ICSE, Class, IX and X, Sahitya Sagar, Chapter – Netaji Ka Chashma, Swayam Prakash, नेता जी का चश्मा, स्वयं प्रकाश

लेखक परिचय – स्वयं प्रकाश

स्वयं प्रकाश का जन्म 20 जनवरी 1947 को मध्य प्रदेश के इंदौर नामक शहर में हुआ। आजकल आप भोपाल में रहकर साहित्य-सृजन कर रहे हैं तथा ‘वसुधा’ पत्रिका के संपादन से जुड़े हैं।

स्वयं प्रकाश जी एक सशक्त उपन्यासकार तथा कहानीकार हैं। अब तक उनके तेरह कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें सूरज कब निकलेगा’, ‘आएँगे अच्छे दिन भी’ तथा ‘आदमी जात का आदमी’ बहुचर्चित हैं। इनकी कहानियों का अनुवाद रूसी भाषा में भी हुआ है। उनके विनय और ईंधन उपन्यास भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ‘हमसफ़रनामा’ इनके रेखाचित्रों का संकलन है।

इन्हें वर्ष 2011 के प्रतिष्ठित ‘आनंद सागर कथाक्रम सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘रांगेय राघव पुरस्कार’, ‘पहल सम्मान’, ‘बनमाली पुरस्कार’ आदि से भी पुरस्कृत किया गया है।

इनकी कहानियों में वर्ग शोषण के विरुद्ध चेतना है।

पाठ का सारांश

स्वयं प्रकाश द्वारा रचित कहानी ‘नेताजी का चश्मा’ देशभक्ति की भावना पर आधारित एक अत्यंत प्रेरणादायक रचना है। यह कहानी हमें बताती है कि देशभक्ति केवल बड़े-बड़े नारों या युद्धों में नहीं, बल्कि हमारे छोटे-छोटे कार्यों और महापुरुषों के प्रति सम्मान में भी झलकती है।

हालदार साहब कंपनी के काम से हर पंद्रहवें दिन एक कस्बे से गुजरते थे। उस कस्बे के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा लगी थी। मूर्ति सुंदर थी, लेकिन उस पर चश्मा नहीं था जिसका कारण संभवतः मूर्तिकार बनाना भूल गया था। हालदार साहब ने देखा कि एक बूढ़ा, लंगड़ा व्यक्ति जिसे लोग ‘कैप्टन’ कहते थे, अपनी ओर से मूर्ति पर असली चश्मा लगा देता था। वह अपनी छोटी-सी दुकान के चश्मों में से एक चश्मा नेताजी को पहना देता और ग्राहक आने पर उसे बदलकर दूसरा लगा देता।

हालदार साहब कैप्टन की इस देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। एक दिन कैप्टन की मृत्यु हो गई और मूर्ति बिना चश्मे के रह गई। हालदार साहब दुखी हुए और उन्होंने सोचा कि अब नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं होगा। लेकिन अगली बार जब वे वहाँ से गुजरे, तो उन्होंने देखा कि मूर्ति पर किसी बच्चे ने ‘सरकंडे’ अर्थात् एक पौधे के डंठल का बना छोटा-सा चश्मा लगा दिया है। यह देखकर उनकी आँखें भर आईं, क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि नई पीढ़ी में भी देशभक्ति की भावना जीवित है।

 

पाठ का उद्देश्य और छात्रों के लिए सीख

उद्देश्य – लेखक का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि देश का निर्माण केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले नागरिकों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और महापुरुषों के प्रति सम्मान से होता है। कहानी ‘कैप्टन’ जैसे साधारण व्यक्ति के माध्यम से गुमनाम देशभक्तों के योगदान को रेखांकित करती है।

सीख – हमें अपने देश के महापुरुषों और प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए।

देशभक्ति दिखाने के लिए सेना में होना ही जरूरी नहीं, छोटे-छोटे नेक कार्य भी देशभक्ति हैं।

बच्चों में देशभक्ति के संस्कार डालना देश के भविष्य के लिए अनिवार्य है।

शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, जैसे कि पानवाले ने कैप्टन का उड़ाया था।

 

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

1 – सिलसिला – क्रम – Sequence / Series

2 – प्रतिमा – मूर्ति – Statue

3 – ऊहापोह – असमंजस – Dilemma / Confusion

4 – बस्ट – कंधे तक की मूर्ति – Bust (statue)

