी गरीबी पर पछताता हुआ आगे बढ़ रहा है। भूख के कारण उसका पेट और पीठ पिचक कर एक हो गए हैं। वह अस्थियों का कंकाल मात्र रह गया है। शरीर में शक्ति नहीं है, इसलिए वह लकड़ी अर्थात लकुटिया के सहारे धीरे-धीरे चल रहा है। मात्र मुट्ठी भर अनाज पाकर अपनी भूख शांत करने के लिए वह अपनी फटी-पुरानी झोली का मुँह फैलाए हुए है।
शब्दार्थ:
दो टूक कलेजे के करना: अत्यधिक दुखी होना (Heart-wrenching)
पथ: रास्ता/सड़क (Path)
लकुटिया: छोटी लाठी (Walking stick)
टेक: सहारा लेकर (With support)
02
थ में दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओंठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘भिक्षुक’ कविता से उद्धृत हैं।
प्रसंग:
यहाँ भिक्षुक के साथ उसके दो बच्चों की मार्मिक स्थिति का वर्णन है।
व्याख्या:
भिक्षुक अकेला नहीं है, उसके साथ दो छोटे बच्चे भी हैं जो हमेशा भीख माँगने के लिए हाथ फैलाए रहते हैं। वे अपने बाएँ हाथ से पेट को मलते हुए चलते हैं ताकि लोग देख सकें कि वे भूखे हैं, और अपने दाहिने हाथ को लोगों के सामने फैलाते हैं ताकि उन्हें किसी की दया मिल सके। जब भूख के मारे उनके होंठ सूख जाते हैं, तो वे समाज के ‘दाता’ और ‘भाग्य-विधाताओं’ अर्थात् अमीर वर्ग की ओर देखते हैं, पर उन्हें वहाँ से कुछ नहीं मिलता। अंत में वे अपमान और दुख के आँसू पीकर रह जाते हैं।
शब्दार्थ:
दया-दृष्टि: रहम की नज़र (Pitying look)
दाता: दान देने वाला (Donor)
भाग्य-विधाता: यहाँ समाज के समृद्ध लोगों के लिए प्रयुक्त (Socio-economic masters)
घूँट आँसुओं के पीना: चुपचाप दुख सह लेना (To endure pain in silence)
03
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘भिक्षुक’ कविता से उद्धृत हैं।
प्रसंग:
यह अंश गरीबी की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
व्याख्या:
भूख इतनी तीव्र है कि वे भिक्षुक और बच्चे सड़क पर फेंकी गई जूठी पत्तलों को चाटने के लिए मजबूर हैं। विडंबना यह है कि उन जूठी पत्तलों के लिए भी उन्हें कुत्तों से मुकाबला करना पड़ रहा है। कुत्ते भी उन पत्तलों को छीन लेने के लिए अड़कर खड़े हैं। यह दृश्य मनुष्य की गरिमा के गिर जाने और सामाजिक विषमता का भयानक रूप प्रस्तुत करता है।
04
ठहरो, अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा।
अभिमन्यु-जैसे हो सकोगे तुम,
तुम्हारे दु:ख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।
संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘भिक्षुक’ कविता से उद्धृत हैं।
प्रसंग:
यहाँ कवि की सहानुभूति और क्रांतिकारी चेतना प्रकट हुई है।
व्याख्या:
भिक्षुक की ऐसी स्थिति देखकर कवि का अंतर्मन तड़प उठता है। वे कहते हैं— “ठहरो! मेरे हृदय में तुम्हारे प्रति अपार सहानुभूति और करुणा का अमृत है, मैं उस संवेदना से तुम्हारे जीवन को सींच दूँगा।” कवि उन्हें ढाँढस बँधाते हैं कि तुम समाज की विषमता रूपी चक्रव्यूह से लड़ने वाले ‘अभिमन्यु’ बन सकोगे। कवि प्रण करते हैं कि वे भिक्षुक के सारे दुखों को अपने काव्य और अपने हृदय में आत्मसात् कर लेंगे ताकि दुनिया को उनकी पीड़ा बता सकें।
शब्दार्थ:
अमृत: करुणा और सहानुभूति (Nectar of compassion)
सींचना: सिंचन करना/भर देना (To nurture/irrigate)
खींच लेना: अपना लेना/सोख लेना (To absorb)
कविता की मुख्य सीख
यह कविता हमें समाज के वंचित और निर्धन वर्ग के प्रति संवेदनशीलता रखने की सीख देती है। यह दिखाती है कि जहाँ एक ओर समाज में अत्यधिक संपन्नता है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष है। कवि हमें मानवता की सेवा और सामाजिक न्याय के लिए प्रेरित करते हैं।
अवतरणों पर आधारित प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-
(i) वह आता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को –
मुँह फटी-पुरानी झोली को फैलाता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता
(क) ‘दो टूक कलेजे के करता’- से कवि का क्या आशय है?
