न्याय की कुर्सी
उज्जैन की प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी के बाहर एक लंबा-चौड़ा मैदान था। यहाँ-वहाँ टीले थे। एक दिन लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था। एक लड़का कूदता-भागता एक टीले पर चढ़ गया। अचानक वह ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसने इधर-उधर देखा कि किस चीज से ठोकर लगी है। उसको एक बड़े चिकने पत्थर के अलावा और कुछ नहीं दिखा। वह उठकर गया और अपने मित्रों को बुलाकर वह शिला दिखाई। फिर शान से उस पर बैठकर बोला, “यह सिंहासन है मेरा। मैं राजा हूँ और तुम सब मेरे दरबारी।
तुम अपनी-अपनी फरियाद लेकर आओ। फिर मैं उनका फैसला करूँगा।”
दूसरे लड़कों को यह खेल पसंद आया। वे एक-एक करके आते और कोई काल्पनिक फरियाद सुनाते। फिर गवाह बुलाए जाते। उनकी गवाही ली जाती। उसके बाद राजा बना हुआ लड़का उनसे सवाल करता और अपना फैसला सुनाता।
इस खेल में उनको इतना मजा आया कि वे रोज ही यह खेल खेलने लगे। शिकायतें सुनी जातीं, अपराधी पेश किए जाते, बयान लिए जाते, फिर शिला पर बैठा हुआ लड़का अपना फैसला सुनाता।
बात इधर-उधर फैलने लगी। लोग लड़के की न्याय बुद्धि की चर्चा करने लगे और कहने लगे कि अवश्य ही उस लड़के में कोई दैवी शक्ति है।
एक दिन दो किसानों के बीच जमीन को लेकर झगड़ा उठ खड़ा हुआ। मामला गंभीर था। टीलेवाले लड़के की इतनी चर्चा थी कि वे राजा के दरबार में जाने की बजाय उसी के पास गए और उसको अपने झगड़े के बारे में बताया। लड़के ने बड़ी गंभीरता से दोनों किसानों के बयान सुने। उसके बाद उसने जो फैसला दिया, उसे सुनकर वे दंग रह गए।
उस दिन के बाद से तो नगर के सभी लोग अपनी फरियाद लेकर यहीं आने लगे। राजा के दरबार में कोई न जाता। और ऐसा कभी नहीं हुआ कि लड़के के फैसले से उन्हें संतोष न हुआ हो।
धीरे-धीरे यह बात राजा के कानों तक पहुँची। उसको बहुत क्रोध आया। उसने गरजकर कहा, “उस छोकरे की यह मजाल कि अपने को मुझसे अच्छा न्यायकर्ता समझे? मैं इन किस्सों में विश्वास नहीं करता। मैं खुद जाकर देखूँगा।”
ऐसा कहकर राजा अपने लाव-लश्कर के साथ उस मैदान में पहुँचा जहाँ लड़के अपना प्रिय खेल खेल रहे थे। बड़ी देर तक राजा उनका खेल देखता रहा। वह स्तंभित रह गया। उसने अपने मंत्री से कहा, “लड़का सचमुच बहुत बुद्धिमान है ! इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धि का होना आश्चर्य की बात है। इसकी न्याय बुद्धि के आगे तो बड़े-बड़ों को लोहा मानना पड़ेगा।” उसी समय किसी ने राजा को बताया, “लेकिन महाराज, यह तो रोज वाला लड़का नहीं है। वह बीमार हो गया है, इस कारण कोई नया ही लड़का टीले पर बैठा है।”
“यह तो और भी आश्चर्य की बात है! हो न हो, पत्थर की इस कुर्सी में ही कोई चमत्कार है। मैं इसकी जाँच करूँगा।”
राजा का इशारा पाते ही उस स्थान को खोदकर पत्थर को बाहर निकाला गया। राजा ने देखा कि वह पत्थर नहीं, बहुत ही सुंदर सिंहासन था। उस पर बहुत बारीक और खूबसूरत मूर्तियाँ खुदी हुई थीं। उसके चारों पायों पर चार देवदूतों की मूर्तियाँ बनी हुई थीं। चारों ओर खबर फैल गई। बात ही बात में वहाँ अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई। विद्वान पंडितों ने बताया कि वह कोई ऐसा-वैसा सिंहासन नहीं था – सदियों पुराना, राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था। राजा विक्रमादित्य अपने न्याय और विवेक के लिए बहुत प्रसिद्ध थे।
राजा ने आज्ञा दी कि सिंहासन को ले जाकर राज दरबार में रख दिया जाए। “मैं इस पर बैठकर अपनी प्रजा की फरियाद सुनूँगा और उनका फैसला करूँगा,” उसने कहा।
अगले दिन राजा दरबार में आया और सीधे उस सिंहासन की ओर बढ़ा। वह उस पर बैठने ही वाला था कि किसी की आवाज सुनाई दी, “ठहरो!”
