Do Bailon Ki Katha, Premchand, NCERT Class IX, Ganga Book Solutions. Questions Answers

प्रेमचंद

प्रेमचंद का जन्म सन् 1880 में लमही (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की परंतु असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और लेखन कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गए।

प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान उनके प्रमुख उपन्यास हैं। उन्होंने हंस, जागरण, माधुरी पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने जिस गाँव और शहर के परिवेश को देखा और जिया, उसकी अभिव्यक्ति उनके कथा साहित्य में मिलती है। किसान, मजदूर, दलित, स्त्री और स्वाधीनता आंदोलन आदि उनकी रचनाओं के मूल विषय हैं।

प्रेमचंद के कथा साहित्य में मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों को भी आत्मीयता मिली है। उनकी भाषा सरल, जीवंत एवं मुहावरेदार है तथा लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग उन्होंने कुशलतापूर्वक किया है। सन् 1936 में प्रेमचंद का निधन हो गया।

‘दो बैलों की कथा’ – पाठ परिचय

‘दो बैलों की कथा’ में प्रेमचंद ने किसानों के जीवन और पशुओं के साथ उनके भावनात्मक संबंधों को मार्मिक ढंग से दिखाया है। इस कहानी में उन्होंने यह भी बताया है कि स्वतंत्रता सहज ही नहीं मिलती, उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। इस प्रकार परोक्ष रूप से यह कहानी स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जुड़ी है। प्रेमचंद ने इसमें ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ जैसी कहानियों की परंपरा को अपनाया और आगे बढ़ाया है।

दो बैलों की कथा

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दरजे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याई हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है; किंतु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो; पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं; पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा। कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।

लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है ‘बैल’। जिस अर्थ में हम ‘गधा’ शब्द का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में ‘बछिया के ताऊ’ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे; मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है; अतएव उसका स्थान गधे से नीचा है।

झूरी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे – देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक, दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे— विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलते, उस वक्त हरएक की यही चेष्टा होती थी कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे। दिन-भर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लिया करते। नाँद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था।

संयोग की बात, झूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम, वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने, पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते; पगहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनों पीछे को जोर लगाते। मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकारते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते – तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया?

संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिन-भर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाए गए, तो एक ने भी उसमें मुँह न डाला। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, सब उन्हें बेगानों से लगते थे।

दोनों ने अपनी मूक-भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए। जब गाँव में सोता पड़ गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुड़ा डाले और घर की तरफ चले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा; पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं।

झूरी प्रातः काल सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों की गरदनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है।

झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुंबन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था।

घर और गाँव के लड़के जमा हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्त्वपूर्ण थी। बाल सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़, कोई चोकर, कोई भूसी।

एक बालक ने कहा- “ऐसे बैल किसी के पास न होंगे।”

दूसरे ने समर्थन किया- “इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए।”

तीसरा बोला- “बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं।”

इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस न हुआ।

झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। बोली- “कैसे नमक हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया; भाग खड़े हुए।”

झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका- “नमकहराम क्यों हैं? चारा-दाना कुछ न दिया होगा, तो क्या करते?”

स्त्री ने रोब के साथ कहा- “बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं।”

झूरी ने चिढ़ाया- “चारा मिलता तो क्यों भागते?”

स्त्री चिढ़ी- “भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धओं की तरह बैलों को सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूँ, कहाँ से खली और चोकर मिलता है! सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहें मरें।”

वही हुआ। मजूर को बड़ी ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए।

बैलों ने नाँद में मुँह डाला, तो फीका-फीका। न कोई चिकनाहट, न कोई रस। क्या खाएँ? आशा भरी आँखों से द्वार की ओर ताकने लगे।

झूरी ने मजूर से कहा- “थोड़ी-सी खली क्यों नहीं डाल देता?”

“मालकिन मुझे मार ही डालेंगी।”

“चुराकर डाल आ।”

“ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे।”

2

दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता।

दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।

संध्या-समय घर पहुँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया। फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी।

दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहाँ मार पड़ी। आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा।

नाँद की तरफ आँखें तक न उठाईं।

दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया; पर दोनों ने पाँव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाए, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं, तो दोनों पकड़ाई में न आते।

हीरा ने मूक- भाषा में कहा- “भागना व्यर्थ है।”

मोती ने उत्तर दिया- “तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।”

“अबकी बड़ी मार पड़ेगी।”

“पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है, तो मार से कहाँ तक बचेंगे?”

गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं।

मोती बोला- “कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा मैं भी। लाठी लेकर आ रहा है।”

हीरा ने समझाया – “नहीं भाई! खड़े हो जाओ।”

“मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा!” “नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।”

मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुँचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पड़ता। उसके तेवर देखकर गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है।

आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खड़े रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उस वक्त एक छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का वास है। लड़की भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।

दोनों दिन-भर जोते जाते, डंडे खाते, अड़ते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।

एक दिन मोती ने मूक- भाषा में कहा- “अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!”

“क्या करना चाहते हो?”

“एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूँगा।”

“लेकिन जानते हो, वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लड़की है, जो इस घर का मालिक है। यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी?”

“तो मालकिन को न फेंक दूँ। वही तो उस लड़की को मारती है।”

“लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।”

“तुम तो किसी तरह से निकलने ही नहीं देते। बताओ, तुड़ाकर भाग चलें।”

“हाँ, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे?”

“इसका एक उपाय है। पहले रस्सी को थोड़ा सा चबा लो। फिर एक झटके में टूट जाती है।”

रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गई, तो दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे।

सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली – “खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग तुम्हें मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएँ।”

उसने गराँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खड़े रहे।

मोती ने अपनी भाषा में पूछा – “अब चलते क्यों नहीं?”

हीरा ने कहा- “चलें तो, लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे।” सहसा बालिका चिल्लाई- “दोनों फूफावाले बैल भागे जा रहे हैं। ओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो।”

गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया। वह और भी तेज हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए।

हीरा ने कहा- “मालूम होता है, राह भूल गए।”

“तुम भी बेतहाशा भागे। वहीं उसे मार गिराना था।”

“उसे मार गिराते, तो दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?”

दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे। खेत में मटर खड़ी थी। चरने लगे। रह-रहकर आहट ले लेते थे, कोई आता तो नहीं है।

जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे। पहले दोनों ने डकार ली। फिर सींग मिलाए और एक-दूसरे को ठेलने लगे। मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहाँ तक कि वह एक खाई में गिर गया। तब उसे भी क्रोध आया। संभलकर उठा और फिर मोती से भिड़ गया। मोती ने देखा – खेल में झगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया।

3

अरे! यह क्या? कोई साँड़ डौंकता चला आ रहा है। हाँ, साँड़ ही है। वह सामने आ पहुँचा। दोनों मित्र बगलें झाँक रहे हैं। साँड़ पूरा हाथी है। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है; लेकिन न भिड़ने पर भी तो जान बचती नहीं नजर आती। इन्हीं की तरफ आ भी रहा है। कितनी भयंकर सूरत है!

मोती ने मूक-भाषा में कहा- “बुरे फँसे। जान बचेगी? कोई उपाय सोचो।”

हीरा ने चिंतित स्वर में कहा- “अपने घमंड में भूला हुआ है। आरजू-विनती न सुनेगा।”

“भाग क्यों न चलें?”

“भागना कायरता है।”

“तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ-दो ग्यारह होता है।”

“और जो दौड़ाए?”

“तो फिर कोई उपाय सोचो जल्द!”

“उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम है; पर दूसरा उपाय नहीं है।”

दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके। साँड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था। वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्योंही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौड़ाया। साँड़ उसकी तरफ मुड़ा, तो हीरा ने रगेदा। साँड़ चाहता था कि एक-एक करके दोनों को गिरा ले; पर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे यह अवसर न देते थे। एक बार साँड़ झल्लाकर हीरा का अंत कर देने के लिए चला कि मोती ने बगल से आकर पेट में सींग भोंक दी। साँड़ क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींग चुभा दिया। आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहाँ तक कि साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।

दोनों मित्र विजय के नशे में झूमते चले जाते थे।

मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा- “मेरा जी तो चाहता था कि बच्चा को मार ही डालूँ।”

हीरा ने तिरस्कार किया – “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”

“यह सब ढोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।”

“अब घर कैसे पहुँचेंगे, वह सोचो।”

“पहले कुछ खा लें, तो सोचें।”

सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहा, पर उसने एक न सुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाए थे कि दो आदमी लाठियाँ लिए दौड़ पड़े और दोनों मित्रों को घेर लिया। हीरा तो मेड़ पर था, निकल गया। मोती सींचे हुए खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धँसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया गया। हीरा ने देखा, संगी संकट में है, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे। रखवालों ने उसे भी पकड़ लिया।

प्रातः काल दोनों मित्र काँजीहौस में बंद कर दिए गए।

4

दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। यहाँ कई भैंसें थीं, कई बकरियाँ, कई घोड़े, कई गधे; पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुरदों की तरह पड़े थे। कई तो इतने कमजोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए ताकते रहे; पर कोई चारा लेकर आता न दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती?

रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला- “अब तो नहीं रहा जाता मोती!”

मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया- “मुझे तो मालूम होता है, प्राण निकल रहे हैं।”

“इतनी जल्द हिम्मत न हारो भाई! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकालना चाहिए।”

“आओ दीवार तोड़ डालें।”

“मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा।”

“बस इसी बूते पर अकड़ते थे!”

“सारी अकड़ निकल गई।”

बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मजबूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और जोर मारा, तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा। उसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी गिराने लगा।

उसी समय काँजीहौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाजिरी लेने आ निकला। हीरा का यह उजड्डपन देखकर उसने उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी-सी रस्सी से बाँध दिया।

मोती ने पड़े-पड़े कहा- “आखिर मार खाई, क्या मिला?”

