लेखक परिचय – जयशंकर प्रसाद
श्री जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में सन् 1889 को हुआ। घर पर ही इन्होंने अंग्रेज़ी, संस्कृत, हिंदी, उर्दू तथा फ़ारसी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। 1937 में 48 वर्ष की अल्पायु में इनका निधन हो गया।
बचपन से ही इन्हें कविता के प्रति गहरा अनुराग था। प्रारंभ में इन्होंने, ब्रज भाषा में काव्य-रचना की, पर बाद में खड़ी बोली को अपनाया।
प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। कविता के अतिरिक्त इन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानियाँ भी लिखी हैं। ‘अजातशत्रु’, ‘चंद्रगुप्त’, ‘धुवस्वामिनी’ – इनके प्रसिद्ध नाटक; ‘कंकाल’ और ‘तितली’ उपन्यास; ‘काव्य और कला’ – निबंध ‘कामायनी’, ‘आँसू’, ‘लहर’, ‘झरना’-काव्य तथा ‘आकाशदीप’, ‘इंद्रजाल’, ‘आँधी और छाया’- कहानी संग्रह हैं।
प्रसाद जी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग, देशप्रेम की भावना कूट-कूटकर भरी है।
पाठ का सारांश
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कहानी ‘संदेह’ मानवीय संवेदनाओं, मानसिक द्वंद्व और भ्रम की एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है।
रामनिहाल अपना सामान बाँधकर कहीं जाने की तैयारी कर रहा है। उसके कमरे में बुद्ध की प्रतिमा है और उसके हाथों में कुछ पत्र और एक चित्र है। वह अतीत की स्मृतियों में खोया हुआ है और उसकी आँखों में आँसू हैं। मकान मालकिन श्यामा, जो एक विधवा है और आदर्श जीवन जीती है, वहाँ आती है और उसके दुख का कारण पूछती है।
रामनिहाल श्यामा को बताता है कि वह खुद को बहुत चतुर समझता था, लेकिन असल में वह अभागा निकला। वह अपनी एक पुरानी घटना सुनाता है जब वह ब्रजकिशोर बाबू के यहाँ काम करता था। एक बार वह ब्रजकिशोर के संबंधी मोहन बाबू और उनकी पत्नी मनोरमा को गंगा की सैर कराने ले गया। वहाँ उसने देखा कि मोहन बाबू मानसिक रूप से अस्थिर अर्थात् विक्षिप्त हैं और उन्हें अपनी पत्नी मनोरमा और ब्रजकिशोर पर संदेह है कि वे उन्हें पागल घोषित कर उनकी संपत्ति हड़पना चाहते हैं। मनोरमा ने संकट की घड़ी में रामनिहाल का हाथ थामकर उससे सहायता माँगी थी।
रामनिहाल को भ्रम हो गया था कि मनोरमा उससे प्रेम करती है। लेकिन कहानी के अंत में जब श्यामा उसके हाथ से वह चित्र छीनती है जिसे देखकर वह रो रहा था, तो पता चलता है कि वह चित्र मनोरमा का नहीं बल्कि श्यामा का था। रामनिहाल मनोरमा के पत्रों को प्रेम पत्र समझ बैठा था, जबकि वह केवल सहायता की पुकार थी। श्यामा उसे डाँटती है और उसका भ्रम दूर करती है। वह उसे पटना जाकर मनोरमा की सहायता करने का आदेश देती है और कहती है कि उसका घर यहीं है और उसे कहीं भी जाने की ज़रूरत नहीं है।
पाठ का उद्देश्य और छात्रों के लिए सीख
उद्देश्य – लेखक यह दिखाना चाहते हैं कि मनुष्य अक्सर अपनी कल्पनाओं और ‘संदेह’ के कारण सत्य से दूर हो जाता है। अकेलापन व्यक्ति को मानसिक रूप से भावुक और भ्रमित बना देता है।
सीख –
- अधिक चतुराई मनुष्य को अपनों और ईश्वर की दया से दूर कर देती है।
- दूसरों की सहायता की पुकार को व्यक्तिगत प्रेम समझना एक मानसिक भ्रम है।
- जीवन में एक ‘अवलम्ब’ अर्थात् सहारा और सही मार्गदर्शन जैसे श्यामा रामनिहाल को ने दिया, की बहुत आवश्यकता होती है।
- संदेह और भ्रम का निवारण स्पष्ट बातचीत और साहस से ही संभव है।
पात्र परिचय
रामनिहाल – कहानी का मुख्य पात्र। वह भावुक, अंतर्मुखी और थोड़ा भ्रमित स्वभाव का है। वह खुद को चतुर मानता है पर अंदर से अकेला है।