राजा ने रुककर चारों ओर देखा। कोई नजर नहीं आया। उसने फिर सिंहासन पर बैठना चाहा। फिर इसी प्रकार आवाज आई, “ठहरो!” इस बार राजा ने आश्चर्य से देखा कि सिंहासन के एक पाये पर बनी मूर्ति बोल रही है।
मूर्ति ने कहा, “क्या तुम इस सिंहासन पर बैठने योग्य हो? क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि तुमने कभी चोरी नहीं की है?”
राजा ने लज्जा से सर झुका लिया। “यह सच है कि हाल में ही मैंने अपने एक दरबारी की जमीन पर कब्जा कर लिया था क्योंकि मैं उससे नाराज हो गया था।”
“तब तो तुम इसके योग्य नहीं हो,” मूर्ति ने कहा। “तुमको तीन दिन तक प्रायश्चित करना होगा।” यह कहकर मूर्ति अपने पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई।
राजा ने तीन दिन तक उपवास किया और प्रार्थना की। चौथे दिन वह फिर दरबार में आया। ज्योंही सिंहासन पर बैठने लगा, दूसरी मूर्ति ने कहा, “ठहरो! तुम विश्वास के साथ कह सकते हो कि तुमने कभी झूठ नहीं बोला?”
राजा सकपकाया। झूठ तो उसने किसी न किसी मुसीबत से बचने के लिए कई बार बोला था। राजा पीछे हट गया। दूसरी मूर्ति भी पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई।
राजा ने तीन दिन तक फिर उपवास और पूजा-पाठ किया। तीसरी बार वह फिर सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ा। हिचकिचाते हुए वह आगे बढ़ा। बैठने ही वाला था कि तीसरी मूर्ति ने पूछा, “बैठने के पहले यह बताओ कि क्या तुमने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई है?”
राजा पीछे हट गया। तीसरी मूर्ति भी अपने पंख फैलाकर उड़ गई। फिर तीन दिन तक उपवास और प्रार्थना करने के बाद राजा सिंहासन की ओर बढ़ा। उसके पैर लड़खड़ा गए। चौथी मूर्ति ने कहा, “ठहरो! जो लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे, वे भोले-भाले थे। उनके मन में कलुष नहीं था। अगर तुमको विश्वास है कि तुम इस योग्य हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो।”
राजा बड़ी देर तक सोचता रहा। फिर उसने मन ही मन कहा, “अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है तो भला मैं क्यों नहीं बैठ सकता हूँ? मैं राजा हूँ। मुझसे ज्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान भला और कौन होगा? मैं अवश्य इस सिंहासन पर बैठने योग्य हूँ।”
यह कहकर राजा सिंहासन की ओर दृढ़ कदमों से बढ़ा। लेकिन उसी समय चौथी मूर्ति पंख फैलाकर सिंहासन समेत आकाश में उड़ गई।
– लीलावती भागवत
न्याय की कुर्सी – शब्दार्थ
Word (Hindi) | Meaning in Hindi | Meaning in English |
शिला | पत्थर की बड़ी चट्टान | Large rock / Stone slab |
फरियाद | शिकायत, प्रार्थना, न्याय की गुहार | Complaint / Appeal / Plea |
गवाह | वह व्यक्ति जो किसी घटना का चश्मदीद हो | Witness |
काल्पनिक | कल्पना की हुई, बनावटी, जो असली न हो | Imaginary / Fictional |
दैवी शक्ति | ईश्वरीय या अलौकिक शक्ति | Divine power / Supernatural power |
दंग रह गए | हैरान हो गए, चकित रह गए | Astonished / Surprised |
मजाल | हिम्मत, साहस | Audacity / Courage |