“अपने बूते-भर जोर तो मार दिया।”

“ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए।”

“जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।”

“जान से हाथ धोना पड़ेगा।”

“कुछ परवाह नहीं। यों भी तो मरना ही है। सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं। इतने भाई यहाँ बंद हैं। किसी की देह में जान नहीं है। दो-चार दिन और यही हाल रहा तो सब मर जाएँगे।”

“हाँ, यह बात तो है। अच्छा, तो ला, फिर मैं भी जोर लगाता हूँ।”

मोती ने भी दीवार में उसी जगह सींग मारा। थोड़ी-सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ी। फिर तो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह जोर करने लगा, मानो किसी प्रतिद्वंद्वी से लड़ रहा है। आखिर कोई दो घंटे की जोर-आजमाई के बाद दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिर गई। उसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा, तो आधी दीवार गिर पड़ी।

दीवार का गिरना था कि अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे। तीनों घोड़ियाँ सरपट भाग निकलीं। फिर बकरियाँ निकलीं। इसके बाद भैंसें भी खिसक गईं; पर गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।

हीरा ने पूछा – “तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते?”

एक गधे ने कहा- “जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ!”

“तो क्या हरज है। अभी तो भागने का अवसर है।”

“हमें तो डर लगता है, हम यहीं पड़े रहेंगे।”

आधी रात से ऊपर जा चुकी थी। दोनों गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागें या न भागें और मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने में लगा हुआ था। जब वह हार गया, तो हीरा ने कहा- “तुम जाओ, मुझे यहीं पड़ा रहने दो। शायद कहीं भेंट हो जाए।”

मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा- “तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा? हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड़ गए, तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ।”

हीरा ने कहा- “बहुत मार पड़ेगी। लोग समझ जाएँगे यह तुम्हारी शरारत है।”

मोती गर्व से बोला- “जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता। इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।”

यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो रहा।

भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची, इसके लिखने की जरूरत नहीं। बस, इतना ही काफी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।

5

एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बँधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला। हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था। यही उनका आधार था। दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तक न जाता था; ठठरियाँ निकल आई थीं।

एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते-होते वहाँ पचास-साठ आदमी जमा हो गए। तब दोनों मित्र निकाले गए और उनकी देखभाल होने लगी। लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते। ऐसे मृतक बैलों का कौन खरीदार होता?

सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यंत कठोर, आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशी जी से बातें करने लगा। उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे। वह कौन है और उन्हें क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हें कोई संदेह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भी नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।

हीरा ने कहा- “गया के घर से नाहक भागे। अब जान न बचेगी।”

मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया- “कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करते हैं। उन्हें हमारे ऊपर क्यों दया नहीं आती।”

“भगवान के लिए हमारा मरना- जीना दोनों बराबर है। चलो, अच्छा ही है, कुछ दिन उसके पास तो रहेंगे। एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?”

“यह आदमी छुरी चलाएगा। देख लेना।”

“तो क्या चिंता है? माँस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी-न-किसी काम आ जाएँगी।”

नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले। दोनों की बोटी-बोटी काँप रही थी। बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे, पर भय के मारे गिरते पड़ते भागे जाते थे; क्योंकि वह ज़रा भी चाल धीमी हो जाने पर जोर से डंडा जमा देता था।

राह में गाय-बैलों का एक रेवड़ हरे-हरे हार में चरता नजर आया। सभी जानवर प्रसन्न थे, चिकने, चपल। कोई उछलता था, कोई आनंद से बैठा पागुर करता था। कितना सुखी जीवन था इनका; पर कितने स्वार्थी हैं सब। किसी को चिंता नहीं कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुखी हैं।

सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह है। हाँ, इसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था। वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे। प्रतिक्षण उनकी चाल तेज होने लगी। सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब हो गई। आह? यह लो! अपना ही हार आ गया। इसी कुएँ पर हम पर चलाने आया करते थे; यही कुआँ है।

मोती ने कहा- “हमारा घर नगीच आ गया।”

हीरा बोला- “भगवान की दया है।”

“मैं तो अब घर भागता हूँ।”

“यह जाने देगा?”

“इसे मैं मार गिराता हूँ।”

“नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहाँ से हम आगे न जाएँगे।”

दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े। वह हमारा थान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए। दढ़ियल भी पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था।

झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलों को देखते ही दौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। एक झूरी का हाथ चाट रहा था। दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियाँ पकड़ लीं।

झूरी ने कहा- मेरे बैल हैं।

“तुम्हारे बैल कैसे? मैं मवेशीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।”

“मैं तो समझता हूँ चुराए लिए आते हो! चुपके से चले जाओ। मेरे बैल हैं। मैं बेचूँगा तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख़्तियार है?”

“जाकर थाने में रपट कर दूँगा।”

“मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।”

दढ़ियल झल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। उसी वक्त मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया। दढ़ियल भागा। मोती पीछे दौड़ा। गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका; पर खड़ा दढ़ियल का रास्ता देख रहा था। दढ़ियल दूर खड़ा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था। और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खड़ा था। गाँव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे।

जब दढ़ियल हारकर चला गया, तो मोती अकड़ता हुआ लौटा।

हीरा ने कहा—“मैं डर रहा था कि कहीं तुम गुस्से में आकर मार न बैठो।”

“अगर वह मुझे पकड़ता, तो मैं बे-मारे न छोड़ता।”

“अब न आएगा।”

“आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखूँ, कैसे ले जाता है।”

“जो गोली मरवा दे?

“मर जाऊँगा; पर उसके काम तो न आऊँगा।”

“हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।”

“इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं।”

ज़रा देर में नाँदों में खली, भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्र खाने लगे। झूरी खड़ा दोनों को सहला रहा था और बीसों लड़के तमाशा देख रहे थे। सारे गाँव में उछाह-सा मालूम होता था।

उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।

 

 

 

दो बैलों की कथा – पहला परिच्छेद

संसार में सीधेपन और अत्यधिक सहनशीलता को अक्सर बेवकूफी का नाम दे दिया जाता है। मुंशी प्रेमचंद ‘गधे’ का उदाहरण देकर बताते हैं कि गधे में ऋषियों-मुनियों की तरह सुख-दुख में समान रहने जैसे सद्गुण हैं, फिर भी उसे बुद्धिहीन माना जाता है।

इसी संदर्भ में प्रेमचंद तत्कालीन भारतीयों की दुर्दशा की तुलना गधे से करते हुए कहते हैं कि केवल सीधापन और अत्याचार सहना पर्याप्त नहीं है; जब तक व्यक्ति ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ देना नहीं सीखता, तब तक समाज उसे ‘सभ्य’ या शक्तिशाली नहीं मानता। तत्कालीन समाज में भारतीयों के इन्हीं सादगी और सरलता के गुणों के कारण उन्हें अमरीका में घुसने नहीं दिया जाता था। जबकि एशियाई देश जापान ने 1904-05 जापान-रसिया युद्ध में विजयी होने के बाद अपनी अलग पहचान बनाई। संक्षेप में, यह गद्यांश अति-सहनशीलता के दुष्परिणामों और आत्म-सम्मान के लिए संघर्ष की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

दो बैलों की कथा – पात्रों का परिचय

  1. मुख्य पात्र (नायक)

हीरा (बैल) – यह पछाईं जाति का बैल है। स्वभाव से अत्यंत सहनशील, गंभीर और शांत है। वह हमेशा नीति और मर्यादा की बात करता है। वह मोती की तुलना में अधिक समझदार है और मुश्किल समय में भी धैर्य नहीं खोता।

मोती (बैल) – यह हीरा का साथी और पक्का दोस्त है। स्वभाव से थोड़ा उग्र और गुस्सैल है। वह अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर पाता और अक्सर ‘ईंट का जवाब पत्थर से देने’ की बात करता है। वह साहसी है और हीरा को मुसीबत में देखकर अपनी जान की परवाह नहीं करता।

  1. मानवीय पात्र

झूरी – वह बैलों का मालिक है। वह अपने बैलों से बहुत प्रेम करता है और उन्हें अपनी संतान की तरह मानता है। वह एक उदार और संवेदनशील किसान है।

झूरी की पत्नी – वह स्वभाव से थोड़ी तेज़ है। शुरू में जब बैल भागकर वापस आते हैं, तो वह उन्हें ‘कामचोर’ और ‘नमकहराम’ समझकर उन पर गुस्सा करती है, लेकिन अंत में उनका साहस देखकर उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।

गया (झूरी का साला) – यह इस कहानी का खलनायक है। वह बैलों के प्रति अत्यंत क्रूर और निर्दयी है। वह उनसे बहुत काम लेता है और बदले में उन्हें केवल सूखा भूसा और मार देता है।

भैरो की छोटी लड़की – यह गया के घर में रहने वाली एक अबोध बच्ची है। उसकी माँ मर चुकी है और सौतेली माँ उसे मारती है। वह बैलों की पीड़ा को अपनी पीड़ा के समान समझती है और चुपके से उन्हें रोटियाँ खिलाकर उनकी रस्सियाँ खोल देती है।

भैरो – भैरो, झूरी के साले ‘गया’ का भाई है। हीरा और मोती को जब गया अपने घर ले गया था, तब वे उसी के परिवार के साथ थे। भैरो की पहली पत्नी का देहांत हो चुका था। उसने दूसरा विवाह किया था, और उसकी दूसरी पत्नी उसकी बेटी पर बहुत अत्याचार करती थी।

  1. अन्य गौण पात्र

साँड़ – यह एक शक्तिशाली और अहंकारी पशु है, जिसे हीरा और मोती मिलकर अपनी चतुराई से हराते हैं।

दढ़ियल कसाई – यह एक निर्दयी व्यक्ति है जो काँजीहौस से नीलाम हुए पशुओं को खरीदता है। वह मृत्यु का प्रतीक है, जिससे बचकर अंत में बैल अपने घर पहुँचते हैं।

