“वे मेरे बड़े भैया हैं!”, एक सुंदर और प्यारी-सी युवती कैमरामेन और सुरक्षाबलों से यह कहते हुए मंच तक पहुँचने का प्रयास कर रही थी। ज्वाइंट सेक्रेटरी के विदाई समारोह में विशेष रूप से आमंत्रित सेक्शन ऑफ़िसर अविनाश ने जब उस युवती को देखा तो अपने पास आने दिया। उस युवती (बहन) को अपने पास बुलाने और उस युवती को अविनाश के पास आने में जितनी देर लगी उतने में ही आज का सम्मानित सेक्शन ऑफिसर अविनाश उन पलों में खो गया जब वह मामूली-सा फेरी वाला हुआ करता था। फेरी करने के लिए जिस थोक विक्रेता के पास से वह कपड़े खरीदता था वे और कोई नहीं बल्कि इस बहन के पिता हुआ करते थे। आज सालों बीत गए हैं इस बात को। पर संघर्ष के वो दिन आज भी अविनाश को याद है। उसे याद है कि मौसमों की मार झेलते हुए जब वह घर की आर्थिक स्थिति में सहारा बनने और अपनी पढ़ाई के खर्च का बंदोबस्त करने के लिए फेरी किया करता था तो समाज में उसकी कोई विशिष्ट पहचान नहीं थी। उसी दौरान वह प्यारी-सी बच्ची कई बार एक अनचाही मुसकान से उसका स्वागत करती थी। उस मुसकान में न ही स्नेह के दो शब्द हुआ करते थे और न ही बड़े भाई के प्रति श्रद्धा का भाव। दूर के रिश्ते भी व्यापारिक दृष्टिकोण से देखे जाने लगे थे। ऐसा इसलिए नहीं था कि वह प्यारी बच्ची दुनियादारी में निपुण हो गई थी बल्कि उसके पिता-माता हों या आज का धनाढ्य समाज अपने रुतबे और सामाजिक स्तर के प्रति ये वर्ग कुछ ज़्यादा ही जागरूक हो जाते हैं। उनके सामाजिक संबंध लाभ-हानि की कसौटी पर ही कसे जाते हैं। इसका प्रमाण तो अविनाश को उस वक्त मिल गया जब उसकी बहन की दसवीं की परीक्षा में अच्छे अंकों पर उसने उसे बधाई देनी चाही और उसके अपने किसी ने उसे यह कहकर अविनाश तक आने से रोक दिया कि ग्राहकों के साथ प्रोफेशनल ही रहा करो। अविनाश का अनचाहा समर्थन करते हुए और खुद बहन के संबंध से निर्लिप्त करते हुए उसने इतना ज़रूर कहा था कि दूर के रिश्ते में भाई लगेगा…लेकिन अभी एक ग्राहक ही है…..। उसके इस वाक्य से ही अविनाश की आँखों के कोरों में दो ओस की बूँदें भर आईं थीं। “भइया आप कैसे हैं!”, नम्र और अपनेपन के लहजे में कही गई उसके इस कथन से मेरी तंद्रा टूटी और मैं फिर से वर्तमान में आ गया। एक स्नेह भरी मुस्कान के साथ मैंने अपनी बहन का स्वागत किया और थोड़ी देर में फोटो सेसन के दौरान भी वह मेरे बगल में ही खड़ी थी।
विशेष – “इज्ज़त न रूप से आती है, न रंग से आती है।
इज्ज़त सिर्फ आपके पैसे और रुतबे के संग आती है।”
अविनाश रंजन गुप्ता