लाव-लश्कर | सेना, घोड़े, हाथी और सेवकों का दल | Entourage / Army with all its equipment |
स्तंभित | हैरान होकर जड़ हो जाना | Stunned / Dumbfounded |
लोहा मानना | श्रेष्ठता स्वीकार करना, हार मान लेना | To acknowledge someone’s superiority |
सकपकाया | घबराया, झेंपा हुआ | Taken aback / Startled |
कलुष | पाप, दोष, मन का मैल | Sin / Impurity / Malice |
प्रायश्चित | गलती सुधारने के लिए किया गया पछतावा या दंड | Atonement / Penance |
विवेक | सही और गलत को पहचानने की समझ | Wisdom / Discretion |
न्याय की कुर्सी – महत्त्वपूर्ण सीख
सच्चा न्याय पवित्र मन से होता है – न्याय करने के लिए केवल पद (कुर्सी) या शक्ति होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्ति का मन पवित्र, निश्छल और बुराइयों से मुक्त होना चाहिए। बच्चे इसी पवित्रता का प्रतीक हैं।
अहंकार पतन का कारण है – राजा को अपने पद, धन, शक्ति और बुद्धि का अहंकार था, इसलिए वह कभी भी राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने के योग्य नहीं बन सका।
स्वयं का मूल्यांकन आवश्यक है – दूसरों पर शासन करने या न्याय करने से पहले व्यक्ति को खुद की कमियों (जैसे- चोरी, झूठ, ईर्ष्या) को पहचानना और उन्हें सुधारना चाहिए।
प्रायश्चित और सुधार – यदि मनुष्य से कोई गलती, जैसे – चोरी, झूठ, अन्याय हो जाए, तो उसे सच्चे मन से उसका प्रायश्चित करना चाहिए। लेकिन राजा का प्रायश्चित दिखावटी था क्योंकि उसका अहंकार खत्म नहीं हुआ था।
सच्चाई कभी छिपती नहीं – भले ही कोई व्यक्ति बाहरी रूप से कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, लेकिन उसकी आंतरिक कमियाँ कभी न कभी सामने आ ही जाती हैं।
बातचीत के लिए
- कहानी में बच्चे न्याय करने का खेल खेल रहे थे। आप कौन-कौन से खेल खेलते हैं और किनके साथ खेलते हैं?
उत्तर – मैं क्रिकेट, लुका-छिपी और कैरम-बोर्ड, शतरंज अपने दोस्तों और भाई-बहनों के साथ खेलता हूँ।
- आपके खेलों में भी किसी न्याय या निर्णय करने वाले की आवश्यकता होती होगी। क्या आपने भी किसी खेल में यह भूमिका निभाई है? अपने अनुभव को साझा कीजिए।
उत्तर – हाँ, क्रिकेट खेलते समय मैं कई बार अंपायर बना हूँ और आउट या नॉट आउट का सही फैसला लिया है।
- जब कोई आपसे सलाह माँगता है या झगड़ा सुलझाने को कहता है, तो आप कैसे निर्णय लेते हैं कि सही क्या है और गलत क्या है?
उत्तर – मैं दोनों पक्षों की बात शांति से सुनता हूँ, उपस्थित लोगों से उनके बयान लेता हूँ। सच्चाई जानने की कोशिश करता हूँ और इसके बाद बिना किसी भेदभाव के सही फैसला लेता हूँ।
- क्या आपके विद्यालय, परिवार या मोहल्ले में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे लोग उसकी समझदारी और न्यायप्रियता के लिए बहुत मानते हैं? वे किस तरह दूसरों की सहायता करते हैं?
उत्तर – हाँ, हमारे मोहल्ले के एक बुजुर्ग दादाजी बहुत समझदार हैं। वे लोगों की बातें ध्यान से सुनकर उनके झगड़े बहुत शांति और न्याय से सुलझा देते हैं।
- अगर आपको कहानी वाला यह सिंहासन मिल जाए, तो आप उसका उपयोग कैसे करेंगे?