काँजीहौस का चौकीदार – जो बाड़े के जानवरों की देखभाल और हाजिरी लेता है।

पात्रों का प्रतीकात्मक महत्त्व

मुंशी प्रेमचंद ने हीरा और मोती को केवल बैल नहीं, बल्कि भारतीय किसानों और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतीक के रूप में पेश किया है। हीरा जहाँ ‘अहिंसक संघर्ष’ का प्रतीक है, वहीं मोती ‘सशस्त्र क्रांति’ या विद्रोह का प्रतिनिधित्व करता है।

दो बैलों की कथा – पाठ का सारांश

मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित ‘दो बैलों की कथा’ हिंदी साहित्य की एक कालजयी कहानी है। यह कहानी न केवल दो बैलों—हीरा और मोती—की गहरी दोस्ती का वर्णन करती है, बल्कि यह परतंत्रता के विरुद्ध संघर्ष और स्वाभिमान का भी प्रतीक है।

  1. परिचय और बैलों की घनिष्ठता

कहानी की शुरुआत गधे के स्वभाव से होती है, जिसे सबसे बुद्धिहीन समझा जाता है, लेकिन लेखक उसकी सहनशीलता की तुलना ऋषियों-मुनियों से करते हैं। इसी संदर्भ में हीरा और मोती का परिचय दिया जाता है, जो ‘झूरी’ नामक किसान के दो बैल हैं। दोनों पछाईं जाति के सुंदर और ऊँचे बैल हैं। वे आपस में मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम रखते थे।

  1. झूरी का साला गया और बैलों की दुर्दशा

एक बार झूरी ने दोनों बैलों को अपने साले गया के साथ ससुराल भेज दिया। बैलों को लगा कि उनके मालिक ने उन्हें बेच दिया है। गया के घर पहुँचते ही उनकी दुर्दशा शुरू हो गई। उन्हें सूखा भूसा खाने को दिया गया और उनसे उपेक्षित व्यवहार भी किया गया। अपनी उपेक्षा से आहत होकर दोनों ने रात को रस्सियाँ तुड़ा लीं और वापस झूरी के घर भाग आए। झूरी उन्हें देखकर खुश हुआ, लेकिन उसकी पत्नी ने उन दोनों बैलों को ‘नमकहराम’ कहा।

  1. दोबारा गया का घर और छोटी बालिका का स्नेह

अगले दिन गया फिर आया और उन्हें और भी क्रूरता से ले गया। अबकी बार उन्हें मोटी रस्सियों से बाँधा गया और डंडों से मारा गया। गया की मार और सूखे भूसे के बीच, भैरो की एक छोटी लड़की उन्हें रोज़ाना दो रोटियाँ खिला जाती थी। उस बच्ची के स्नेह के कारण ही वे दोनों बैल जीवित रह सके। अंततः उन बैलों पर अत्याचार होते देख उस बालिका को उनपर दया आ गई और उसने ने ही उनकी रस्सियाँ खोल दीं और वे दोनों बैल वहाँ से भाग निकले।

  1. साँड़ से मुकाबला और मटर का खेत

भागते हुए रास्ते में उनका सामना एक विशाल साँड़ से हुआ। हीरा और मोती ने संगठित होकर साँड़ को धूल चटाई और उसे पराजित कर दिया। जीत की खुशी में वे मटर के खेत में घुस गए, जहाँ वे पकड़े गए और उन्हें काँजीहौस अर्थात् लावारिस पशुओं के जेल में डाल दिया गया।

  1. काँजीहौस से विद्रोह और नीलामी

काँजीहौस में कई दिनों तक उन्हें भूखा रखा गया। वहाँ कई अन्य जानवर भी थे। हीरा और मोती ने विद्रोह किया और बाड़े की कच्ची दीवार गिरा दी। घोड़ियाँ, बकरियाँ और भैंसें भाग गईं, लेकिन मोती अपने बँधे हुए मित्र हीरा को छोड़कर नहीं गया। अंत में उन्हें एक दढ़ियल कसाई के हाथों नीलाम कर दिया गया।

  1. घर वापसी और सुखद अंत

दढ़ियल कसाई उन्हें लेकर अपने ठिकाने की ओर चला। रास्ते में बैलों को वह मार्ग परिचित लगा। उन्हें आभास हुआ कि झूरी का घर नज़दीक है। अपनी पूरी ताकत लगाकर वे दौड़ते हुए झूरी के थान पर पहुँच गए। दढ़ियल ने अपना हक जताया, लेकिन मोती ने उसे सींगों से मारकर गाँव के बाहर खदेड़ दिया। अंत में, झूरी ने उन्हें स्नेह से सहलाया और मालकिन ने भी खुश होकर उनके माथे चूम लिए।

 

दो बैलों की कथा‘ – सृजन

प्रेमचंद द्वारा ‘दो बैलों की कथा’ लिखने के ये मुख्य कारण हैं –

स्वतंत्रता की चेतना – कहानी का मुख्य उद्देश्य पराधीन भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करना था। हीरा-मोती का संघर्ष यह सिखाता है कि आज़ादी सहज नहीं मिलती, इसके लिए बार-बार बलिदान और संघर्ष करना पड़ता है।

मानवीय संवेदना – लेखक यह दर्शाना चाहते थे कि पशुओं में भी मनुष्यों जैसी गहरी संवेदनाएँ, भावनाएँ और आपसी भाईचारा होता है।

नीति-मूल्य – विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म और मर्यादा, जैसे- स्त्री का सम्मान, मित्र का साथ न छोड़ने का संदेश देना।

कृषक समाज का चित्रण – भारतीय ग्रामीण संस्कृति और किसान-पशु के अटूट प्रेम को जीवंत करना।

 

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. कहानी में हीरा और मोती का आपसी संबंध किस गुण को मुख्य रूप से दर्शाता है?

(क) प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता

(ख) एकता और सहयोग

(ग) गर्व और दंभ

(घ) विद्रोह और क्रोध

उत्तर – (ख) एकता और सहयोग

हीरा-मोती हर संकट में जैसे – साँड़ से लड़ना, काँजीहौस की दीवार तोड़ना आदि  का सामना मिलकर करते हैं, जो उनके आपसी सहयोग को दर्शाता है।

  1. हीरा मोती ने नया स्थान स्वीकार क्यों नहीं किया?

(क) उन्हें भरपेट भोजन दिया गया।

(ख) उन्हें बहुत मोटी रस्सी से बाँधा गया।

(ग) मालिक ने बेचा, यह सोचकर उन्हें अपमान लगा।

(घ) उन्हें अलग-अलग बाँधा गया।

उत्तर – (ग) मालिक ने बेचा, यह सोचकर उन्हें अपमान लगा।

बैलों को लगा कि झूरी ने उन्हें बेच दिया है। वे झूरी के प्रति वफादार थे, इसलिए उन्हें यह परायापन और ‘बेचा जाना’ अपमानजनक लगा।

  1. बैलों ने रस्सी तोड़कर घर लौटने का निर्णय क्यों लिया?

(क) कष्टों से बचने के लिए

(ख) स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए

(ग) अभिमान की रक्षा के लिए

(घ) अपनापन पाने के लिए

उत्तर – (घ) अपनापन पाने के लिए

गया के घर में मार और रूखापन था। वे अपने मालिक झूरी के घर की ओर लौटे क्योंकि वहाँ उन्हें प्रेम और अपनापन मिलता था।

  1. गया द्वारा डंडे से मारने पर मोती का आक्रोश किस मानवीय मनोवृत्ति का द्योतक है?

(क) स्वाभिमान

(ख) अहिंसा

(ग) पराधीनता

(घ) अन्याय की रक्षा

उत्तर – (क) स्वाभिमान

बैल केवल जानवर नहीं, बल्कि स्वाभिमानी जीव दिखाए गए हैं। बिना कारण डंडे खाना उनके आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाता है, जिससे आक्रोश पैदा होता है।

  1. कहानी में बैलों की ‘मूक-भाषा’ का प्रयोग लेखक ने किस लिए किया?

(क) कहानी को रोचक बनाने के लिए

(ख) मनुष्य जैसी चेतना दिखाने के लिए

(ग) संवादों को छोटा रखने के लिए

(घ) कथा में हास्य उत्पन्न करने के लिए

उत्तर – (ख) मनुष्य जैसी चेतना दिखाने के लिए

लेखक ने मूक-भाषा के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि पशुओं के भीतर भी मनुष्यों जैसी गहरी संवेदनाएँ, विचार और मित्रता होती है।

  1. ‘दो बैलों की कथा’ को यदि स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ें, तो हीरा और मोती किसके प्रतीक हो सकते हैं?

(क) भारत पर अंग्रेजों के क्रूर और अन्यायपूर्ण शासन के

(ख) स्वतंत्रता संग्राम में पशुओं के योगदान के

(ग) सत्याग्रह और अहिंसा के आंदोलन के

(घ) स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के संघर्ष के

उत्तर – (घ) स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के संघर्ष के

हीरा-मोती का काँजीहौस में कैद किया जाना, अत्याचार सहना और अंततः मुक्त होना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों का प्रतीक है।

 

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

  1. “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।” जब बैल नए मालिक के यहाँ गए, तो उन्होंने काम करने से इनकार क्यों कर दिया था?

उत्तर – बैलों ने काम करने से मना किया क्योंकि वे गया को अपना मालिक नहीं मानते थे। गया ने उन्हें खाने के लिए केवल भूसा ही दिया था। इसके साथ उन्हें इस बात का भी दुख था कि उनके असली मालिक झूरी ने उन्हें त्याग दिया है। वे विद्रोही भाव में थे और प्रेमविहीन वातावरण में मेहनत नहीं करना चाहते थे।

  1. “गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्त्वपूर्ण थी।” बैलों का घर लौट आना कोई साधारण घटना नहीं है। कैसे?

