ICSE, Class, IX and X, Sahitya Sagar, Chapter – Vinay Ke Pad, Tulsidas, विनय के पद, तुलसीदास

तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास जी भक्तिकाल की सगुण धारा के मुख्य प्रर्वत्तक माने जाते हैं। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर नामक गाँव में सन् 1532 में हुआ था।

गुरु नरहरिदास इनके गुरु थे, जिन्होंने इन्हें वेद, पुराण तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन करवाया। इनकी मृत्यु सन् 1623 में हुई।

तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे। संवत् 1631 में इन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना प्रारंभ की। इसके अतिरिक्त ‘दोहावली’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’, ‘विनयपत्रिका’, ‘जानकी मंगल’, ‘पार्वती मंगल’, ‘वैराग्य संदीपनी’, ’बरवै रामायण’, ‘हनुमान बाहुक’ आदि इनके प्रमुख ग्रंथ हैं।

तुलसीदास जी की भाषा ब्रज और अवधी दोनों ही हैं। ‘रामचरितमानस’ इनका सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। इसकी गिनती विश्व के प्रमुख ग्रंथों में की जाती है। इस ग्रंथ में भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन तथा भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

विनय के पद

ऐसो को उदार जग माहीं।

बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस’ कोउ नाहीं॥  

जो गति जोग विराग’ जतन करि नहिं पावन मुनि ज्ञानी।

सो गति देत गीध सबरी कहूँ प्रभु न बहुत जिय जानी॥

जो सम्पत्ति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्ही।

सो सम्पदा-विभीषण कहँ अति सकुच सहित प्रभु दीन्ही॥

तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो।

तौ भजु राम, काम सब पूरन कर कृपानिधि तेरो॥1॥

जाके प्रिय न राम वैदेही।

तजिए ताहि कोटि वैरी सम जपि परम सनेही॥

तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी।

बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितह्नि, भए-मुद मंगलकारी॥

नाते नेह राम के मनियत, सुहुद सुसेव्य जहाँ लौं।

अंजन कहा आँख जेहि फूटै, बहु तक कहाँ कहाँ लौं॥

तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो।

जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥2॥

तुलसीदास

 

विनय के पद – सप्रसंग व्याख्या

01

ऐसो को उदार जग माहीं।

बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस‘ कोउ नाहीं॥  

जो गति जोग विराग‘ जतन करि नहिं पावन मुनि ज्ञानी।

सो गति देत गीध सबरी कहूँ प्रभु न बहुत जिय जानी॥

जो सम्पत्ति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्ही।

सो सम्पदा-विभीषण कहँ अति सकुच सहित प्रभु दीन्ही॥

तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो।

तौ भजु राम, काम सब पूरन कर कृपानिधि तेरो॥1॥

संदर्भ –

प्रस्तुत पद भक्तशिरोमणि तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘विनय पत्रिका’ से उद्धृत है।

प्रसंग –

इस पद में तुलसीदास जी भगवान राम की असीम उदारता और दयालुता का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि राम जैसा कोई दूसरा दानी और कृपालु इस संसार में नहीं है।

व्याख्या –

तुलसीदास जी कहते हैं कि इस संसार में श्रीराम के समान उदार और कोई नहीं है। वे ऐसे प्रभु हैं जो बिना किसी सेवा या स्वार्थ के दीन-दुखियों पर द्रवित हो जाते हैं। जिस परम गति अर्थात् मोक्ष को बड़े-बड़े ज्ञानी और मुनि योग, वैराग्य और कठिन यत्न करके भी प्राप्त नहीं कर पाते, वही श्रेष्ठ गति प्रभु राम ने गीध अर्थात् जटायु और शबरी को बिना किसी संकोच के दे दी।

इतना ही नहीं, जिस लंका की अपार संपत्ति को रावण ने अपने दस सिरों का बलिदान देकर शिव जी से प्राप्त किया था, उसी संपत्ति को श्रीराम ने संकोच के साथ कि यह बहुत कम है, विभीषण को सौंप दिया। तुलसीदास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं— “हे मेरे मन! यदि तू सब प्रकार के सुखों की अभिलाषा रखता है, तो श्रीराम का भजन कर। वे कृपानिधि तेरे सभी मनोरथों को पूर्ण कर देंगे।”