उत्तर – अगर मुझे यह सिंहासन मिल जाए, तो मैं इसका उपयोग गरीबों और बेसहारा लोगों को सही न्याय दिलाने और उनकी मदद करने के लिए करूँगा ताकि न्यायालय व्यवस्था की लंबी प्रक्रिया में उनका बहुमूल्य समय बर्बाद न हो।
मेरी समझ से
नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे उपयुक्त उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (*) बनाइए।
- राजा सिंहासन पर क्यों नहीं बैठ पाया?
(क) सिंहासन की मूर्तियाँ आसमान में उड़ गई थीं।
(ख) सिंहासन की मूर्तियों ने उसे योग्य नहीं माना था।
(ग) राजा स्वयं को उस पर बैठने योग्य नहीं मानता था।
(घ) राजा ने मूर्तियों की शर्तें पूरी करने से मना कर दिया।
उत्तर – (ख) सिंहासन की मूर्तियों ने उसे योग्य नहीं माना था।*
- लड़के के न्याय करने के तरीके से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
(क) वह अपराधी को कठोर दंड देता था।
(ख) वह किसी का पक्ष नहीं लेता था।
(ग) वह न्याय करने को खेल समझता था।
(घ) वह राजा के आदेशों का पालन करता था।
उत्तर – (ख) वह किसी का पक्ष नहीं लेता था।*
- “बात इधर-उधर फैलने लगी”—यहाँ ‘बात’ का क्या अर्थ है?
(क) लड़कों के अनोखे खेल की चर्चा
(ख) लड़के के बीमार पड़ने की चर्चा
(ग) लड़के की न्याय- बुद्धि की चर्चा
(घ) टीले पर मिले पत्थर की चर्चा
उत्तर – (ग) लड़के की न्याय- बुद्धि की चर्चा*
- “राजा सिंहासन की ओर दृढ़ कदमों से बढ़ा।” कहानी के अंत में राजा चौथी मूर्ति की बात अनसुनी करके सिंहासन पर बैठने के लिए आगे क्यों बढ़ा?
(क) वह स्वयं को सिंहासन पर बैठने योग्य मानता था।
(ख) वह सिंहासन के जादू को परखना चाहता था।
(ग) वह मूर्तियों के बार-बार टोकने से ऊब गया था।
(घ) उसे मूर्तियों की बातों पर भरोसा नहीं रह गया था।
उत्तर – (क) वह स्वयं को सिंहासन पर बैठने योग्य मानता था।*
- कहानी के अनुसार न्याय के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है?
(क) टीले पर बच्चों का खेल
(ख) विक्रमादित्य का सिंहासन
(ग) सच्चाई और पवित्र मन
(घ) योग्य शक्तिशाली राजा
उत्तर – (ग) सच्चाई और पवित्र मन*
सोचिए और लिखिए
- कहानी में बच्चों का प्रिय खेल क्या था? यह खेल लोगों के बीच प्रसिद्ध क्यों हो गया?
उत्तर – बच्चों का प्रिय खेल राजा और दरबारी बनकर ‘न्याय करना’ था। राजा बने बच्चे लड़के के एकदम सही, निष्पक्ष और समझदारी भरे फैसलों के कारण यह खेल प्रसिद्ध हो गया।
- लड़के और राजा में से कौन अच्छा न्याय करता था? आपको ऐसा क्यों लगता है?
उत्तर – लड़का अच्छा न्याय करता था क्योंकि बच्चे का मन निश्छल, पवित्र और भेदभाव से रहित था, जबकि राजा के मन में लालच और अहंकार भरा था।
- चौथी मूर्ति सिंहासन के साथ आकाश में क्यों उड़ गई?
उत्तर – चौथी मूर्ति सिंहासन के साथ आकाश में उड़ गई क्योंकि चौथी बार भी राजा का अहंकार खत्म नहीं हुआ था। वह अपने धन, बल और बुद्धि के घमंड में सिंहासन पर बैठना चाहता था, जबकि वह कुर्सी केवल पवित्र मन वालों के लिए थी।
- इस कहानी में दो राजाओं के संबंध में बताया गया है। इन दोनों राजाओं में कौन-कौन से अंतर थे?