(संकेत- वे क्यों लौट आए, उनके और झूरी के मन में कौन-कौन से भाव रहे होंगे, क्या वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है आदि।)

उत्तर – बैलों का लौटना साधारण नहीं था क्योंकि यह पशुओं की प्रबल स्मरण शक्ति और अटूट वफादारी को दर्शाता है। वे केवल घर नहीं, बल्कि अपने प्रति झूरी के निस्वार्थ प्रेम के पास लौटे थे। यह घटना सिद्ध करती है कि पशु भी सम्मान और अपनापन पहचानते हैं, जो वास्तविक जीवन में भी सच है।

  1. “मोती ने मूक-भाषा में कहा- अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!”

‘कभी-कभी संघर्ष करना आवश्यक हो जाता है’ इस कथन को कहानी के उदाहरणों से सिद्ध कीजिए।

उत्तर – कहानी में जब साँड़ उन पर हमला करता है, तब यदि वे संगठित होकर संघर्ष न करते तो मारे जाते। काँजीहौस में भी उन्होंने दीवार तोड़ने का संघर्ष किया ताकि अन्य जानवरों की जान बच सके। यह सिद्ध करता है कि अपनी रक्षा और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष अनिवार्य है।

  1. “जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया…” हीरा एवं मोती ‘स्वतंत्रता’ और ‘अपनापन’ दोनों में से किस भावना से अधिक प्रेरित थे? कारण सहित लिखिए।

उत्तर – हीरा और मोती ‘अपनापन’ से अधिक प्रेरित थे। यदि उन्हें केवल स्वतंत्रता चाहिए होती, तो वे गया के यहाँ से भागकर कहीं भी चले जाते, लेकिन वे बार-बार लौटकर झूरी के पास ही आए। उनके लिए आज़ादी वहीं थी जहाँ प्रेम हो।

  1. “बैलों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।”

‘अत्याचार सहना भी अन्याय में भागीदारी है’ – क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।

उत्तर – अत्याचार सहना अन्याय है। हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ। हीरा और मोती यदि गया का अत्याचार सहते रहते, तो वह उन्हें और प्रताड़ित करता रहता। उनके विरोध ने ही अंततः उन्हें मुक्ति दिलाई। चुपचाप दुख सहना अत्याचारी के मनोबल को बढ़ाता है।

  1. “बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था।” हीरा और मोती अभिन्न मित्र थे। कहानी की किन-किन घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है? कम से कम तीन बिंदु लिखिए।

उत्तर – नाँद में साथ मुँह डालना – एक मुँह हटाता तो दूसरा भी हटा लेता।

साँड़ से लड़ाई – जब साँड़ हीरा पर झपटा, तो मोती ने पीछे से वार किया। दोनों ने जान जोखिम में डालकर एक-दूसरे को बचाया।

काँजीहौस का त्याग – मोती दीवार तोड़कर भाग सकता था, लेकिन वह बँधे हुए हीरा को अकेला छोड़कर नहीं गया।

  1. उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।” कहानी में मालकिन और छोटी लड़की, दोनों के व्यवहार की तुलना कीजिए।

उत्तर – मालकिन का व्यवहार शुरुआत में कठोर और अमानवीय था; वे बैलों को ‘कामचोर’ और ‘नमकहराम’ समझकर चिढ़ी थीं, लेकिन अंत में उनकी वफादारी देख पिघल गईं। इसके विपरीत, छोटी लड़की का व्यवहार शुरुआत से ही करुणापूर्ण और आत्मीय था। उसने बिना किसी स्वार्थ के बैलों का दुख समझा और उन्हें मुक्ति दिलाई।

 

मेरी कल्पना मेरे अनुमान

  1. “उसने उनके माथे सहलाए और बोली- खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ…” यदि आप वह छोटी लड़की होते, तो बैलों की मदद किस प्रकार करते?

उत्तर – यदि मैं छोटी लड़की होता तो मैं बैलों को रोटियाँ खिलाने के साथ-साथ उनके घावों पर तेल लगाता और उन्हें सुरक्षित रास्ते की जानकारी देने की कोशिश करता। मैं अपने पिता को भी समझाने का प्रयास करता कि इन बेजुबानों पर अत्याचार करना गलत है।

  1. “दोनों गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।” भय और संकोच इंसान को अवसर मिलने पर भी जकड़े रखता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस वाक्य के संबंध में कहानी और अपने अनुभवों से उदाहरण लेते हुए अपने विचार लिखिए।

उत्तर – मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। काँजीहौस के गधे अवसर मिलने पर भी नहीं भागे क्योंकि वे भविष्य के ‘पकड़े जाने के डर’ से डरे हुए थे। इंसान भी अक्सर सामाजिक डर या असफलता के भय से आज़ादी का हाथ आया मौका गँवा देता है। मेरे अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण आत्मविश्वास की कमी है। 

 

मेरे अनुभव मेरे विचार

  1. “दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता।” क्या आप इस बात से सहमत हैं? आपको ऐसा क्यों लगता है? अपने अनुभवों के आधार पर बताइए।

उत्तर – हाँ, यह सच है। घनिष्ठ मित्रों के बीच हँसी-मजाक, हल्की खींचतान और शरारतें यह दर्शाती हैं कि उनके बीच कोई औपचारिकता नहीं है। जहाँ बहुत ज़्यादा शिष्टाचार होता है, वहाँ अक्सर रिश्तों की गहराई और भावनात्मक जुड़ाव कम होता है।

  1. “हीरा ने तिरस्कार किया- गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”

“यह सब ढोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।”

आपका इस संबंध में क्या विचार है? आप किसके साथ हैं— हीरा के या मोती के या दोनों के? क्यों?

उत्तर – मैं हीरा के विचारों के साथ हूँ। शत्रु यदि असहाय अर्थात् गिरा हुआ हो, तो उस पर वार करना नैतिकता के विरुद्ध है। मर्यादा ही मनुष्य और पशु में अंतर पैदा करती है। मोती का विचार तात्कालिक क्रोध है, जबकि हीरा का विचार महान चरित्र का परिचायक है।

  1. “हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे। आज तुम विपत्ति में पड़ गए तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ?” क्या कभी आपने किसी विपत्ति या चुनौती का सामना अपने किसी मित्र या परिजन के साथ मिलकर किया है? उस घटना के विषय में बताइए।

उत्तर – संकट के समय अपनों का साथ ही सबसे बड़ी शक्ति होती है। कोरोना काल में मेरे मित्र के पिताजी की नौकरी छूट गई थी। ऐसी स्थित में मेरे परिवार ने उनकी आर्थिक सहायता के साथ-साथ भावनात्मक संबल भी दिया। उस विपरीत स्थिति ने हमें सिखाया कि सच्ची मित्रता केवल सुख में साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि कठिन समय में ढाल बनकर खड़े होने का नाम है।

विधा से संवाद

कहानी की पड़ताल

कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा- विन्यास सभी उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं।

कोई कहानी वास्तविक या काल्पनिक घटनाओं पर आधारित हो सकती है और इसमें वास्तविक या काल्पनिक पात्र भी शामिल हो सकते हैं।

आप कहानी लेखन की इस प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए एक कहानी का शीर्षक चुनिए और दिए गए मुख्य बिंदुओं को पूरा कीजिए –

शीर्षक – दो बैलों की कथा

लेखक – मुंशी प्रेमचंद

विषय – पशुओं का अपने स्वामी के प्रति प्रेम, उनकी स्वतंत्रता की चाह और अटूट मित्रता।

क्रिया कार्य – झूरी के बैलों (हीरा-मोती) को ससुराल भेजा जाना, उनका भागना, काँजीहौस में कैद होना, कसाई के हाथों नीलाम होना और अंततः संघर्ष कर वापस घर लौटना।

परिवेश – देश-काल – ग्रामीण भारत का परिवेश, खेत-खलिहान और पुरानी सामाजिक व्यवस्था।

मुख्य विचार – स्वतंत्रता सहज ही नहीं मिलती, उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। साथ ही, पशुओं में भी गहरी संवेदनाएँ होती हैं।

चरित्र/पात्र – मुख्य पात्र – हीरा और मोती (बैल)।

अन्य पात्र – झूरी (मालिक), गया (झूरी का साला), छोटी लड़की (भैरो की बेटी), दढ़ियल (कसाई)।

परिणाम  – हीरा और मोती तमाम बाधाओं और मृत्यु के भय को पार कर वापस अपने मालिक झूरी के पास ‘थान’ पर पहुँच जाते हैं, जहाँ उनका स्वागत होता है।

कहानी का सौंदर्य

छात्र इसे स्वयं करें।

कहानी की रचना

प्राय – कहानी के प्रारंभ में ही कहानी के मुख्य चरित्र, कहानी का समय, कहानी की भाषा, घटनाओं आदि के कुछ संकेत मिलने लगते हैं। प्रेमचंद की इस कहानी में भी ऐसे संकेत हैं। आप कहानी के ऐसे संकेत/ बिंदुओं को ढूँढ़कर लिखिए।

प्रेमचंद की इस कहानी के प्रारंभ में ही गधे और बैल की तुलना के माध्यम से मुख्य पात्रों के स्वभाव का संकेत मिल जाता है। लेखक ने ‘गधा’ और ‘बछिया के ताऊ’ जैसे शब्दों से पात्रों की सरलता और अड़ियलपन को रेखांकित किया है। साथ ही, ‘झूरी’ और उसके बैलों के मूक संवाद के चित्रण से उनके गहरे भावनात्मक संबंध और ग्रामीण परिवेश का स्पष्ट आभास होता है, जो पूरी कहानी की नींव रखता है।

 

विषयों से संवाद

कहानी का समय और समाज

‘दो बैलों की कथा’ कहानी जिस समय लिखी गई थी, उस समय भारत पर अंग्रेजों का दमनकारी शासन चल रहा था। उस समय भारतवासी भी अपने-अपने ढंग से इस अंग्रेजी शासन का विरोध कर रहे थे। इस कार्य में लेखक भी किसी से पीछे नहीं थे। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने हेतु प्रेरित कर रहे थे।

इस कहानी में से कुछ वाक्य चुनकर नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों का मिलान स्वतंत्रता आंदोलन से

जुड़े उपयुक्त वाक्यों के साथ कीजिए—

कहानी में से वाक्य

  1. जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।
  2. मर जाऊँगा, पर उसके काम तो न आऊँगा।
  3. हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।
  4. दोनों मित्रों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।
  5. इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।
  6. साँड़ पूरा हाथी है… पर दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके।

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव

  1. भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया, जिससे लाखों भारतीयों में आजादी की प्रेरणा जगी।
  2. भारतीय जनता के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह धीरे-धीरे गहराता गया।
  3. ब्रिटिश साम्राज्य बहुत शक्तिशाली था, फिर भी स्वतंत्रता सेनानियों ने साहसपूर्वक उसका सामना किया।
  4. दासता के काल में भारतीयों के प्राण, सम्मान और अधिकारों की कोई महत्ता नहीं थी।
  5. स्वतंत्रता के लिए प्राण देना स्वीकार्य था, पर अंग्रेजों की सेवा में लगना अस्वीकार्य।
  6. स्वतंत्रता सेनानी बार-बार जेल गए, फाँसी पर चढ़े, पर संघर्ष छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

क्र.