कठिन शब्दार्थ –

सरिस – समान (Like/Equal)

द्रवै – पिघलना या दया करना (To melt with pity)

जोग विराग – योग और वैराग्य (Yoga and Renunciation)

गीध-सबरी – जटायु और शबरी (Characters from Ramayana)

दस सीस – रावण (Ten heads)

सकुच – संकोच (Hesitation)

भजु – भजन करना (To worship)

 

02

जाके प्रिय न राम वैदेही।

तजिए ताहि कोटि वैरी सम जपि परम सनेही॥

तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी।

बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितह्नि, भए-मुद मंगलकारी॥

नाते नेह राम के मनियत, सुहुद सुसेव्य जहाँ लौं।

अंजन कहा आख जेहि फूटै, बहु तक कहाँ कहाँ लौं॥

तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो।

जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥2॥

संदर्भ –

प्रस्तुत पद भक्तशिरोमणि तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘विनय पत्रिका’ से उद्धृत है।

प्रसंग –

इस पद में तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति राम और सीता से प्रेम नहीं करता, वह त्यागने योग्य है, चाहे वह हमारा कितना ही सगा क्यों न हो।

व्याख्या –

तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन्हें श्रीराम और जानकी प्रिय नहीं हैं, उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान मानकर त्याग देना चाहिए, भले ही वे हमारे परम स्नेही क्यों न हों। इसके पक्ष में वे ऐतिहासिक उदाहरण देते हैं – भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकश्यप को त्याग दिया, विभीषण ने अपने भाई रावण को, भरत ने अपनी माता कैकेयी को, राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य को और ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों को त्याग दिया। इन सबने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनके संबंधी राम-भक्ति के मार्ग में बाधक थे, और अंततः इनका यह त्याग उनके लिए मंगलकारी सिद्ध हुआ।

तुलसीदास जी का मानना है कि संसार के सभी नाते और मित्रता श्रीराम के प्रेम के आधार पर ही मानी जानी चाहिए। वे कहते हैं कि “उस काजल अर्थात् अंजन को लगाने से क्या लाभ जिससे आँखें ही फूट जाएँ?” अर्थात् उस स्नेह का क्या अर्थ जो ईश्वर से दूर कर दे। अंत में तुलसीदास जी अपना मत व्यक्त करते हैं कि वही हमारा परम हितैषी, पूज्य और प्राणों से प्यारा है, जिसकी संगति से श्री राम के चरणों में प्रेम उत्पन्न हो।

कठिन शब्दार्थ –

वैदेही – माता सीता (Sita)

तजिए – त्याग देना (To abandon/quit)

कोटि – करोड़ों (Millions)

वैरी – शत्रु (Enemy)

महतारी – माता (Mother)

कंत – पति (Husband)

सुहुद – मित्र (Friend)

अंजन – काजल (Collyrium/Kohl)

मतो – विचार/मत (Opinion)

पदों पर आधारित प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-

(i) ऐसो को उदार जग माहीं।

बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस कोऊ नाहिं॥  

जो गति जोग विराग जतन करि नहिं पावत मुनि ज्ञानी॥  

सो गति देत गीध सबरी कहुँ प्रभु न बहुत जिय जानी।

जो संपत्ति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं।

सो संपदा -विभीषन कहँ अति सकुच सहित प्रभु दीन्ही॥

तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो।

तौ भजु राम, काम सब पूरन करै कृपानिधि तेरो॥  

(क) ‘ऐसो को उदार जग माहीं’ पंक्ति के आधार पर किसकी उदारता की बात की जा रही है? उनकी उदारता की क्या विशेषताएँ हैं?

उत्तर- इस पंक्ति में भगवान श्री राम की उदारता की बात की जा रही है। उनकी उदारता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बिना किसी सेवा या स्वार्थ के केवल दीनता देखकर ही दया करते हैं। वे इतने बड़े दानी हैं कि जो संपदा रावण को कठिन तपस्या से मिली, उसे उन्होंने विभीषण को बहुत संकोच के साथ दिया।

(ख) ‘गीध’ और ‘सबरी’ कौन थे? राम ने उन्हें कब, कौन-सी गति प्रदान की?