उत्तर – राजा विक्रमादित्य न्यायप्रिय, बुद्धिमान और पवित्र मन के थे। इसके विपरीत, वर्तमान राजा अहंकारी, लालची और झूठा था।
- राजा को जब लड़के के न्याय के बारे में पता चला तो उसे क्रोध क्यों आया?
उत्तर – राजा को लगा कि एक साधारण-सा लड़का खुद को उससे भी अच्छा न्यायकर्ता कैसे समझ सकता है! इससे राजा के अहंकार को ठेस पहुँची।
- मूर्तियों ने राजा को बार-बार सिंहासन पर बैठने से क्यों रोका?
उत्तर – मूर्तियों ने राजा को बार-बार सिंहासन पर बैठने से रोका क्योंकि राजा ने चोरी की थी, झूठ बोला था, दूसरों को चोट पहुँचाई थी और उसके मन में घमंड भरा था। इसलिए वह उस पवित्र सिंहासन के योग्य नहीं था।
भाषा की ओर
आपके शब्द
- नीचे दिए गए रेखांकित शब्दों को आपकी भाषा में क्या कहते हैं? लिखिए-
पाठ से शब्द आपकी भाषा में शब्द इसके लिए कोई अन्य शब्द
मैं राजा हूँ और तुम सब मेरे दरबारी। नरेश महीप
उसको बहुत क्रोध आया। गुस्सा आक्रोश
तुमने कभी झूठ नहीं बोला? मिथ्या असत्य
अवश्य ही उस लड़के में कोई दैवी शक्ति है। ताकत बल
अपने मित्रों को बुलाकर वह शिला दिखाई। पत्थर प्रस्तर
काल
- नीचे दिए गए वाक्यों के काल पहचानिए। उनका काल बदलकर लिखिए-
लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था। (भूतकाल)
लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा है। (वर्तमान काल)
लड़कों का एक झुंड वहाँ खेलेगा। (भविष्यत् काल)
(क) वे रोज ही यह खेल खेलने लगे। (भूतकाल)
वे रोज ही यह खेल खेलते हैं।(वर्तमान काल)
वे रोज ही यह खेल खेलेंगे। (भविष्यत् काल)
(ख) मैं खुद जाकर देखूँगा। (भविष्यत् काल)
मैं खुद जाकर देखता हूँ।(वर्तमान काल)
मैंने खुद जाकर देखा था।(भूतकाल)
फिर से लिखें वाक्य
- (क) नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित शब्दों का लिंग बदलकर वाक्य पुनः लिखिए। वाक्य में अन्य आवश्यक परिवर्तन भी कीजिए।
लड़कों को यह खेल पसंद आया।
लड़कियों को यह खेल पसंद आया।
एक लड़का कूदता-भागता एक टीले पर चढ़ गया।
→ एक लड़की कूदती-भागती एक टीले पर चढ़ गई।
राजा पीछे हट गया।
→ रानी पीछे हट गई।
राजा सिंहासन की ओर दृढ़ कदमों से बढ़ा।
→ रानी सिंहासन की ओर दृढ़ कदमों से बढ़ी।
(ख) कहानी के निम्नलिखित भाग को इस प्रकार लिखिए जिसमें सभी पात्र स्त्रीलिंग में हों-
एक दिन लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था। एक लड़का कूदता-भागता एक टीले पर चढ़ गया। वह ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसको एक बड़े चिकने पत्थर के अलावा और कुछ नहीं दिखा। वह उठकर गया और अपने मित्रों को बुलाकर वह शिला दिखाई।
“एक दिन लड़कियों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था। एक लड़की कूदती-भागती एक टीले पर चढ़ गई। वह ठोकर खाकर गिर पड़ी। उसको एक बड़े चिकने पत्थर के अलावा और कुछ नहीं दिखा। वह उठकर गई और अपनी सहेलियों को बुलाकर वह शिला दिखाई।”
विराम चिह्न
- नीचे दिए गए वाक्यों में उचित स्थानों पर विराम चिह्न लगाइए-
चौथी मूर्ति ने कहा ठहरो जो लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे वे भोले-भाले थे उनके मन में कलुष नहीं था अगर तुमको विश्वास है कि तुम इस योग्य हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो
चौथी मूर्ति ने कहा, “ठहरो! जो लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे, वे भोले-भाले थे। उनके मन में कलुष नहीं था। अगर तुमको विश्वास है कि तुम इस योग्य हो, तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो।”
राजा बड़ी देर तक सोचता रहा फिर उसने मन ही मन कहा अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है तो भला मैं क्यों नहीं बैठ सकता हूँ मैं राजा हूँ मुझसे ज्यादा धनवान बलवान और बुद्धिमान भला और कौन होगा मैं अवश्य इस सिंहासन पर बैठने योग्य हूँ
राजा बड़ी देर तक सोचता रहा। फिर उसने मन ही मन कहा, “अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है, तो भला मैं क्यों नहीं बैठ सकता हूँ? मैं राजा हूँ। मुझसे ज्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान भला और कौन होगा? मैं अवश्य इस सिंहासन पर बैठने योग्य हूँ।”
- कल्पना कीजिए कि कहानी का लड़का आपसे बातचीत कर रहा है। उसकी और अपनी बातचीत को नीचे दिए गए विराम-चिह्नों का उपयोग करते हुए लिखिए-
“” , । ! ?
लड़का – “आपका नाम क्या है?”
मैं – “मेरा नाम रोहन है!”
लड़का – “रोहन, तुम यहाँ इस मैदान में क्या कर रहे हो?”
मैं – “मैं यहाँ तुम्हारा खेल देखने आया हूँ।”
लड़का – “क्या तुम्हें मेरा न्याय करना अच्छा लगता है?”
मैं – “हाँ, तुम बिल्कुल सच्चा और सही न्याय करते हो।”
लड़का – “अरे! यह तो उस जादुई पत्थर का कमाल है।”
मैं – “सच में, यह बहुत ही अद्भुत बात है!”
लड़का – “अच्छा, क्या तुम भी अब हमारे साथ खेलोगे?”
विशेषता बताने वाले शब्द
“उसको एक बड़े चिकने पत्थर के अलावा और कुछ नहीं दिखा।”
इस वाक्य में ‘बड़े’ और चिकने’ शब्द ‘पत्थर’ शब्द की विशेषता बता रहे हैं। आप जानते ही होंगे कि संज्ञा शब्दों की विशेषता बताने वाले ऐसे शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं।
- (क) नीचे दिए गए वाक्यों में नए-नए विशेषण जोड़कर वाक्यों को बढ़ाइए-
उसको विशाल मैदान में एक बड़े चिकने पत्थर के अलावा और कुछ नहीं दिखा।
उसी समय चौथी सुंदर मूर्ति पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई।
भोले-भाले समझदार लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे।
घमंडी राजा सकपकाया।
(ख) कहानी में आए व्यक्तियों / वस्तुओं के लिए उपयुक्त विशेषण शब्द लिखिए—
न्यायपूर्ण सिंहासन
अहंकारी राजा
बोलने वाली मूर्तियाँ
समझदार लड़का
बुद्धिमान मंत्री
कहानी से मुहावरे
- कहानी में आए निम्नलिखित मुहावरों को पहचानिए। उनके अर्थ समझिए और अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
ठोकर खाना – व्यापार में ठोकर खाने के बाद ही रमेश को अक्ल आई।
बात फैलना – गाँव में भालू आने की बात आग की तरह फैल गई।
झगड़ा खड़ा होना – ज़मीन के बँटवारे को लेकर दो भाइयों में झगड़ा खड़ा हो गया।
कानों तक पहुँचना – जब बेटे की चोरी की बात पिताजी के कानों तक पहुँची, तो वे बहुत दुखी हुए।
लोहा मानना – भारतीय सेना की बहादुरी का पूरी दुनिया लोहा मानती है।
खबर फैलना – स्कूल की छुट्टी होने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल गई।
सिर झुकाना – अपनी गलती पकड़े जाने पर नौकर ने शर्म से सिर झुका लिया।
नजर आना – घने कोहरे के कारण सड़क पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।
पाठ से आगे
अनुमान और कल्पना
- यदि आज के समय में ऐसा कोई सिंहासन मिल जाए तो क्या लोग उसे न्याय करने के लिए उपयोग करेंगे? क्यों या क्यों नहीं?