5 – कमसिन – छोटी उम्र का – Young / Tender age

6 – लक्षित – देखा हुआ – Noticed / Targeted

7 – कौतुक – हैरानी/अचरज – Curiosity / Wonder

8 – निष्कर्ष – नतीजा – Conclusion

9 – सराहनीय – प्रशंसा के योग्य – Praiseworthy

10 – दुर्दमनीय – जिसे दबाना कठिन हो – Irrepressible

11 – खुशमिज़ाज़ – हंसमुख – Cheerful

12 – थिरकी – हिलना – Quivered / Jiggled

13 – बत्तीसी – दांतों की पंक्ति – Set of teeth

14 – दरकार – जरूरत – Need / Requirement

15 – पारदर्शी – जिसके आर-पार दिखे – Transparent

16 – बारीकी – सूक्ष्मता – Fineness / Detail

17 – विचित्र – अनोखा – Strange / Peculiar

18 – नतमस्तक – सिर झुकाना – Bowing down

19 – भूतपूर्व – पिछला – Former / Ex

20 – मरियल – बहुत कमजोर – Feeble / Sickly

21 – संदूकची – छोटा बक्सा – Small casket / box

22 – अवाक् – हैरान/चुप – Speechless

23 – प्रफुल्लता – खुशी – Joy / Cheerfulness

24 – रवाना – प्रस्थान – Departed

25 – कौम – जाति/राष्ट्र – Nation / Community

26 – हृदयस्थली – बीचों-बीच – Heart (of the place)

27 – प्रतिष्ठापित – स्थापित – Installed

28 – होम करना – न्योछावर करना – To sacrifice

29 – सरकंडा – एक प्रकार की घास – Reed

30 – भावुक – भावनाओं में बहने वाला – Emotional

31 – उल्लास – उमंग – Exultation / Joy

32 – हतबुद्धि – चकित – Bewildered

33 – वास्तविक – असली – Real / Actual

34 – विलीन – गायब – Vanished

35 – वेदना – पीड़ा – Agony / Pain

36 – आहत – दुखी/चोट खाया – Hurt

37 – असुविधा – परेशानी – Inconvenience

38 – गिराक – ग्राहक – Customer

39 – प्रयास – कोशिश – Effort

40 – कसर – कमी – Lack / Shortcoming

41 – खटकना – बुरा लगना – To annoy / To prick

42 – वास्तविक – असल – Actual

43 – अफ़वाह – झूठी खबर – Rumour

44 – शासनावधि – शासन का समय – Tenure

45 – उपलब्ध – मौजूद – Available

46 – अनुमान – अंदाज़ा – Estimate

47 – विचित्र – अजीब – Weird

48 – नतमस्तक – सम्मान में झुकना – Prostrate

49 – लथपथ – भरा हुआ – Drenched

50 – अटेंशन – सावधान की मुद्रा – Attention position

 

पाठ के स्मरणीय बिंदु

कस्बे की नगरपालिका द्वारा नेताजी की प्रतिमा लगवाना।

मूर्ति में ‘कसर’ – संगमरमर का चश्मा न होना।

कैप्टन द्वारा बार-बार चश्मा बदला जाना।

पानवाले द्वारा कैप्टन को ‘पागल’ और ‘लंगड़ा’ कहकर अपमानित करना।

कैप्टन की मृत्यु और हालदार साहब की उदासी।

अंत में ‘सरकंडे का चश्मा’ – उम्मीद की किरण कि अगली पीढ़ी जागरूक है।

 

पात्र परिचय

हालदार साहब – कहानी के मुख्य पात्र। वे एक भावुक, संवेदनशील और सच्चे देशभक्त हैं। वे महापुरुषों के प्रति सम्मान रखते हैं और कैप्टन जैसे छोटे व्यक्ति की भावना की भी कद्र करते हैं।

कैप्टन (चश्मेवाला) – एक बूढ़ा, मरियल और लंगड़ा व्यक्ति। वह गरीब है लेकिन उसका दिल देशभक्ति से भरा है। उसे नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति आहत करती है, इसलिए वह स्वेच्छा से चश्मा लगाता है।