श्यामा – एक विधवा स्त्री जो दृढ़ चरित्र और ऊँचे आदर्शों वाली है। वह रामनिहाल के लिए एक संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है।
मनोरमा – एक पीड़ित स्त्री जो अपने पति के मानसिक रोग और रिश्तेदारों के षड्यंत्र के बीच फँसी है। वह साहसी है और मदद माँगना जानती है।
मोहन बाबू – मनोरमा के पति। वे संदेह की बीमारी अर्थात् पैरानोइया से ग्रस्त हैं और हर किसी को अपना दुश्मन समझते हैं।
ब्रजकिशोर – मोहन बाबू के संबंधी, जो स्वार्थी हैं और उनकी संपत्ति पर नजर गड़ाए हुए हैं।
पाठ के स्मरणीय बिंदु
रामनिहाल का अपनी गृहस्थी को ‘कंजर के टट्टू’ की तरह पीठ पर लादे घूमना उसके अकेलेपन को दर्शाता है।
बुद्ध की प्रतिमा ‘विराग’ का प्रतीक है, जबकि रामनिहाल ‘राग’ अर्थात् मोह का प्रतीक बना बैठा है।
मृग मरीचिका – रामनिहाल की सुख की खोज एक मृग मरीचिका (illusion) के समान थी।
गंगा का दृश्य – दीपदान का दृश्य जीवन की नश्वरता और दर्शन को प्रस्तुत करता है।
क्लाइमेक्स – श्यामा द्वारा चित्र लेना और रामनिहाल के ‘त्रिकोणीय भ्रम’ अर्थात् मनोरमा का उसे चाहना और उसका श्यामा को चाहना, का पर्दाफाश करना।
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
1 – जंगले – खिड़की की जाली – Window-grille
2 – तड़प रही – चमक रही (प्रकाश के संदर्भ में) – Flickering / Quivering
3 – उज्ज्वल – साफ़ और चमकीला – Radiant / Bright
4 – आलोक खण्ड – प्रकाश का टुकड़ा – Fragment of light
5 – दर्पण – शीशा – Mirror
6 – प्रतिमा – मूर्ति – Statue / Idol
7 – अर्पण – भेंट करना / चढ़ाना – Offering
8 – ध्यानमग्न – ध्यान में डूबा हुआ – Meditative / Absorbed
9 – चौंधियाती – आँखों का चुंधियाना – Dazzling
10 – गंभीर – शांत और गहरा – Serious / Grave
11 – बण्डल – गट्ठर – Bundle
12 – हिचक – हिचकिचाहट – Hesitation
13 – भयानक – डरावना – Dreadful / Scary
14 – लिफ़ाफ़ा – चिट्ठी का कवर – Envelope
15 – विराग – वैराग्य / वैराग्य भाव – Detachment
16 – विराग-महिमा – वैराग्य की महानता – Glory of detachment
17 – रागशैल – प्रेम या मोह का पर्वत – Mountain of attachment
18 – अचल – जो हिले नहीं / स्थिर – Immovable
19 – द्रव – पिघला हुआ (यहाँ आँसू) – Fluid / Liquid
20 – निर्झरिणी – झरना / नदी – Stream / Rivulet
21 – विस्मृत – बेसुध / भूला हुआ – Oblivious / Forgotten
22 – करुणा-धारा – दया या दुख की नदी – Stream of compassion
23 – अपराध – गलती / गुनाह – Offence / Crime
24 – प्रायश्चित – पश्चाताप – Penance / Atonement
25 – सावधान – सतर्क – Cautious / Alert
26 – प्रस्तुत – तैयार – Ready / Prepared
27 – प्रतिबिम्ब – परछाईं / अक्स – Reflection
28 – कठोर व्रत – कठिन नियम – Stern vow
29 – वैधव्य – विधवा होने की अवस्था – Widowhood
30 – आदर्श – नमूना / मिसाल – Ideal
31 – दमन – दबाना – Suppression
32 – वासनाओं – इच्छाओं / कामेच्छा – Desires / Lusts
33 – अवलम्ब – सहारा – Support
34 – दृढ़ – मज़बूत – Firm / Strong
35 – देवप्रतिमाएँ – देवताओं की मूर्तियाँ – Idols of Gods
36 – गृहहीन – बिना घर का / बेघर – Homeless
37 – उत्तराधिकार – विरासत – Inheritance
38 – अंश – हिस्सा – Portion / Part
39 – कंजर – एक घुमक्कड़ जाति – A nomadic tribe
40 – टट्टू – छोटा घोड़ा – Pony
41 – चतुर – चालाक – Clever / Shrewd
42 – वंचित – दूर रहना / महरूम – Deprived