कहानी के वाक्य

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव

1

जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।

6. स्वतंत्रता सेनानी बार-बार जेल गए, फाँसी पर चढ़े, पर संघर्ष छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

2

मर जाऊँगा, पर उसके काम तो न आऊँगा।

5. स्वतंत्रता के लिए प्राण देना स्वीकार्य था, पर अंग्रेजों की सेवा में लगना अस्वीकार्य।

3

हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।

4. दासता के काल में भारतीयों के प्राण, सम्मान और अधिकारों की कोई महत्ता नहीं थी।

4

दोनों मित्रों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।

2. भारतीय जनता के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह धीरे-धीरे गहराता गया।

5

इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।

1. भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया, जिससे लाखों भारतीयों में आजादी की प्रेरणा जगी।

6

साँड़ पूरा हाथी है… पर दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके।

3. ब्रिटिश साम्राज्य बहुत शक्तिशाली था, फिर भी स्वतंत्रता सेनानियों ने साहसपूर्वक उसका सामना किया।

 

पशुओं के लिए कानून

नीचे दिए गए संवाद पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए—

“मैं तो समझता हूँ, चुराए लिए आते हो। चुपके से चले जाओ। मेरे बैल हैं। मैं बेचूँगा, तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख़्तियार है!”

“जाकर थाने में रपट कर दूँगा।”

“मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।”

  1. बैलों का काँजीहाउस में बंद होना न्याय और अन्याय दोनों को दर्शाता है। कैसे?

न्याय – कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से, यदि लावारिस पशु किसी के खेत का नुकसान करते हैं, तो उन्हें पकड़कर काँजीहौस अर्थात् पशु कारागार में डालना एक व्यवस्था है ताकि नुकसान की भरपाई हो सके। इस नाते यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया थी।

अन्याय – नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण से यह घोर अन्याय था। वहाँ पशुओं को हफ़्तों तक भूखा-प्यासा रखा गया, जिससे वे ‘मुरदों’ जैसे हो गए। इसके अतिरिक्त, जो बैल किसी के पालतू थे और केवल रास्ता भटक गए थे, उन्हें कसाई को नीलाम करना अमानवीय और अन्यायपूर्ण कृत्य था।

  1. यदि आपको अवसर मिले तो आप बैलों की ओर से कौन-कौन से कानूनी अधिकार माँगेंगे?

यदि मुझे अवसर मिले, तो मैं पशुओं के लिए निम्नलिखित अधिकारों की माँग करूँगा –

भोजन और जल का अधिकार – काँजीहौस में रहने के दौरान पशुओं को पर्याप्त चारा और स्वच्छ पानी देना अनिवार्य हो।

उत्पीड़न से सुरक्षा – किसी भी पशु को डंडे से मारना या घायल करना दंडनीय अपराध हो।

पुनर्प्राप्ति का अधिकार – यदि किसी का पालतू पशु पकड़ा जाता है, तो उसे नीलाम करने से पहले उसके असली मालिक को ढूँढने का उचित समय और प्रयास किया जाना चाहिए।

बधिकों को बिक्री पर रोक – खेती के काम आने वाले स्वस्थ पशुओं को कसाई के हाथों बेचना अवैध घोषित हो।

  1. मान लीजिए कि हीरा-मोती अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत करना चाहते हैं। उनकी ओर से उनकी शिकायत थानाध्यक्ष को करते हुए एक पत्र लिखिए।

(संकेत- “थानाध्यक्ष महोदय, हमारा नाम… है। हमारे साथ अन्याय हुआ है…।”)

दिनांक – 17 अप्रैल, 20xx

सेवा में,

थानाध्यक्ष महोदय,

बोलानी थाना, बोलानी

केउंझर, ओड़िशा

विषय – हमारे साथ हुए अन्याय और अवैध नीलामी की शिकायत।

महोदय,

हमारा नाम हीरा और मोती है। हम झूरी नामक किसान के पालतू बैल हैं। हम आपके ध्यान में यह बात लाना चाहते हैं कि हमारे साथ पिछले कुछ दिनों में बहुत अन्याय हुआ है।

रास्ता भटक जाने के कारण हमें काँजीहौस में कैद कर दिया गया, जहाँ हमें सात दिनों तक भूखा रखा गया। वहाँ हमारी तरह और भी अनेक पशु कैद थे जिन पर अत्याचार हो रहा था। वहाँ का प्रशासन अमानवीय है। हद तो तब हो गई जब हमें एक दढ़ियल कसाई के हाथों अवैध रूप से नीलाम कर दिया गया। वह व्यक्ति हमारे साथ क्रूरता कर रहा था और हमें मार डालने की धमकी दे रहा था। जबकि सच्चाई यह है कि हम झूरी के निजी बैल हैं और हमारे द्वार पर खड़ा होना ही हमारी पहचान का सबसे बड़ा सबूत है।

अतः आपसे निवेदन है कि उस कसाई और काँजीहौस के लापरवाह मुंशी के खिलाफ सख्त कार्यवाही करें और हमें हमारे घर में सुरक्षित रहने का अधिकार दिलाएँ।

सधन्यवाद!

प्रार्थी,

हीरा और मोती

झूरी के बैल

हमारी धरोहर और संस्कृति

  1. “वह अपना धर्म छोड़ दे लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें! ”

कहानी के अनुसार हीरा और मोती सदैव ध्यान रखते थे कि कौन-से कार्य करने योग्य हैं और कौन-से नहीं। वे कौन-कौन से कार्य कभी नहीं करते थे?

उत्तर – हीरा-मोती कभी भी असहाय या गिरे हुए शत्रु पर वार नहीं करते थे। वे स्त्री जाति का सदैव सम्मान करते थे और विपत्ति में पड़े अपने मित्र को अकेला छोड़कर भागना अपने धर्म के विरुद्ध समझते थे।

  1. “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”

“लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।”

हीरा के ये कथन किन भारतीय मूल्यों की ओर संकेत करते हैं?

उत्तर – हीरा के ये कथन वीरता, क्षमा और नैतिकता जैसे महान भारतीय मूल्यों की ओर संकेत करते हैं। यह “शरणगत की रक्षा” और “नारी शक्ति के प्रति सम्मान” की हमारी प्राचीन गौरवशाली संस्कृति को दर्शाता है।`

  1. “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता”

(क) खेतों में जुताई के लिए बैल और हल कृषि के पारंपरिक उपकरण हैं। कृषि के अन्य पारंपरिक और आधुनिक उपकरणों तथा उनके उपयोग के विषय में पता लगाइए और लिखिए।

उत्तर – पारंपरिक उपकरण – हल, कुदाल, हँसिया, सिंचाई हेतु रहट।

आधुनिक उपकरण – ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, बुवाई हेतु सीड-ड्रिल, थ्रेशर।

ये उपकरण खेती को कम समय में अधिक कुशल और सरल बनाते हैं।

(ख) भारत में बैल केवल पशु नहीं बल्कि कृषि संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। लिखिए कि भारतीय गाँवों एवं शहरों में भी बैल किस-किस काम में सहायक होते हैं?

उत्तर – गाँवों में बैल हल चलाने, बैलगाड़ी खींचने और कोल्हू में सहायक होते हैं। शहरों में भी वे सामान ढोने वाली गाड़ियों और धार्मिक व सांस्कृतिक उत्सवों जैसे नंदी पूजा में महत्त्वपूर्ण स्थान

अलग-अलग और साथ-साथ

“दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।”

  1. कहानी के आधार पर हीरा और मोती की विशेषताएँ लिखिए।

(संकेत– धैर्यवान, गुस्सैल, मेहनती, शांत, सहनशील आदि)

उत्तर – हीरा – मर्यादा का पालन करने वाला धैर्यवान, सहनशील, गंभीर, शांत स्वभाव, दूरदर्शी और नीतिवान।

मोती – गुस्सैल, साहसी, भावुक, मेहनती, विद्रोही स्वभाव और ईंट का जवाब पत्थर से देने वाला।

  1. हीरा और मोती की विशेषताएँ कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ अलग हैं, किंतु उनकी भिन्न विशेषताएँ एक-दूसरे को पूरा करती हैं। कैसे?