पानवाला – कस्बे का एक खुशमिजाज, मोटा और बातूनी व्यक्ति। वह कैप्टन का मजाक उड़ाता है, लेकिन अंत में उसकी मृत्यु पर वह भी उदास हो जाता है, जो उसके भीतर छिपी मानवीयता को दर्शाता है।

मास्टर मोतीलाल – कस्बे के ड्राइंग मास्टर, जिन्होंने जल्दबाजी में मूर्ति तो बनाई पर चश्मा बनाना भूल गए या सफल नहीं हो पाए।

 

संक्षिप्त प्रश्न

(i) हालदार साहब को हर पंद्रहवें दिन कंपनी के काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुज़रना पड़ता था।  

(क) कस्बे की क्या – क्या विशेषताएँ थीं?

उत्तर- कस्बा बहुत बड़ा नहीं था। वहाँ कुछ पक्के मकान, एक बाज़ार, लड़कों और लड़कियों के एक-एक स्कूल, एक छोटा सीमेंट कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक नगरपालिका थी।

(ख) नगरपालिका भी कुछ-न-कुछ करती रहती थी— स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- नगरपालिका कस्बे के विकास के लिए कुछ न कुछ काम करती रहती थी, जैसे—सड़कें पक्की करवाना, पेशाबघर बनवाना, कबूतरों के लिए छतरी बनवाना या कभी-कभी कवि सम्मेलन का आयोजन करवाना।

(ग) सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा किसने, कहाँ लगवाई? उसे बनाने का काम किसे सौंपा गया और क्यों?

उत्तर- नगरपालिका के किसी उत्साही अधिकारी ने शहर के मुख्य बाज़ार के चौराहे पर नेताजी की प्रतिमा लगवाई। स्थानीय कलाकार ड्राइंग मास्टर मोतीलाल को यह काम इसलिए सौंपा गया क्योंकि अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी नहीं थी और बजट व समय की कमी थी।

(घ) नेताजी की मूर्ति की क्या विशेषताएँ थीं? मूर्ति में किस चीज़ की कमी थी?

उत्तर- मूर्ति संगमरमर की थी, टोपी से कोट के दूसरे बटन तक दो फुट ऊँची बस्ट थी। नेताजी सुंदर, मासूम और फौजी वर्दी में लग रहे थे। मूर्ति में केवल एक कमी थी—नेताजी की आँखों पर संगमरमर का चश्मा नहीं था।

 

(ii) क्या मतलब? क्यों चेंज कर देता है? हालदार साहब अब भी नहीं समझ पाए?

(क) पानवाले ने कैप्टन चश्मेवाले द्वारा नेताजी की मूर्ति का चश्मा चेंज करने के संबंध में क्या बताया?

उत्तर- पानवाले ने बताया कि कैप्टन चश्मेवाला मूर्ति का चश्मा बदल देता है। यदि किसी ग्राहक को वैसा ही फ्रेम चाहिए जैसा मूर्ति पर लगा है, तो वह उसे उतारकर ग्राहक को दे देता है और मूर्ति पर नया फ्रेम लगा देता है।

(ख) पानवाले की बात सुनकर भी हालदार साहब को कौन-सी बात अभी भी समझ में नहीं आई?

उत्तर- पानवाले की बात सुनकर भी हालदार साहब को यह बात समझ नहीं आई कि नेताजी का ओरिजिनल अर्थात् असली चश्मा कहाँ गया? वे सोच रहे थे कि पत्थर की मूर्ति के साथ पत्थर का ही चश्मा होना चाहिए था।

(ग) पानवाले ने हालदार साहब की बात का क्या उत्तर दिया? उसका उत्तर उसके लिए तथा हालदार साहब के लिए अलग-अलग किस प्रकार था?

उत्तर- पानवाले ने हालदार साहब की बात का उत्तर दिया—”मास्टर बनाना भूल गया।” यह उत्तर पानवाले के लिए एक ‘मज़ेदार’ बात थी, लेकिन हालदार साहब के लिए यह ‘चकित और द्रवित’ करने वाली थी क्योंकि उन्हें मूर्तिकार की लाचारी महसूस हुई।

(घ) मूर्ति बनानेवाले के संबंध में हालदार साहब के मन में किस प्रकार के भाव जाग्रत हुए?