उत्तर- ‘गीध’ जटायु एक पक्षिराज थे जिन्होंने सीता माता की रक्षा के लिए प्राण दिए, और ‘सबरी’ एक वनवासी भीलनी थी जो राम की अनन्य भक्त थी। श्री राम ने उन्हें उनके प्रेम और भक्ति के बदले वह परम गति (मोक्ष) प्रदान की, जिसे बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी वर्षों के योग-वैराग्य से भी प्राप्त नहीं कर पाते।

(ग) रावण ने कौन-सी संपत्ति किससे तथा किस प्रकार प्राप्त की थी? वह संपत्ति विभीषण को देते समय राम के हृदय में कौन-सा भाव था

उत्तर- रावण ने लंका की अपार स्वर्ण संपत्ति भगवान शिव को अपने दस सिरों का दान करके प्राप्त की थी। उसी संपत्ति को जब राम ने विभीषण को सौंपा, तो उनके हृदय में संकोच का भाव था; उन्हें लग रहा था कि वे विभीषण की भक्ति के बदले उन्हें बहुत कम दे रहे हैं।

(घ) तुलसीदास जी सब प्रकार के सुख प्राप्त करने के लिए किसका भजन करने को कह रहे हैं और क्यों

उत्तर- तुलसीदास जी अपने मन को श्रीराम का भजन करने को कह रहे हैं। वे ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि राम ‘कृपानिधि’ अर्थात् दया के सागर हैं और वे भक्त के सभी कार्यों को पूरा करने वाले तथा लौकिक एवं पारलौकिक सभी सुख प्रदान करने वाले हैं।

 

(ii) जाके प्रिय न राम वैदेही।

तजिए ताहि कोटि वैरी सम जदपि परम सनेही॥  

तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषण बंधु, भरत महतारी।

बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितह्नि, भए-मुद मंगलकारी॥  

नाते नेह राम के मनियत, सुहृद, सुसेव्य जहाँ लौं।

अंजन कहा आँख जेही फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौं॥  

तुलसी सो सब भाँति परमहित, पूज्य प्रान ते प्यारो।

जासों होय सनेह राम-पद, ऐतो मतो हमारो॥  

(क) तुलसीदास किन्हें तथा क्यों त्यागने को कह रहे हैं?

उत्तर- तुलसीदास जी उन व्यक्तियों को त्यागने के लिए कह रहे हैं जिन्हें राम और सीता प्रिय नहीं हैं। उन्हें त्यागने का कारण यह है कि ईश्वर से विमुख व्यक्ति भले ही हमारा कितना ही सगा क्यों न हो, वह शत्रु के समान होता है और हमें भक्ति के मार्ग से भटका देता है।

(ख) उपर्युक्त पद के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि किस-किसने अपने किस-किस प्रियजन को क्यों छोड़ दिया?

उत्तर- भक्ति के मार्ग में बाधक होने के कारण निम्नलिखित महापुरुषों ने अपने प्रियजनों को छोड़ा –

प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकश्यप को।

विभीषण ने अपने भाई रावण को।

भरत ने अपनी माता कैकेयी को।

राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य को।

ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों को।

(ग) ‘अंजन कहा आँख जेहि फूटै’- पंक्ति द्वारा तुलसीदास क्या सिद्ध करना चाहते हैं?

उत्तर- इस पंक्ति के माध्यम से तुलसीदास जी यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उस काजल को लगाने से क्या लाभ जिससे आँखें ही फूट जाएँ। अर्थात् उस व्यक्ति या नाते से प्रेम करने का कोई अर्थ नहीं है जो हमें परमात्मा से दूर कर दे या हमारी आध्यात्मिक दृष्टि को नष्ट कर दे।

(घ) बलि के गुरु कौन थे? बलि ने अपने गुरु का परित्याग कब तथा क्यों कर दिया?

उत्तर- राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य थे। जब भगवान विष्णु ‘वामन’ अवतार लेकर बलि के द्वार पर तीन पग भूमि माँगने आए, तब शुक्राचार्य ने बलि को दान देने से मना किया। बलि ने प्रभु भक्ति और अपने वचन का पालन करने के लिए गुरु की आज्ञा का उल्लंघन कर उनका परित्याग कर दिया।

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