उत्तर – हीरा और मोती की भिन्नता ही उनकी शक्ति है। जहाँ मोती जोश में आकर आपा खो देता है, जैसे – गाड़ी खाई में गिराना या गया पर हमला करना, वहाँ हीरा अपने धैर्य और शांति से उसे संभाल लेता है। वहीं, जहाँ हीरा अपनी सहनशीलता के कारण चुप रह जाता है, वहाँ मोती का विद्रोह और साहस उन्हें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार, एक का ‘विवेक’ और दूसरे का ‘बल’ मिलकर हर संकट को पार कर लेते हैं।

  1. आपकी कक्षा में भी कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी हैं।

सबकी आवश्यकताएँ भी थोड़ी समान और थोड़ी भिन्न हैं। बताइए कि आप भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी से अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? उनसे पता कीजिए कि वे आपसे अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं?

(संकेत- क्या-क्या करें और क्या-क्या न करें, कैसे पढ़ाई खेल आदि में एक-दूसरे की सहायता करें और साथ दें)

उत्तर – कक्षा में भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी से अपने लिए व्यवहार

औसत छात्र होने के कारण कोई मेरा मजाक न उड़ाए और न ही किसी समूह कार्य में मुझे अकेला छोड़ें।

मैं यह भी चाहूँगा कि यदि कोई सहपाठी शांत है, तो उसे बोलने का मौका दें; यदि कोई अधिक चंचल है, तो उसे एकाग्र होने में मदद करें। हम एक-दूसरे की भिन्नताओं को अपनी बाधा नहीं, बल्कि ताकत बनाएँ।

कक्षा में भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी के लिए मेरा व्यवहार –

उनकी विशिष्ट प्रतिभा के प्रति मेरा सम्मान प्रदर्शन। जो पढ़ने में तेज हैं, उनसे कठिन विषय समझने की चाह और जो खेल में अच्छे हैं, उनके साथ टीम वर्क में काम करना।

  1. “दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे।”

कहानी में अनेक स्थानों पर ‘मूक-भाषा’ का उल्लेख किया गया है। आपके विचार से हीरा और मोती किस प्रकार आपस में बातें किया करते होंगे? अनुमान और कल्पना से बताइए।

उत्तर – मेरा अनुमान है कि हीरा और मोती एक-दूसरे की आँखों के भाव, कान की हलचल और शरीर के स्पर्श से बातें करते होंगे।

जब वे दुखी होते होंगे, तो एक-दूसरे को चाटकर सांत्वना देते होंगे।

जब कोई योजना बनानी होती होगी, तो आँखों-आँखों में इशारे करते होंगे, जैसे – काँजीहौस की दीवार तोड़ते समय किया।

गर्दन हिलाकर या फुफकार कर वे अपनी असहमति या चेतावनी एक-दूसरे तक पहुँचाते होंगे।

  1. आप भी अनेक अवसरों पर बिना शब्दों का उच्चारण किए संवाद करते हैं। कब-कब? कहाँ-कहाँ? कुछ उदाहरण लिखिए।

उत्तर – हम भी कई अवसरों पर संकेतों का प्रयोग करते हैं –

कक्षा में – जब शिक्षक पढ़ा रहे हों, तब आँखों या उँगलियों के इशारे से मित्र से पेंसिल माँगना या चुप रहने का संकेत देना।

खेल के मैदान में – क्रिकेट या फुटबॉल खेलते समय बिना बोले केवल संकेतों से रन लेने या पास देने का निर्णय लेना।

मंच पर – नाटक या नृत्य के दौरान इशारों से अगले कदम की याद दिलाना।

सार्वजनिक स्थान – अस्पताल या पुस्तकालय में जहाँ शोर वर्जित है, वहाँ गर्दन हिलाकर ‘हाँ’ या ‘ना’ में उत्तर देना।

भारतीय सांकेतिक भाषा

आप नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी (लिंक) पर जाकर भारतीय सांकेतिक भाषा सीख सकते हैं.-

https -//www.youtube.com/@ISLRTC

https -//islrte.nic.in/

मार्ग खोजेंगे कैसे?

“सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे।”

  1. हीरा – मोती अपने घर के मार्ग से भटक गए थे। क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आप रास्ता भूल गए या भटक गए? तब आपने अपने मार्ग का पता कैसे लगाया था?

उत्तर – हाँ, कई बार अपरिचित शहर या बड़े बाजार में अक्सर रास्ता भटकने की स्थिति बन जाती है। ऐसी स्थिति में मैंने घबराने के बजाय सबसे पहले किसी स्थानीय दुकानदार या पुलिसकर्मी से सहायता ली। सही पते की जानकारी होने पर आस-पास के प्रसिद्ध लैंडमार्क जैसे कोई बड़ा मंदिर, अस्पताल या सरकारी भवन के बारे में पूछकर मैंने अपना मार्ग पुनः खोज लिया।

  1. यदि कोई व्यक्ति भटक जाए तो उसे क्या करना चाहिए कि वह सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य तक पहुँच जाए। कक्षा में चर्चा कीजिए और लिखिए।

(संकेत- ऑनलाइन मानचित्र, पुलिस, स्कूल, सरकारी भवन, विद्यार्थी, सड़क पर लगे सूचना-पट, दुकानों के बोर्डों पर लिखे पते, डाकघर आदि।)

उत्तर – यदि कोई व्यक्ति भटक जाए, तो उसे सुरक्षित रहने और रास्ता खोजने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए –

स्थानीय लोगों की मदद – भरोसेमंद स्थानीय निवासियों या पास की दुकानदारों से रास्ता पूछें।

सूचना-पट (Signboards) – सड़क के किनारों पर लगे सूचना-पटों और माइलस्टोन (Milestones) को पढ़ें।

स्मार्टफोन का उपयोग – मोबाइल में ऑनलाइन मानचित्र (Google Maps) का उपयोग करें।

पुलिस सहायता – यदि रात का समय हो या सुनसान इलाका, तो तुरंत पुलिस सहायता केंद्र या पीसीआर वैन से मदद माँगें।

सार्वजनिक भवन – डाकघर, बैंक या स्कूल जैसे भवनों पर लगे बोर्डों से उस क्षेत्र के सटीक पते का पता लगाएँ।

सुरक्षित स्थान – हमेशा सार्वजनिक और भीड़-भाड़ वाले स्थान पर ही रुकें और सहायता का इंतज़ार करें।

  1. आपके विद्यालय में आपदा की स्थिति में निकासी का मार्ग दर्शाने वाला मानचित्र अवश्य होगा। उसे ध्यानपूर्वक देखिए और पता लगाइए कि आपदा की स्थिति में आपकी कक्षा के सबसे निकट और सुरक्षित कौन-सा मार्ग है।

उत्तर – विद्यालय में सुरक्षा की दृष्टि से लगाए गए मानचित्र का अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है।

निरीक्षण – मानचित्र के अनुसार, हमारी कक्षा के सबसे निकट ‘आपातकालीन निकास द्वार’ (Emergency Exit) है जो गलियारे के अंत में सीढ़ियों के पास स्थित है।

सुरक्षित मार्ग – आपदा (जैसे भूकंप या आग) की स्थिति में, लिफ्ट का प्रयोग न करके निकासी मार्ग के तीरों का अनुसरण करते हुए सीधे विद्यालय के खुले खेल के मैदान जैसे- प्रार्थना मैदान की ओर जाना सबसे सुरक्षित है।

सावधानी – गलियारे में लगे ‘आप यहाँ हैं’ (You Are Here) संकेत को ध्यान में रखते हुए निकास द्वार की ओर बिना भगदड़ मचाए शांति से बढ़ना चाहिए।

 

सृजन

  1. हीरा और मोती की दैनंदिनी

कहानी में हीरा और मोती आपस में मनुष्यों की तरह बातें करते दिखते हैं। कल्पना कीजिए कि वे लिख-पढ़ भी सकते हैं। हीरा या मोती की नजर से उस दिन की डायरी लिखिए जब उन्हें कांजीहाउस ले जाया गया।

कैसे लिखें-

“आज का दिन…” से आरंभ करें।

भावनाएँ लिखें (भूख, गुस्सा, दर्द)।

अंत में आशा या संकल्प लिखें।

(संकेत- “आज हमें काँजीहाउस में बंद किया गया। भूख से पेट जल रहा है। पर विश्वास है कि झूरी हमें वापस ले जाएगा।”)

दिनांक – 14 अप्रैल, 19XX

समय – 10 -30 PM

आज का दिन… बहुत ही कष्टदायक रहा। मटर के खेत में पकड़े जाने के बाद हमें इस नरक काँजीहौस में डाल दिया गया। यहाँ न चारा है, न पानी; चारों ओर हड्डियों के ढाँचे बने जानवर मुर्दों की तरह पड़े हैं। भूख से पेट जल रहा है और गया की क्रूरता पर गुस्सा आ रहा है। शरीर में दर्द है, पर दिल में अभी भी संकल्प है। विश्वास है कि झूरी हमें ढूँढते हुए ज़रूर आएगा और हम यहाँ से आज़ाद होंगे।

हीरा

 

  1. आज के समाचार

मान लीजिए आप एक स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाता हैं। अपने समाचार पत्र के लिए बैलों के कॉंजीहाउस से भागने का समाचार लिखिए।

कैसे लिखें-

शीर्षक दें।

घटना का विवरण (कहाँ, कब, क्या हुआ)।

परिणाम और लोगों की प्रतिक्रिया।

(संकेत- शीर्षक ‘दो बहादुर बैलों ने तोड़ी बेड़ियाँ)

शीर्षक – दो बहादुर बैलों ने तोड़ी बेड़ियाँ; काँजीहौस से दर्जनों जानवर फरार

स्थानीय संवाददाता – कल देर रात स्थानीय काँजीहौस में एक अभूतपूर्व घटना घटी। दो पछाईं जाति के बैलों ने अपनी सींगों से कच्ची दीवार गिरा दी। चौकीदार के अनुसार, दीवार गिरते ही वहाँ बंद घोड़ियाँ, भैंसें और बकरियाँ भाग निकले। इस घटना से पशु प्रशासन में हड़कंप मच गया है। ग्रामीणों ने बैलों की इस संगठित शक्ति और साहस की सराहना की है, जबकि मुंशी ने इसे बड़ी लापरवाही करार दिया है।