उत्तर – हाँ, लोग इसका उपयोग करना चाहेंगे क्योंकि आज के समाज में भी सच्चे और निष्पक्ष न्याय की बहुत आवश्यकता है।
- कल्पना कीजिए कि मूर्तियाँ राजा से प्रश्न पूछने के बजाय उसे सुझाव देतीं। वे उसे कौन-कौन से सुझाव देतीं?
उत्तर – मूर्तियाँ सुझाव देतीं— “हे राजन! अपना घमंड त्यागो, प्रजा की भलाई करो और जीवन में हमेशा सत्य और ईमानदारी का मार्ग अपनाओ।”
- यदि आप राजा होते तो मूर्तियों के प्रश्नों का क्या उत्तर देते?
उत्तर – मैं अपनी गलतियों को ईमानदारी से स्वीकार कर लेता और भविष्य में एक सच्चा और न्यायप्रिय इंसान बनने का वचन देता।
- कहानी के अंत में राजा सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ा। क्या राजा ने सही निर्णय लिया? वह और क्या-क्या कर सकता था? (संकेत- सिंहासन को वापस कर देना, भूमि में गाड़ देना, उसे खाली छोड़ देना, स्वयं को उसपर बैठने के योग्य बनाना आदि)
उत्तर – राजा का अंत में बैठने का निर्णय गलत था क्योंकि उसमें अहंकार था। उसे चाहिए था कि वह सिंहासन को वापस भूमि में गाड़ देता या उसे खाली छोड़कर स्वयं को उस पर बैठने के योग्य बनाने का प्रयास करता।
- कल्पना कीजिए कि नीचे दिए गए व्यक्तियों को राजा विक्रमादित्य का सिंहासन मिला है। सिंहासन की मूर्तियाँ इनसे कौन-कौन से प्रश्न पूछेंगी? उन प्रश्नों को लिखिए-
आप से – “क्या तुमने कभी स्कूल में झूठ बोला है या चोरी की है?”
माता-पिता से – “क्या आपने कभी अपने बच्चों के बीच कोई भेदभाव किया है?”
शिक्षक से – “क्या आपने कभी किसी कमजोर बच्चे का मजाक उड़ाया है?”
सृजन
- मान लीजिए कि इस कहानी के अंत में राजा सिंहासन पर बैठने में सफल हो जाता है। अब कहानी को आगे बढ़ाइए।
उत्तर – अगर राजा सिंहासन पर बैठ जाता, तो इसका अर्थ होता कि राजा का हृदय पूरी तरह शुद्ध हो चुका है। सिंहासन पर बैठते ही उसके भीतर राजा विक्रमादित्य जैसी अलौकिक न्याय-बुद्धि आ जाती। वह एक महान राजा बन जाता और उसके राज्य में कोई दुखी या गरीब नहीं रहता।
- कहानी में राजा ने मूर्तियों के सवालों के जवाब सच्चाई से दिए थे। अगर वह झूठ बोलता तो कहानी कैसे बदल जाती? अपने मन से इस बदली हुई कहानी को बढ़ाइए।
उत्तर – अगर राजा झूठ बोलकर बैठने की कोशिश करता, तो मूर्ति तुरंत क्रोधित हो जाती। शायद वह मूर्ति उसे आग की तरह भस्म कर देती या कोई कठोर दंड देकर उस सिंहासन को हमेशा के लिए अदृश्य कर देती।
परियोजना
(क) शांति-योजना- मान लीजिए कि आपको अपने स्कूल में किसी समस्या का हल निकालना है (उदाहरण के लिए अनुशासन से जुड़ी कोई बात या दो दोस्तों के बीच झगड़े/ विवाद सुलझाना)। अपने समूह में मिलकर उस समस्या पर सोच-विचार कीजिए। उसका समाधान कैसे किया जा सकता है, इसकी एक योजना बनाइए। उस योजना को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