उत्तर- हालदार साहब के मन में मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल के प्रति सहानुभूति का भाव जागा। उन्होंने सोचा कि बेचारे ने कोशिश तो की होगी, पर बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा या वह पारदर्शी पत्थर का चश्मा बना नहीं पाया होगा।

 

(iii) ‘नहीं साब, वो लँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में? पागल है, पागल। वो देखो वो आ रहा है। आप उसी से बात कर लो। फ़ोटो-वोटो छपवा दो उसका कहीं।

(क) हालदार साहब को पानवाले की कौन-सी बात अच्छी नहीं लगी और क्यों?

उत्तर- हालदार साहब को पानवाले द्वारा एक देशभक्त कैप्टन का मज़ाक उड़ाया जाना अच्छा नहीं लगा। उन्हें बुरा लगा कि एक व्यक्ति जो नेताजी के प्रति इतना सम्मान रखता है, उसे पानवाला ‘पागल’ और ‘लँगड़ा’ कह रहा है।

(ख) सेनानी न होने पर भी चश्मेवाले को कैप्टन क्यों कहा जाता था? सोचकर लिखिए।

उत्तर- चश्मेवाला कभी सेना में नहीं रहा था, फिर भी लोग उसे ‘कैप्टन’ कहते थे क्योंकि नेताजी के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा और देशभक्ति की भावना प्रबल थी। शायद उसकी इसी फौजी जैसी निष्ठा के कारण उसे यह उपनाम मिला।

(ग) चश्मेवाले को देखकर हालदार साहब अवाक् क्यों रह गए? चश्मेवाले का परिचय दीजिए।

उत्तर- हालदार साहब उसे फौजी या रोबीला व्यक्ति समझ रहे थे, लेकिन सामने एक बेहद बूढ़ा, मरियल और लँगड़ा आदमी देखकर वे अवाक् रह गए। चश्मेवाला सिर पर गाँधी टोपी पहनता था और हाथ में बाँस पर टँगे चश्मे लेकर फेरी लगाता था।

(घ) हालदार साहब पानवाले से क्या पूछना चाहते थे और क्यों? पानवाले ने उनकी बात पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की?

उत्तर- हालदार साहब पूछना चाहते थे कि उसका नाम ‘कैप्टन’ क्यों पड़ा? क्या वह आज़ाद हिंद फ़ौज का सिपाही था? पानवाले ने चिढ़कर प्रतिक्रिया दी कि वह इस बारे में और बात नहीं करना चाहता और कैप्टन को ‘पागल’ बताया।

(iv) ‘बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का, जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी, जवानी-जिंत सब कुछ होम कर देने वालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है?

(क) उपर्युक्त कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इस कथन का आशय है कि जो समाज अपने देश के बलिदानियों और देशभक्तों का सम्मान करने के बजाय उनका उपहास उड़ाता है, उस कौम का भविष्य अंधकारमय होता है। ऐसी कौम केवल अपने स्वार्थ के लिए बिकने को तैयार रहती है।

(ख) हालदार साहब को कैप्टन चश्मेवाला देशभक्त क्यों लगा? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कैप्टन गरीब और शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति को अधूरा मानता था। वह अपनी सीमित आय में से भी मूर्ति पर चश्मा लगाकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करता था, जो उसकी सच्ची देशभक्ति का प्रमाण था।

(ग) पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब उस कस्बे से गुज़रे तो उनके मन में कौन-कौन से विचार आ रहे थे?

उत्तर- पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब उस कस्बे से गुज़रे तो उनके मन में विचार आ रहा था कि आज चौराहे पर रुकेंगे नहीं क्योंकि कैप्टन मर चुका है और मास्टर चश्मा बनाना भूल गया है, इसलिए नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं होगा और वे बिना चश्मे वाली मूर्ति को देख नहीं पाएँगे।

(घ) चौराहे पर रुकते हुए हालदार साहब क्या देखकर भावुक हो गए और क्यों?

उत्तर- हालदार साहब मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा देखकर भावुक हो गए। यह देखकर उनकी आँखों में आँसू आ गए कि भले ही कैप्टन मर गया, लेकिन देश के बच्चों अर्थात् भावी पीढ़ी में अब भी देशभक्ति और महापुरुषों के प्रति सम्मान जीवित है।

 

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