 

  1. कहानी का नया अंत

यदि बैल वापस न लौटते तो कहानी का अंत कैसे होता? कहानी का नया अंत लिखिए। कैसे लिखें—

बैलों की नई जगह।

झूरी की स्थिति।

(संकेत- “हीरा और मोती अब एक बूढ़े किसान के घर शांति से रह रहे हैं।”)

कहानी का नया अंत

यदि बैल वापस न लौटते, तो वे दढ़ियल कसाई के चंगुल से भागकर किसी दूर दराज के पहाड़ी इलाके में पहुँच जाते। वहाँ उन्हें एक दयालु बूढ़ा किसान मिलता, जो उन्हें अपने बेटों की तरह रखता। हीरा और मोती अब उस बूढ़े किसान के छोटे से खेत में शांति से अपना जीवन बिताते। उधर झूरी, उनके वियोग में उदास रहता और रोज़ शाम को खाली थान की ओर ताकता, यह उम्मीद करते हुए कि शायद किसी दिन उसके ‘हीरा-मोती’ लौट आएँ।

  1. चित्रकथा लेखन

नीचे ‘दो बैलों की कथा’ की एक घटना को चित्रकथा के रूप में दिया गया है। इन घटनाओं को पहचानिए। प्रत्येक घटना के लिए उपयुक्त संवाद और घटनाक्रम बताने वाले वाक्य लिखिए। कैसे लिखें-

हर चित्र के लिए एक छोटा संवाद बनाकर लिखिए।

दृश्य का क्रम – बंद करना, भागने की योजना, दीवार तोड़ना, आजादी।

(संकेत- चित्र 4 – “अब हम आजाद हैं।”)

छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

मेरे शब्द

कहानी में से पाँच ऐसे शब्द चुनकर लिखिए जो आपके लिए बिल्कुल नए हैं। अब उन शब्दों के अर्थ अपने अनुमान से लिखिए। इसके बाद उनके अर्थ शब्दकोश में से देखकर लिखिए।

1 – निरापद – सुरक्षित या बिना किसी डर के। – “सुरक्षित – जिससे कोई खतरा न हो।”

2 – सहिष्णुता – किसी चीज को सहने की शक्ति। – “सहनशीलता – धैर्यपूर्वक कष्ट सहने का गुण।”

3 – विग्रह – लड़ाई या झगड़ा। – “अलगाव – बँटवारा या कलह (झगड़ा)।”

4 – मसलहत – सही समय या चतुराई। – “हितकर – उचित या बुद्धिमानी की बात।”

5 – अख्तियार – मालिकाना हक या ताकत। – “अधिकार – शक्ति या वश।”

 

भाषा गढ़ते मुहावरे

“लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते।”

‘मन फीका करना’ एक मुहावरा है जिसका अर्थ आपको वाक्य पढ़कर समझ में आ ही गया होगा। इसी से मिलते-जुलते मुहावरे हैं— जी फीका होना, जी खट्टा होना आदि। ‘दो बैलों की कथा’ कहानी में कई मुहावरे हैं जिनसे यह कहानी जीवंत हो गई है। ऐसी भाषा को ही मुहावरेदार भाषा कहा जाता है।

कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों में मुहावरों को पहचानकर रेखांकित कीजिए। इन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य बनाकर लिखिए-

  1. “झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया।”
  2. “उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे।”
  3. “झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी।”
  4. “मोती दिल में ऐंठकर रह गया।”
  5. “आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखेँ कैसे ले जाता है।”
  6. “जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं।”
  7. “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।”
  8. “तो फिर वहीं मरो। बंदा तो नौ-दो ग्यारह होता है।”


1 – दाँतों पसीना आना – बहुत अधिक परिश्रम करना या भारी कठिनाई होना। – गणित के कठिन सवालों को हल करने में अच्छे-अच्छों को दाँतों पसीना आ जाता है।
2 – दिल काँप उठना – बहुत अधिक डर जाना या भयभीत होना। – अचानक सामने शेर को देखकर शिकारी का दिल काँप उठा।
3 – जल उठना – ईर्ष्या होना या बहुत अधिक क्रोधित होना। – अपनी सहेली के नए खिलौने देखकर रीना जल उठी।
4 – दिल में ऐंठकर रह जाना – मन मसोस कर रह जाना या व्यवस्था के कारण क्रोध पी जाना। – “मालिक की डाँट सुनकर नौकर दिल में ऐंठकर रह गया – पर कुछ बोल न सका।”
5 – खबर लेना – दंड देना या सबक सिखाना। – अध्यापक ने गृहकार्य न करने वाले छात्रों की अच्छी खबर ली।
6 – जी तोड़कर काम करना – बहुत अधिक मेहनत करना। – परीक्षा में प्रथम आने के लिए राहुल जी तोड़कर काम कर रहा है।
7 – गम खा जाना – चुपचाप सहन कर लेना या धैर्य रखना। – बड़ों की कड़वी बातों पर कभी-कभी गम खा जाना ही बुद्धिमानी है।
8 – ईंट का जवाब पत्थर से देना – कड़ा प्रतिवाद करना या दुष्ट के साथ दुष्टता करना। – भारतीय सेना ने सीमा पर दुश्मनों को ईंट का जवाब पत्थर से दिया।
9 – नौ-दो ग्यारह होना – भाग जाना। – पुलिस को आते देखकर चोर पलक झपकते ही नौ-दो ग्यारह हो गया।

 

 

गतिविधियाँ

नीचे दी गई गतिविधियाँ अपने समूह के साथ मिलकर कीजिए—

  1. कविता (गीत) और अभिनंदन-पत्र

“बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशुवीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए।”

(क) मान लीजिए कि बाल-सभा ने हीरा और मोती की प्रशंसा में एक गीत लिखा और गाया। अपनी कल्पना से वह गीत लिखिए।

उत्तर – हमारे दो वीर

 

आए हैं दो वीर निराले, झूरी के ये हैं प्यारे।

संकट में जो कभी न टूटे, हिम्मत के ये हैं ध्रुव तारे।

सींगों से दीवार गिरा दी, मूक प्रेम है इनकी भाषा।

काँजीहौस के बंदी कहते, इन्हें स्वतंत्रता की आशा।

लौट आए अपने आँगन में, तोड़ गुलामी की जंजीर।

हीरा-मोती तुम हो योद्धा, तुम हो सबसे शूरवीर!

(ख) हीरा और मोती के लिए अभिनंदन पत्र लिखिए।

उत्तर – अभिनंदन-पत्र

प्रिय पशु-वीर हीरा एवं मोती,

हम ग्राम बाल-सभा के सदस्य आपकी वीरता और स्वाभिमान की सराहना करते हैं। आपने यह सिद्ध कर दिया कि आज़ादी केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि हर जीव का अधिकार है। आपकी अटूट मित्रता और झूरी के प्रति वफादारी हमारे लिए प्रेरणा है। इस अभिनंदन-पत्र के साथ हम आपके लिए ताजी रोटियाँ और चोकर सप्रेम भेंट करते हैं।

शुभकामनाओं सहित,

बाल-सभा, बोलानी।

  1. बाल सभा में भाषण

मान लीजिए कि आपको बाल-सभा ने हीरा-मोती के लौटने के बाद भाषण देने के लिए बुलाया है। भाषण का विषय है— ‘पशुओं के अधिकार। अपना भाषण लिखिए और कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

विषय – पशुओं के अधिकार

“आदरणीय शिक्षक गण और मेरे सहपाठियों,

आज जब हम हीरा और मोती की घर वापसी का उत्सव मना रहे हैं, तो हमें यह समझना होगा कि पशु भी संवेनशील प्राणी हैं। ईश्वर ने उन्हें वाणी नहीं दी, इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता।

पशुओं का पहला अधिकार है— क्रूरता से मुक्ति। उन्हें बेवजह मारना या उनकी क्षमता से अधिक बोझ लादना अन्याय है। दूसरा अधिकार है— उचित पोषण। जैसे हमें भूख लगती है, वैसे ही उन्हें भी ताज़ा चारा और स्वच्छ जल चाहिए। तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार है— प्रेम और गरिमा। हीरा और मोती केवल ‘कामचोर’ नहीं थे, वे स्वाभिमानी थे।

 

आइए संकल्प लें कि हम अपने आस-पास के बेजुबानों के प्रति दयालु रहेंगे और उनके अधिकारों की रक्षा करेंगे। धन्यवाद!”

  1. शीर्षक

इस कहानी के पाँच भाग हैं। कहानी के प्रत्येक भाग को अपने मन से उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

कहानी की घटनाओं के प्रवाह के आधार पर प्रस्तावित शीर्षक –

भाग 1 – गधा, बैल और झूरी का प्रेम (प्रस्तावना)

भाग 2 – गया की कैद और विद्रोह (ससुराल की यात्रा)

भाग 3 – आज़ादी की पहली डकार और साँड़ से युद्ध (साहस का परिचय)

भाग 4 – काँजीहौस का नरक और महान पलायन (पशु एकता)

भाग 5 – कसाई का चंगुल और अपनी थान पर वापसी (विजयी मिलन)

 

मेरी पहेली

अपने समूह के साथ मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-

हीरा, झूरी, मोती, गया, बैल, मटर, रस्सी, रोटी

  1. उत्तर – झूरी

मैं हूँ उनका असली मालिक, करता उनसे सच्चा प्यार।

घर आने पर चूम लिया था, खोल दिया था बाहें पसार।

(कौन हूँ मैं?)

  1. उत्तर – हीरा

पछाईं जाति का सुंदर हूँ मैं, स्वभाव मेरा है बहुत गंभीर।

गया की मार भी चुपचाप सहता, सहनशीलता में मैं हूँ वीर।

(मेरा नाम क्या है?)