43 – महत्त्वाकांक्षा – आगे बढ़ने की चाह – Ambition
44 – उन्नतीशील – प्रगतिशील – Progressive
45 – कुशलता – निपुणता / चालाकी – Proficiency / Skill
46 – संतुष्ट – तृप्त – Satisfied
47 – मृग मरीचिका – आँखों का भ्रम – Mirage / Illusion
48 – सुशिक्षित – अच्छे पढ़े-लिखे – Well-educated
49 – सज्जन – भले मानुष – Gentleman
50 – व्यर्थ – बेकार – Useless / Vain
51 – शुभचिंतक – हित चाहने वाला – Well-wisher
52 – दशाश्वमेध – काशी का एक प्रसिद्ध घाट – A famous Ghat in Kashi
53 – बजरा – बड़ी नाव – Barge / Large boat
54 – सुंदरी – खूबसूरत स्त्री – Beautiful woman
55 – असुविधा – परेशानी – Inconvenience
56 – चाँदनी – चंद्रमा का प्रकाश – Moonlight
57 – पैड़ी – नाव पर चढ़ने की सीढ़ी – Gangplank / Stepping board
58 – सुरभित – सुगंधित – Fragrant
59 – निःश्वास – छोड़ी गई साँस – Exhalation
60 – अनुभूति – महसूस करना – Perception / Feeling
61 – आकाशदीप – ऊँचे बाँस पर टँगा दीया – Sky-lamp
62 – अनंत – जिसका अंत न हो – Infinite
63 – उच्छ्वसित – भावुक होकर गहरी साँस लेना – Sighing deeply
64 – चेतना – होश / सक्रियता – Consciousness
65 – असीम – जिसकी सीमा न हो – Boundless
66 – विक्षिप्त – मानसिक रूप से बीमार – Deranged / Insane
67 – विमुख – मुँह फेर लेना – Averse / Distant
68 – मानसिक विप्लव – मन की उथल-पुथल – Mental turmoil
69 – अकपट – बिना छल-कपट का – Sincere / Candid
70 – तीव्र – तेज़ – Intense / Rapid
71 – सत्य की छलना – सच को धोखा बनाना – Deception of truth
72 – निश्चेष्ट – जड़ / बिना हलचल का – Motionless
73 – मनोविकार – मन की बीमारी / विकार – Mental disorder
74 – षड्यंत्र – साजिश – Conspiracy
75 – प्रबंधक – इंतज़ाम करने वाला – Manager / Trustee
76 – संखिया – एक प्रकार का ज़हर – Arsenic / Poison
77 – अपमान – बेइज्जती – Insult
78 – क्षुब्ध – व्याकुल / परेशान – Agitated
79 – संकोच – झिझक – Shyness / Hesitation
80 – ऊभ-चूभ – डूबा हुआ या फँसा हुआ – Engrossed / Overwhelmed
81 – दीनता – बेचारगी – Humility / Helplessness
82 – नक्षत्र – तारे – Constellation / Stars
83 – आश्रय – सहारा – Shelter / Refuge
84 – लज्जा – शर्म – Shame / Modesty
85 – दुर्वह – जिसे ढोना कठिन हो – Unbearable burden
86 – सन्देहभार – शक का बोझ – Burden of doubt
87 – उपहास – मज़ाक – Ridicule / Mockery
88 – व्यंग्य – ताना – Sarcasm
89 – धृष्टता – ढिठाई / गुस्ताखी – Audacity / Impudence
90 – विपत्ति – मुसीबत – Calamity / Trouble
91 – अवाक् – चुप / निशब्द – Speechless
92 – रहस्य – गुप्त बात – Mystery / Secret
93 – व्यवसाय – धंधा – Business / Trade
94 – दुश्चरित्रा – खराब चरित्र वाली – Of bad character
95 – विनोद – मनोरंजन – Amusement / Fun
96 – हत्बुद्धि – जिसकी बुद्धि चकरा जाए – Bewildered
97 – संरक्षता – देखरेख / हिफाज़त – Guardianship / Protection
98 – भ्रम – गलतफहमी – Delusion / Illusion
99 – मन्दिर – देवालय – Temple
100 – अभागा – जिसका भाग्य बुरा हो – Ill-fated / Unlucky
संक्षिप्त प्रश्न
(i) ‘मैं चतुर था, इतना चतुर जितना मनुष्य को न होना चाहिए, क्योंकि मुझे विश्वास हो गया है कि मनुष्य अधिक चतुर बनकर अपने को अभागा बना लेता है और भगवान की दया से वंचित हो जाता है। (क) वक्ता एवं श्रोता कौन हैं? उसने श्रोता से अपने मन की बात किस प्रकार बताई?