उत्तर- ‘दो टूक कलेजे के करता’ से आशय है कि भिक्षुक की स्थिति इतनी दयनीय है कि उसे देखकर देखने वाले का हृदय करुणा और दुख से भर जाता है।
(ख) ‘पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- ‘पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक’ का अर्थ है कि भिक्षुक अत्यधिक भूखा है। भूख के कारण उसका शरीर सूख कर कंकाल हो गया है और उसका पेट पिचक कर पीठ से सट गया है।
(ग) उपर्युक्त पंक्तियों के आधार पर भिक्षुक की दयनीय दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भिक्षुक बहुत दुर्बल है, वह लाठी के सहारे चल रहा है। उसके पास फटी-पुरानी झोली है। वह भूख मिटाने के लिए मुट्ठी भर दाने की आशा में भटक रहा है और अपनी दशा पर पछता रहा है।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भिक्षुक की शारीरिक और मानसिक वेदना का वर्णन है। वह भूख और गरीबी के बोझ तले दबा हुआ समाज की संवेदनहीनता के बीच संघर्ष कर रहा है।
(ii) साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाए।
भूख से सूख ओंठ जब जाते,
दाता भाग्य, विधाता से क्या पाते?
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
(क) भिक्षुक के साथ कौन हैं? वे क्या कर रहे हैं तथा क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भिक्षुक के साथ उसके दो छोटे बच्चे हैं। वे भी अपना हाथ फैलाए हुए हैं क्योंकि वे भी भूख से व्याकुल हैं और भीख माँगकर अपनी भूख शांत करना चाहते हैं।
(ख) ‘दाता-भाग्य-विधाता’ से कवि का संकेत किन की ओर है? कौन किन से क्या प्राप्त नहीं कर पाते?
उत्तर- ‘दाता-भाग्य-विधाता’ से कवि का संकेत समाज के समृद्ध और समर्थ लोगों की ओर है। भिक्षुक और उसके बच्चे इन धनी लोगों से कुछ भी सहायता या भोजन प्राप्त नहीं कर पाते।
(ग) ‘घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते’- मुहावरे का प्रयोग कवि ने किस संदर्भ में किया है?
उत्तर – कवि ने इस मुहावरे का प्रयोग उस अपमान और निराशा के संदर्भ में किया है जो भिक्षुक को तब मिलती है जब लोग उसे दुत्कार देते हैं। वह अपना दुख चुपचाप सह लेता है।
(घ) भिक्षुक के बच्चों की दयनीय दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर – बच्चे भूख से इतने बेहाल हैं कि अपनी भूख दिखाने के लिए वे बाएँ हाथ से पेट मलते हैं और दाहिना हाथ दया की भीख माँगने के लिए बढ़ाते हैं। उनके होंठ प्यास और भूख से सूख चुके हैं।
(iii) चाट रहे जूठी पत्तल वे, कभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
ठहरो, अहो। मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा।
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम,
तुम्हारे दुख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।
(क) भिक्षुक तथा उसके बच्चे क्या करने के लिए विवश हैं और क्यों?
उत्तर- वे सड़क पर पड़ी जूठी पत्तलों को चाटने के लिए विवश हैं क्योंकि उन्हें कहीं से भोजन नहीं मिला और भूख असहनीय हो गई है।
(ख) ‘और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए’- पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?
उत्तर- कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि भिक्षुक की स्थिति जानवरों से भी बदतर हो गई है। उसे उन जूठी पत्तलों के लिए भी कुत्तों से संघर्ष करना पड़ रहा है।
(ग) भिक्षुक कविता में कवि ने समाज को किस बात के लिए फटकारा है?
उत्तर- कवि ने समाज की विशमता और संवेदनहीनता के लिए फटकारा है, जहाँ एक ओर अपार धन है और दूसरी ओर मनुष्य जूठन खाने को मजबूर है।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने ‘अभिमन्यु’ शब्द का प्रयोग किस लिए किया है?
उत्तर – ‘अभिमन्यु’ शब्द का प्रयोग यह जताने के लिए किया गया है कि भिक्षुक समाज के गरीबी के चक्रव्यूह में फँसा है। कवि उसे साहस देना चाहते हैं ताकि वह इस परिस्थिति से लड़ सके।

