भावना सम्मान की जब,
खुद के प्रति जागती है,
तब ही मनुज के कर्म में,
निरंतर शुचिता ताकती है।
भान उसको हो यह जाता,
क्या हैं उसके जीवन उद्देश्य,
समर्थ करता है वह खुद को,
अपने कर्म और पौरुष बल से,
पूजती संसार है उसको,
करबद्ध अंत:करण के तल से।
कितनी सरल-सी बात है यह,
वंचित अनगिनत है इस तथ्य से,
अमरता का आधार स्तम्भ यह,
उफ! अपरिचित इस मुक्त रहस्य से।
सुनो पाठकों सुनो श्रोताओं,
भटकने के भरमार खड़े हैं,
ध्यान करो तुम केवल इतना,
बीज सफलता के अंतर्मन में पड़े हैं।
अविनाश रंजन गुप्ता