उत्तर- इस कथन का वक्ता रामनिहाल है और श्रोता श्यामा है। रामनिहाल ने अपनी मानसिक उलझन और अतीत की व्यथा को श्यामा के सामने अत्यंत भावुक होकर और आँखों में आँसू भरकर प्रकट किया। उसने श्यामा को अपना शुभचिंतक और रक्षक मानते हुए अपने जीवन के उस भार को हल्का करने के लिए सारी बातें विस्तार से बताईं।
(ख) अपनी महत्त्वाकांक्षा तथा उन्नतिशील विचारों के बारे में वक्ता ने क्या कहा?
उत्तर- वक्ता अर्थात् रामनिहाल ने कहा कि उसकी महत्त्वाकांक्षा और उन्नतिशील विचार उसे जीवन भर लक्ष्यहीन रूप से दौड़ाते रहे। वह अपनी चतुराई और कुशलता से भाग्य को धोखा देता रहा। उसे लगता था कि वह एक दिन अपने पर विजयी होकर चैन से बैठ जाएगा, किंतु वह सब एक ‘मृग मरीचिका’ (illusion) साबित हुआ।
(ग) वक्ता ने श्रोता से किस घटना का उल्लेख किया?
उत्तर- वक्ता ने श्यामा से उस घटना का उल्लेख किया जब वह ब्रजकिशोर बाबू के कहने पर मोहन बाबू और मनोरमा को कार्तिक की पूर्णिमा की रात गंगा की सैर कराने ले गया था। उस यात्रा के दौरान उसने मोहन बाबू की मानसिक अस्थिरता, मनोरमा की लाचारी और उस युगल के बीच के तनावपूर्ण संबंधों को करीब से देखा था।
(घ) क्या आप वक्ता के उपर्युक्त कथन से सहमत हैं? कारण सहित बताइए।
उत्तर- हाँ, मैं वक्ता के कथन से सहमत हूँ। अत्यधिक चतुराई अक्सर मनुष्य को अहंकारी बना देती है, जिससे वह दूसरों की सरल भावनाओं और ईश्वर की कृपा को नहीं समझ पाता। रामनिहाल ने भी अपनी चतुराई के कारण मनोरमा की ‘सहायता की पुकार’ को ‘प्रेम’ समझ लिया, जिससे वह अंततः अभागा और भ्रमित महसूस करने लगा।
(ii) भगवान जाने इसमें क्या रहस्य है? किंतु संसार तो दूसरे को मूर्ख बनाने के व्यवसाय पर चल रहा है।
(क) रामनिहाल को ब्रजकिशोर बाबू और मोहनलाल के संबंध में किस विशेष बात का पता चला?
उत्तर- रामनिहाल को यह पता चला कि ब्रजकिशोर बाबू एक गहरी चाल चल रहे हैं। वे अदालत के माध्यम से अपने ही संबंधी मोहनलाल को ‘पागल’ घोषित करवाना चाहते हैं ताकि वे उनकी अपार संपत्ति के प्रबंधक अर्थात् कानूनी संरक्षक बन सकें और पूरी जायदाद को अपने नियंत्रण में ले सकें।
(ख) भगवान जाने इसमें क्या रहस्य है? रामनिहाल ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर- रामनिहाल ने ऐसा कहा क्योंकि उसे रिश्तों के बीच चल रहे धोखे और षड्यंत्र की गहराई समझ नहीं आ रही थी। उसे इस बात पर आश्चर्य और दुख था कि स्वार्थ के लिए लोग अपनों को ही मूर्ख बनाने या तबाह करने के लिए किस हद तक गिर सकते हैं।
(ग) मनोरमा ने रामनिहाल को पत्र क्यों लिखे थे? उन पत्रों को लेकर रामनिहाल को क्या संदेह होने लगा था?
उत्तर- मनोरमा ने रामनिहाल को अपनी विपत्ति में सहायता के लिए और ब्रजकिशोर की चालाकियों से बचने के लिए पत्र लिखे थे। किंतु रामनिहाल को यह संदेह अर्थात् भ्रम होने लगा था कि मनोरमा उससे प्रेम करती है और शायद इसीलिए उसे बार-बार बुला रही है।
(घ) रामनिहाल के हाथ में किसका चित्र था? चित्र को देखकर श्यामा ने रामनिहाल से क्या कहा?
उत्तर- रामनिहाल के हाथ में स्वयं श्यामा का चित्र था। चित्र देखकर श्यामा ने उसे फटकारते हुए कहा कि वह उससे प्रेम करने का लड़कपन न करे। श्यामा ने उसे वास्तविकता का आईना दिखाते हुए कहा कि यह सब उसका भ्रम है और उसे तुरंत पटना जाकर मनोरमा की सहायता करनी चाहिए।

