शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर नामक गाँव में 14 अगस्त, सन् 1915 में हुआ।
‘सुमन’ जी हाई स्कूल के अध्यापक के पद से लेकर, हिंदी के प्राध्यापक, महाविद्यालय के प्राचार्य तथा विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के उपकुलपति पद कार्यरत रहे। ये कुछ समय तक नेपाल में भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक सचिव भी रहे।
इन्होंने साधारण शोषित मानव की पीड़ा और निराशा को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है। दूसरी ओर एकांत क्षणों की कोमल तथा मधुर अनुभूतियों को भी अपने गीतों में स्थान दिया है।
‘सुमन’ जी की प्रमुख रचनाओं में- ‘हिल्लोल’, ‘जीवन के गान’, ‘प्रलय सृजन’, ‘मिट्टी की बारात’, ‘विश्वास बढ़ता ही गया’, ‘पप आँखें नहीं भरी’, ‘विंध्य हिमालय’ (काव्य); ‘प्रकृति पुरुष कालिदास’ (नाटक) और ‘महादेवी की काव्य साधना’ (आलोचना) प्रमुख हैं। इन्हें काव्य संग्रह पर ‘देव पुरस्कार’, ‘पर आँखें नहीं भरी’ पर ‘नवीन पुरस्कार’ तथा ‘मिट्टी की बारात’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।
सुमन जी हिंदी के सशक्त गीतकार हैं।
चलना हमारा काम है
गति प्रबल पैरों में भरी,
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा,
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा।
जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है।
चलना हमारा काम है।
कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया,
अच्छा हुआ तुम मिल गईं
कुछ रास्ता ही कट गया।
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है।
चलना हमारा काम है।
जीवन अपूर्ण लिए हुए,
पाता कभी, खोता कभी
आशा – निरशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी।
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है।
चलना हमारा काम है।
इस विशद – विश्व – प्रवाह में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह
किसको नहीं सहना पड़ा।
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ मुझ पर विधाता वाम है।
चलना हमारा काम है।
मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है।
चलना हमारा काम है।
कुछ साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए।
पर गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
चलता रहे हरदम, उसी की सफलता अभिराम है।
चलना हमारा काम है।
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
चलना हमारा काम है – सप्रसंग व्याख्या
01
गति प्रबल पैरों में भरी,
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा,
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा।
जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है।
चलना हमारा काम है।
संदर्भ –
प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर ‘शिवमंगल सिंह सुमन’ द्वारा रचित ‘चलना हमारा काम है’ से ली गई हैं।
प्रसंग –
कवि मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्ति पहचानने और लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
व्याख्या –
कवि कहते हैं कि जब ईश्वर ने हमारे पैरों में आगे बढ़ने की तीव्र शक्ति दी है, तो फिर हम यहाँ-वहाँ, दर-दर रुककर अपना समय क्यों नष्ट करें? हमारे सामने असीमित संभावनाओं का रास्ता खुला पड़ा है। कवि संकल्प करते हैं कि जब तक अंतिम लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक आराम करना संभव नहीं है। हमारा धर्म केवल आगे बढ़ना है।
शब्दार्थ –
प्रबल – बहुत तेज़/शक्तिशाली (Strong/Powerful)
विराम – आराम/रुकना (Rest/Pause)
02
कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया,
अच्छा हुआ तुम मिल गईं
कुछ रास्ता ही कट गया।
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है।
चलना हमारा काम है।
व्याख्या –
