न जाने कितनी चीज़ें हैं,
न जाने कितने अवसर,
जो छीन लेती है हमसे,
कीमती नियति अक्सर।
हे तनयद्वय! मेरे आत्मज!
अधिकार है मेरा केवल तुम पर,
सुनो, समझो और विचार करो,
क्यों आए हो तुम इस धरा पर?
कालों से काल-कवलित हुए हैं सब,
पर क्यों हुआ ऐसा, विचारणीय है अब।
संधान करो इस सत्य का,
विधि के इस गूढ़ रहस्य का।
निष्कर्ष तुम्हारा भी वही होगा,
जो सदा से मेरा रहा है,
“जो केवल खुद के लिए जीता है,
वह सचमुच मृत्यु को ही वरता है।”
यही जीवन की क्षणभंगुरता है।
यही मानव की विफलता है।
यही कर्मों की अनियमितता है।
यही समय की अपव्ययता है।
पाशविक प्रवृत्ति का जो,
पूर्ण त्याग कर पाता है,
वही मनुष्य कहलाने का,
सच्चा अधिकारी बन पाता है।
तब तुम्हारा जीवन तुम तक,
सीमित नहीं रह पाता है,
यही विचार तेरे सुख को,
सार्वजनिक करता जाता है।
तेरी विद्या, तेरा ज्ञान,
तेरे कर्म और तेरी ठान,
जब लोकहित में लग जाता है,
तभी मनुष्य इस मृत्युलोक में
अमरता का वर पा जाता है।
इसलिए यह चिर स्मरणीय है, जान लो
नाम नहीं कर्म बोलते हैं
कर्म नाम का मर्म खोलते हैं
विचार और कर्म ही सर्वोच्च है
स्वार्थ से ऊपर उठना ही
वास्तव में मोक्ष है।
अविनाश रंजन गुप्ता