  1. उत्तर – मोती

ईंट का जवाब पत्थर से दूँ, क्रोध बड़ा है मेरी नाक पर।

काँजीहौस की दीवार गिरा दी, पहुँचा घर मैं अपनी साख पर।

(मेरा नाम क्या है?)

  1. उत्तर – गया

झूरी का मैं साला लगता, क्रूरता की मैं मूरत हूँ।

सूखी घास खिलाता हूँ मैं, बैलों के लिए मुसीबत हूँ।

(मैं कौन हूँ?)

  1. उत्तर – बैल

खेती की मैं जान कहाता, हल खींचूँ मैं दिन और रात।

‘बछिया का ताऊ’ भी कहते, मूक भाषा में करता बात।

(मैं कौन हूँ?)

  1. उत्तर – मटर

हरे-भरे खेत में खड़ी थी, खाने में मैं बड़ी स्वादिष्ट।

मुझे चरते ही पकड़े गए, बन गई दोनों के लिए मैं आफ़त।

(मैं क्या हूँ?)

  1. उत्तर – रस्सी

गले में मेरे बंधन डाले, मुँह से मुझे चबाते हैं।

जब मैं झटके से टूटूँ, तो कैदी भाग जाते हैं।

(मैं क्या हूँ?)

  1. उत्तर – रोटी

छोटी सी एक बच्ची लाई, प्रेम का मैं प्रसाद हूँ।

भूखे बैलों के मन को तृप्त करूँ, ममता की मीठी याद हूँ।

(मैं क्या हूँ?)

 

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

1 – बुद्धिहीन – मूर्ख / जिसमें अक्ल न हो – Witless / Foolish

2 – परले दरजे का – ऊँचे दरजे का (बुरे अर्थ में) – Of the highest degree

3 – निरापद – सुरक्षित / जिससे खतरा न हो – Safe / Secure

4 – सहिष्णुता – सहनशीलता – Tolerance / Endurance

5 – पदवी – उपाधि / खिताब – Title / Rank

6 – अनायास – बिना प्रयास के / अचानक – Effortlessly / Suddenly

7 – सिंहनी – शेरनी – Lioness

8 – कुलेल – खेल-कूद / क्रीड़ा – Frolicking / Gambol

9 – विषाद – दुःख / उदासी – Sorrow / Melancholy

10 – स्थायी – हमेशा रहने वाला – Permanent

11 – दशा – स्थिति / हालत – Condition / State

12 – पराकाष्ठा – चरम सीमा – Zenith / Extreme limit

13 – सद्गुण – अच्छे गुण – Virtues

14 – अनादर – अपमान – Disrespect / Insult

15 – कदाचित – शायद – Perhaps / Maybe

16 – उपयुक्त – उचित / सही – Suitable / Appropriate

17 – दुर्दशा – बुरी हालत – Plight / Miserable condition

18 – कुसमय – बुरा वक्त – Hard times / Adverse time

19 – सभ्य – शिष्ट / भद्र – Civilized

20 – मिसाल – उदाहरण – Example

21 – गण्य – गिनने योग्य / प्रतिष्ठित – Distinguished / Notable

22 – बछिया के ताऊ – महामूर्ख – A big fool

23 – अड़ियल – जिद्दी – Stubborn / Obstinate

24 – अतएव – इसलिए – Therefore / Hence

25 – चौकस – सावधान / सतर्क – Alert / Vigilant

26 – डील – कद-काठी / शरीर – Stature / Physique

27 – भाईचारा – मित्रता / बंधुत्व – Brotherhood / Fraternity

28 – विनिमय – आदान-प्रदान – Exchange

29 – वंचित – रहित – Deprived

30 – विग्रह – अलग होना / झगड़ा – Conflict / Separation

31 – विनोद – मज़ाक / मनोरंजन – Amusement / Fun

32 – आत्मीयता – अपनापन – Affection / Sense of belonging

33 – घनिष्ठता – गहरापन / निकटता – Intimacy / Closeness

34 – चेष्टा – कोशिश – Attempt / Effort

35 – गोईं – जोड़ी (बैलों की) – Pair (of oxen)

36 – दाँतों पसीना आना – बहुत कठिन परिश्रम करना – To struggle hard

37 – पगहिया – पशु बाँधने की रस्सी – Tether / Halter

38 – हुँकारना – डकारना / गरजना – To bellow / Roar

39 – चाकरी – सेवा / नौकरी – Service / Menial job

40 – जालिम – अत्याचारी – Tyrant / Oppressor

41 – बेगाना – पराया / अजनबी – Stranger / Alien

42 – कनखी – तिरछी नज़र – Side-glance

43 – सोता पड़ना – गहरी नींद में होना – To be in deep sleep

44 – गराँव – गले की रस्सी – Neck-rope

45 – गद्गद – बहुत प्रसन्न / भावुक – Overwhelmed with joy

46 – मनोहर – सुंदर / मन को हरने वाला – Charming / Captivating

47 – अभूतपूर्व – जो पहले न हुआ हो – Unprecedented

48 – अभिनंदन-पत्र – प्रशंसा पत्र – Citation / Welcome letter

49 – प्रतिवाद – विरोध – Protest / Objection

50 – नमक हराम – विश्वासघाती – Ungrateful / Disloyal

51 – आक्षेप – इल्जाम / आरोप – Accusation / Allegation

52 – मजूर – मज़दूर – Labourer

53 – ताकीद – चेतावनी / निर्देश – Warning / Instruction

54 – व्यथा – पीड़ा / दर्द – Agony / Pain

55 – टिटकार – पुचकार (पशुओं के लिए) – Clicking sound for animals

56 – निर्दयी – कठोर हृदय वाला – Merciless / Cruel

57 – पकड़ाई – पकड़ में आना – Captivity / Catch

58 – व्यर्थ – बेकार – Useless / Vain

59 – ऐंठकर – अकड़कर – Proudly / Stubbornly

60 – मसलहत – सलाह / बुद्धिमानी – Wisdom / Expediency

61 – सज्जन – भला आदमी – Gentleman

62 – बरकत – लाभ / शुभ फल – Blessing / Prosperity

63 – दुर्बल – कमज़ोर – Weak / Feeble

64 – विद्रोह – बगावत – Rebellion / Revolt

65 – अनाथ – बेसहारा – Orphan

66 – उपाय – तरीका – Solution / Remedy

67 – आफत – मुसीबत – Calamity / Trouble

68 – संदेह – शक – Doubt / Suspicion

69 – बेतहाशा – बहुत तेज़ / अंधाधुंध – Recklessly / Frantically

70 – आहट – पदचाप – Sound of footsteps

71 – आज़ादी – स्वतंत्रता – Freedom / Independence

72 – डौंकना – गरजना (साँड़ का) – To bellow

73 – कायरता – डरपोकपन – Cowardice

74 – नौ-दो ग्यारह होना – भाग जाना – To run away

75 – रगेदना – खदेड़ना / पीछा करना – To chase / Pursue

76 – तजुरबा – अनुभव – Experience

77 – मल्लयुद्ध – कुश्ती – Combat / Wrestling

78 – संगठित – एक साथ जुड़ा हुआ – United / Organized

79 – तिरस्कार – उपेक्षा / नफरत – Contempt / Disdain

80 – बैरी – दुश्मन – Enemy / Foe

81 – ढोंग – पाखंड – Hypocrisy

82 – मेड़ – खेत का किनारा – Boundary of a field

83 – संगी – साथी – Companion

84 – काँजीहौस – लावारिस पशुओं का घर – Cattle pound

85 – साबिका – वास्ता / पाला पड़ना – Encounter / Connection

86 – तिनका – घास का टुकड़ा – Straw / Bit of grass

87 – तृप्ति – संतोष – Satisfaction / Satiety

88 – ज्वाला – लपट / आग – Flame

89 – चिप्पड़ – मिट्टी का टुकड़ा – Clod / Chunk of earth

90 – साहस – हिम्मत – Courage / Bravery

91 – हाजिरी – उपस्थिति – Attendance / Presence

92 – उजड्डपन – गंवारपन – Boorishness / Rudeness

93 – रसीद करना – ज़ोर से मारना – To strike / Deliver a blow

94 – बंधन – रुकावट / कैद – Bondage / Restraint

95 – प्रतिद्वंद्वी – विरोधी – Rival / Opponent

96 – अधमरा – लगभग मरा हुआ – Half-dead

97 – सरपट – बहुत तेज़ – Gallop / At full speed

98 – विपत्ति – संकट – Calamity / Adversity

99 – स्वार्थी – मतलबी – Selfish

100 – अपराध – गुनाह – Crime / Offense

101 – आशीर्वाद – दुआ – Blessing

102 – खलबली – अफरा-तफरी – Commotion / Panic

103 – मृत्क – मरा हुआ – Dead / Deceased

104 – दढ़ियल – दाढ़ी वाला – Bearded

105 – मुद्रा – भाव-भंगिमा – Expression / Posture

106 – अंतर्ज्ञान – भीतरी ज्ञान – Intuition / Inner voice

107 – अश्रद्धा – अनादर – Irreverence / Lack of faith

108 – नीलाम – बोली लगाना – Auction

109 – बधिक – कसाई / हत्यारा – Executioner / Butcher

110 – रेवड़ – पशुओं का झुंड – Herd / Flock

111 – चपल – चंचल – Agile / Nimble

112 – पागुर – जुगाली – Rumination / Chewing cud

113 – प्रतिक्षण – हर पल – Every moment

114 – नगीच – नज़दीक / पास – Near / Close

115 – थान – पशुओं के बाँधने की जगह – Stall

116 – उन्मत्त – बावला / मस्त – Intoxicated / Frantic

117 – अख्तियार – अधिकार – Authority / Right

118 – रपट – रिपोर्ट – Report

119 – धमकियाँ – डराना – Threats

120 – उछाह – उत्साह / उत्सव – Festivity / Enthusiasm

121 – तमाशा – खेल / प्रदर्शन – Spectacle / Show

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