जीवन की लंबी यात्रा में जब हमें कोई सहयात्री मिल जाता है और हम उससे अपने सुख-दुख साझा कर लेते हैं, तो मन का बोझ हल्का हो जाता है। कवि कहते हैं कि तुम्हारे मिलने से जीवन का कठिन मार्ग सुगम हो गया और रास्ता आसानी से कट गया। इस यात्रा में हमारा कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं है; हम केवल एक ‘राही’ हैं और गति ही हमारी पहचान है।
शब्दार्थ –
राही – यात्री
बोझ – भार (Burden – यहाँ मानसिक दुख के संदर्भ में)
03
जीवन अपूर्ण लिए हुए,
पाता कभी, खोता कभी
आशा-निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी।
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है।
चलना हमारा काम है।
व्याख्या –
मनुष्य का जीवन कभी पूर्ण नहीं होता, उसमें हमेशा कुछ न कुछ कमी बनी रहती है। जीवन में लाभ-हानि, आशा-निराशा और सुख-दुख का चक्र चलता रहता है। कवि कहते हैं कि इन परिस्थितियों के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि हमारी आगे बढ़ना ‘गति’ और ‘मति’ कभी रुकनी नहीं चाहिए। हमें आठों पहर बस यही ध्यान रखना है।
शब्दार्थ –
अवरुद्ध – रुका हुआ (Blocked/Hindered)
आठों याम – चौबीसों घंटे/पूरे समय (All the time)
04
इस विशद-विश्व-प्रवाह में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह
किसको नहीं सहना पड़ा।
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ मुझ पर विधाता वाम है।
चलना हमारा काम है।
व्याख्या –
संसार एक विशाल नदी के प्रवाह की तरह है जिसमें हर किसी को बहना पड़ता है। सुख और दुख की धूप-छाँव हर व्यक्ति के जीवन में आती है। अतः यह कहना व्यर्थ है कि “भाग्य मेरे प्रतिकूल है”। जब दुख सबको सहना है, तो उसे अपनी विशेष बदकिस्मती मानकर रोना नहीं चाहिए, बल्कि चलते रहना चाहिए।
शब्दार्थ –
विशद – विशाल (Grand/Vast)
विधाता – ईश्वर/भाग्य (Creator/Fate)
वाम – प्रतिकूल/विपरीत (Adverse/Against)
05
मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है।
चलना हमारा काम है।
व्याख्या –
कवि स्वीकार करते हैं कि वे पूर्ण सुख और पूर्णता पाने के लिए भटकते रहे, लेकिन हर कदम पर बाधाएँ आती रहीं। फिर भी वे निराश नहीं हैं, क्योंकि वे समझ गए हैं कि बाधाओं से लड़ना और निरंतर प्रयास करना ही वास्तव में ‘जीवन’ है। संघर्ष के बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं है।
शब्दार्थ –
रोड़ा – बाधा/पत्थर (Obstacle)
पग – कदम (Step)
06
कुछ साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए।
पर गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
चलता रहे हरदम, उसी की सफलता अभिराम है।
चलना हमारा काम है।
व्याख्या –
जीवन यात्रा में बहुत से साथी मिलते हैं। कुछ अंत तक साथ देते हैं, तो कुछ कठिनाइयाँ देखकर बीच में ही वापस लौट जाते हैं या हिम्मत हारकर गिर जाते हैं। लेकिन जीवन किसी के लिए नहीं रुकता। वास्तविक सफलता उसी को मिलती है जो हर परिस्थिति में निरंतर चलता रहता है। निरंतरता ही सफलता की सुंदरता है।
शब्दार्थ –
अभिराम – सुंदर/मोहक (Beautiful/Pleasant)
कविता की सीख
यह कविता हमें कर्मठता, धैर्य और आशावाद की सीख देती है। यह सिखाती है कि सफलता केवल उन्हें मिलती है जो बाधाओं से डरे बिना और भाग्य को दोष दिए बिना निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं।
अवतरणों पर आधारित प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए-
(i) गति प्रबल पैरों में भरी,
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा,
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा।
जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है।
चलना हमारा काम है।
(क) ‘गति प्रबल पैरों में भरी’- पंक्ति द्वारा कवि मनुष्य को क्या संदेश दे रहा है?
उत्तर- इस पंक्ति द्वारा कवि संदेश दे रहे हैं कि ईश्वर ने मनुष्य के पैरों में आगे बढ़ने की अपार शक्ति दी है। अतः मनुष्य को अपनी क्षमताओं को पहचानकर आलस्य का त्याग करना चाहिए और कर्मशील बनना चाहिए।
(ख) कवि मनुष्य को दर-दर पर खड़ा न होने की प्रेरणा क्यों दे रहा है?