शांति योजना – विवाद सुलझाने के लिए हम दोनों दोस्तों को आमने-सामने बैठाएँगे, उनकी बात सुनेंगे और गलती समझाकर दोनों से एक-दूसरे को ‘सॉरी’ बुलवाएँगे।
(ख) सुनो ध्यान से- आपने कहानी में पढ़ा कि राजा को पहले पुतलियों की आवाज सुनाई दी, इसके बाद उसका ध्यान उन पर गया। क्या आप अपने आस-पास की आवाजों पर ध्यान देते हैं? अपने आस-पास की आवाजों को ध्यान से सुनिए और उन वस्तुओं/प्राणियों की सूची बनाइए जिनकी आवाज आपको सुनाई दी। अपने साथियों की सूची से अपनी सूची की तुलना कीजिए।
सुनो ध्यान से – (आस-पास की आवाजें) – चिड़ियों की चहचहाहट, गाड़ियों के हॉर्न, हवा की सरसराहट, और पत्तों के हिलने की आवाज़।
आज की पहेली
(क) आज हम आपके लिए लाए हैं भारत के अलग-अलग राज्यों की पारंपरिक पहेलियाँ। तो आइए, बूझते हैं ये रंग-बिरंगी पहेलियाँ-
एक डिब्बी में बत्तीस बाबा → दाँत (Teeth)
एक थाल औंधा पड़ा… → रात का आसमान (Night’s Sky)
खाओ तो हड्डी नहीं, बोओ तो बीज नहीं → बर्फ / ओला (Ice)
एक घर में सात द्वार → इंसान का चेहरा (Face – 2 आँखें, 2 कान, 2 नाक के छेद, 1 मुँह)
बचपन में हरी रही, बड़ी हुई तो लाल… → मिर्च (Chili)
कौन-से फल में बीज नहीं? → केला (Banana)
गोबर का उपला, नदी पर तैरे → कछुआ (Turtle)
(ख) अपने राज्य में प्रचलित पहेलियाँ लिखिए और अपने साथियों से बूझिए।
छात्र इसे स्वयं करें।
खोजबीन
- ‘न्याय की कुर्सी कहानी हमारे देश की सैकड़ों साल पुरानी एक पुस्तक पर आधारित है। उस पुस्तक का नाम है सिंहासन बत्तीसी। इस पुस्तक में राजा भोज को राजा विक्रमादित्य का सिंहासन मिलता है जो भूमि में गड़ा था। इसमें बत्तीस मूर्तियाँ जड़ी होती हैं। प्रत्येक मूर्ति राजा भोज को राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाती है। इस पुस्तक की प्रत्येक कहानी बहुत रोचक है। पुस्तकालय या किसी अन्य स्रोत से यह पुस्तक खोजकर पढ़िए और अपनी मनपसंद कहानी कक्षा में सुनाइए।
- नीचे दी गई एनसीईआरटी की आधिकारिक यू-ट्यूब इंटरनेट कड़ियों (लिंक्स) का प्रयोग करके आप इस पाठ के बारे में और अधिक जान-समझ सकते हैं।
न्याय की कुर्सी
.
माँ कह एक कहानी
.
राजा बड़ा या विक्रमादित्य
.
शब्द-संपदा
शब्द अर्थ आपकी भाषा में शब्द
फरियाद शिकायत, निवेदन, विनती. प्रार्थना
शिला पत्थर, चट्टान, पाषाण, पत्थर का बड़ा चौड़ा टुकड़ा
लाव-लश्कर सेना, सैनिकों का समूह, दल-बल
प्रजा जनता, राज्य के निवासी
प्रायश्चित पश्चात्ताप, अपनी गलती सुधारने का कार्य
कलुष पाप, गंदगी, मैल, पाप, दोष, कलंक
स्तंभित जो जड़ या अचल हो गया हो, अचंभित, हक्का-बक्का, निश्चल, निस्तब्ध, सुन्न, ठहरा हुआ
सकपकाना घबरा जाना, डर जाना, हिचकिचाना, चकपकाना, आश्चर्ययुक्त होना, आगा-पीछा करना, शरमाना
दैवी देवताओं की दी हुई, अलौकिक
न्याय- बुद्धि न्याय करने की क्षमता, सही-गलत का विवेक
मजाल साहस, हिम्मत, सामर्थ्य, शक्ति, ताकत