उत्तर- कवि दर-दर खड़ा न होने की प्रेरणा इसलिए दे रहे हैं क्योंकि जीवन पथ अत्यंत विशाल है और समय सीमित। लक्ष्य अभी दूर है, इसलिए रुककर समय नष्ट करने के बजाय निरंतर प्रयास करना ही उचित है।
(ग) ‘जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है’ – पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?
उत्तर- कवि स्पष्ट करना चाहते हैं कि जीवन का वास्तविक सुख विश्राम में नहीं बल्कि लक्ष्य प्राप्ति के संघर्ष में है। जब तक अंतिम सफलता प्राप्त न हो जाए, तब तक चैन से बैठना या हार मानना अनुचित है।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- इन पंक्तियों का भाव यह है कि मनुष्य को अपनी शक्तियों का सदुपयोग करते हुए जीवन पथ पर बिना रुके निरंतर चलते रहना चाहिए, क्योंकि गति ही जीवन है और जड़ता मृत्यु।
(ii) कुछ कह लिया,
कुछ सुन लिया कुछ
बोझ अपना बँट गया,
अच्छा हुआ तुम मिल गईं
कुछ रास्ता ही कट गया।
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है।
चलना हमारा काम है।
(क) ‘कुछ बोझ अपना बँट गया’ कवि के यह कहने का क्या भाव है
उत्तर- इसका भाव यह है कि जीवन की यात्रा अकेले काटना कठिन है। जब हमें कोई सहयात्री मिलता है और हम उससे अपने सुख-दुख साझा करते हैं, तो मन की वेदना कम हो जाती है और मानसिक भारीपन हल्का हो जाता है।
(ख) ‘अच्छा हुआ तुम मिल गईं ‘ – कवि को कौन, कहाँ मिल गई? उसके मिलने से उसे क्या लाभ हुआ?
उत्तर- कवि को जीवन रूपी मार्ग पर एक सहयात्री अर्थात् प्रेरणा या जीवनसाथी मिल गया है। उसके मिलने से कवि का अकेलापन दूर हुआ, बातचीत से मन बहला और जीवन का कठिन रास्ता सुगमता से कट गया।
(ग) कवि अपना परिचय किस रूप में देता है और क्यों?
उत्तर- कवि अपना परिचय एक ‘राही’ या ‘यात्री’ के रूप में देता है क्योंकि वह मानता है कि संसार में कोई भी स्थिर नहीं है। हम सब यहाँ एक निश्चित यात्रा पर आए हैं जहाँ निरंतर चलते रहना ही हमारी पहचान है।
(iii) जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी, खोता कभी
आशा-निराशा से घिरा
हँसता कभी, रोता कभी।
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है।
चलना हमारा काम है।
(क) कवि ने जीवन को अपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर- जीवन अपूर्ण है क्योंकि मनुष्य की सभी इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। संसार में कुछ न कुछ कमी हमेशा बनी रहती है और पूर्णता की चाह ही मनुष्य को सक्रिय रखती है।
(ख) उपर्युक्त पंक्तियों में जीवन की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर- यहाँ जीवन की अस्थिरता, लाभ-हानि, सुख-दुख, आशा-निराशा और निरंतर परिवर्तनशील स्वभाव की ओर संकेत किया गया है।
(ग) ‘गति-मति न हो अवरुद्ध’- पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- इसका आशय है कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों सुखद या दुखद, न तो हमारे बढ़ने की गति रुकनी चाहिए और न ही हमारे विवेक या बुद्धि को कुंठित होना चाहिए।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवि मनुष्य को क्या प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर- कवि प्रेरणा दे रहे हैं कि जीवन के द्वंद्वों में उलझने के बजाय मनुष्य को सचेत रहकर अपने विकास और कर्म की निरंतरता पर ध्यान देना चाहिए।
(iv) इस विशद विश्व-प्रवाह में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह
किसको नहीं सहना पड़ा।
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है।
चलना हमारा काम है।
(क) उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने मानव-जीवन की किस सच्चाई को उजागर किया है?
उत्तर- कवि ने यह सार्वभौमिक सत्य उजागर किया है कि संसार के इस विशाल प्रवाह में हर व्यक्ति को सुख और दुख दोनों का सामना करना पड़ता है। कोई भी इससे मुक्त नहीं है।
(ख) ‘फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है’- पंक्ति द्वारा कवि क्या संकेत कर रहा है तथा क्यों?
उत्तर – कवि संकेत कर रहे हैं कि हमें अपनी कठिनाइयों के लिए भाग्य को दोष नहीं देना चाहिए, क्योंकि विपरीत परिस्थितियाँ सबके जीवन में आती हैं। अकेले खुद को अभागा मानना केवल एक भ्रम है।
(ग) उपर्युक्त पंक्तियों में भाग्य पर रोने को मनुष्य की किस दुर्बलता की निशानी बताया गया है?
उत्तर- भाग्य को प्रतिकूल मानकर रोना मनुष्य की नकारात्मकता और पुरुषार्थहीनता की निशानी है। यह प्रगति के मार्ग में बाधक है।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवि क्या संदेश दे रहा है?
उत्तर- कवि द्वारा दिया गया संदेश यह है कि दुख को जीवन का अनिवार्य अंग मानकर धैर्यपूर्वक स्वीकार करें और बिना विचलित हुए अपने मार्ग पर बढ़ते रहें।
(v) मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है।
चलना हमारा काम है।
(क) ‘मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा’- पंक्ति द्वारा कवि का क्या आशय है?
उत्तर- कवि का आशय है कि मनुष्य अक्सर आदर्श स्थितियों या पूर्ण सुख की तलाश में भटकता रहता है, जो वास्तव में इस संसार में संभव नहीं है।
(ख) ‘प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ रोड़ा अटकता ही रहा’- पंक्ति द्वारा मानव-जीवन की किस सच्चाई को उजागर किया गया है?
उत्तर- यह पंक्ति इस सच्चाई को दर्शाती है कि प्रगति का मार्ग बाधाओं से भरा होता है। बिना संघर्ष के कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता।
(ग) ‘जीवन इसी का नाम है’- पंक्ति द्वारा कवि ने मानव जीवन के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर- कवि ने कहा है कि आशा-निराशा और बाधाओं के बीच निरंतर प्रयास करते रहना ही वास्तविक जीवन है। केवल सुख की स्थिति को जीवन नहीं कहा जा सकता।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा स्पष्ट कीजिए कि जीवन में आने वाली बाधाओं का सामना हमें किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर- बाधाओं से निराश होने के बजाय हमें उन्हें सहजता से स्वीकार करना चाहिए और साहस के साथ उनसे टकराते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
(vi) कुछ साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए।
पर गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
चलता रहे हरदम, उसी की सफलता अभिराम है।
चलना हमारा काम है।
(क) ‘कुछ साथ में चलते रहे, कुछ बीच से ही फिर गए’ – पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर- कवि कहना चाहते हैं कि जीवन में कई साथी मिलते हैं, जिनमें से कुछ अंत तक साथ निभाते हैं और कुछ कठिनाइयाँ आने पर या हिम्मत हारकर मार्ग बदल लेते हैं।
(ख) ‘चलना हमारा काम है’- कविता में भाग्यवाद पर किस प्रकार चोट की गई है?
उत्तर- कविता में ‘विधाता वाम है’ जैसी सोच को नकारकर और निरंतर कर्म करने पर बल देकर भाग्यवाद पर चोट की गई है। कवि भाग्य के बजाय गति और कर्म को प्रधान मानता है।
(ग) कवि के अनुसार जीवन में सफलता किसे मिलती है?
उत्तर- कवि के अनुसार जीवन में सफलता उसी को मिलती है जो बिना रुके, बिना विचलित हुए हरदम चलता रहता है और जो गिर जाने अर्थात् असफल होने पर भी हार नहीं मानता।
(घ) कवि ने कविता में ‘चलना हमारा काम है’- पंक्ति को बार-बार क्यों दोहराया गया है? कवि इससे क्या प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर- इस पंक्ति को बार-बार दोहराकर कवि निरंतरता और कर्मठता के महत्त्व को रेखांकित कर रहे हैं। वह प्रेरणा दे रहे हैं कि रुकना पतन है और चलना ही विकास एवं सफलता की कुंजी है।

