हम सब एक हैं
अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध कोलंबिया विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर जाते ही अंदर की ओर एक महान पुरुष का चित्र दिखाई देता है। चित्र के पास कुछ इस तरह लिखा है, “हमें गर्व है कि ऐसा छात्र हमारे विश्वविद्यालय में पढ़कर गया है।”
कोलंबिया विश्वविद्यालय के 300 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में ‘सबसे आदर्श छात्र कौन है?’ इसका सर्वेक्षण किया गया। तब 6 छात्रों
के नाम सामने आए। उनमें प्रथम स्थान पर था एक ऐसे छात्र का नाम जो केवल कोलंबिया विश्वविद्यालय में ही नहीं बल्कि विश्वभर में समता – ममता, सहृदयता और मानवता का प्रतीक बन गया था।
जानते हो, वे कौन थे? वे कोई और नहीं भारतीय संविधान के निर्माता, दलितों के मसीहा, मानवता से पूरित महामहिम भारतरत्न डॉ. भीमराव रामजी अंबेड्कर थे। आपका जीवन हम सबके लिए प्रेरणा दायक है।
बात उन दिनों की है जब बालक अंबेड्कर अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर माध्यमिक शिक्षा के लिए हाई स्कूल में दाखिल हुए। एक दिन आप अपने भाई के साथ जा रहे थे। रास्ते में प्यास लगी। एक घर के पास गए और पानी माँगा। उस घर के मालिक ने कहा, “तुम अछूत हो। हम तुमको पानी नहीं पिला सकते। ” उसने अपने घरवालों को भी पानी देने से मना कर दिया और दरवाज़ा बंद कर लिया। दरवाज़े के बंद होते ही अंबेड्कर को वह मार्ग मिल गया जहाँ अस्पृश्यता और असमानता मिटाकर एक नव समाज की प्रतिष्ठापना कर सकते हैं।
20 वीं शताब्दी के श्रेष्ठ चिंतक, ओजस्वी लेखक तथा यशस्वी वक्ता एवं स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री डॉ. भीमराव रामजी अंबेड्कर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को महाराष्ट्र प्रांत के रत्नगिरि जिले के अंबेवाड़ा गाँव में हुआ। आपकी माता भीमाबाई और पिता रामजी मालोजी सकपाल थे।
आप सन् 1912 में बी. ए. पास हुए। वडोदरा महाराज श्री सयाजी राव गैक्वाड आपकी प्रतिभा से प्रभावित हुए। उन्होंने इन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेजा। वहाँ से वाणिज्यशास्त्र में एम. ए. पास हुए। इसके बाद सन् 1917 में ‘भारत का राष्ट्रीय लाभ’ विषय पर पीएच. डी. की उपाधि से सम्मानित हुए।
डॉ. अंबेड्कर उच्च शिक्षा पूरी कर भारत लौट आए। यहाँ वडोदरा महाराज के सैनिक सचिव पद पर नियुक्त हुए। बाद में मुंबई जाकर सीडेनहोम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। किंतु कुछ लोगों की संकीर्ण विचारधारा से दुखी होकर नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इतना होने पर भी आपका आत्मबल कभी कम नहीं हुआ। आपका दृढ़ विश्वास था, ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ सन् 1919 में लंदन जाकर अपने अथक परिश्रम से एम.एससी., डी.एससी. और बैरिस्ट्री की उपाधि प्राप्त की।
सन् 1923 में मुंबई के उच्च न्यायालय में आपने वकालत शुरू कर दी। अनेक कठिनाइयों के बावजूद आप आगे बढ़ते गए। एक मुक़दमे में आपने अपने ठोस तर्कों से एक निर्दोष अभियुक्त को फाँसी की सज़ा से मुक्त करा दिया। इसके बाद वकालात की दुनिया में भी आपके चार चाँद लग गए।
आगे चलकर आप राजनीति की दुनिया में प्रविष्ट हुए। 8 अगस्त, 1930 में एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान आपने भाषण देते हुए कहा, “हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं राजनीतिक शक्ति बने बिना शोषितों का निवारण नहीं हो सकता। उनका उद्धार समाज में उचित स्थान पाने में निहित है।” ऐसे विचार आगे बढ़ाने के लिए आपने सन् 1920 में ‘मूक नायक’ नामक पत्रिका भी निकाली। सन् 1932 में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भी भाग लिया।
सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना के लिए बनी समिति के आप अध्यक्ष चुने गए। भारत के प्रथम विधिमंत्री भी नियुक्त हुए। आपने संविधान में दलितों, पीड़ितों और निम्न वर्गों के हित के लिए अनेक विधियों की रचना में विशेष भूमिका निभा कर सभी को समान रूप से न्याय दिलाने के अनुकूल संविधान का निर्माण किया।
डॉ. अंबेड्कर मेधावी, न्यायशास्त्र के पारंगत, समाज सुधारक, सहृदयी और समता – ममता से पूरित मानवतावादी थे। आपने अनेक ग्रंथों की रचना की। आपका विश्वास है कि जात-पाँत रहित सम-समाज से ही देश में सुख-शांति की स्थापना हो सकती है। ऐसे महामहिम का निधन 6 दिसंबर, 1956 को हुआ। इनके विचार समय के बीतने के साथ और महत्त्वपूर्ण बनते गए। ये विचार तत्कालीन, वर्तमान और भावी समाज के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसे सपूतों पर भारत को गर्व है।
शब्द (हिंदी) | अर्थ (हिंदी में) | तेलुगु | अंग्रेज़ी (English) |
गर्व | सम्मान या अभिमान | గర్వం | Pride |
छात्र | विद्या ग्रहण करने वाला | విద్యార్థి | Student |
समता | समानता या बराबरी | సమానత్వం | Equality |
ममता | प्रेम व स्नेह | మాతృభావం | Affection |
मानवता | इंसानियत | మానవత్వం | Humanity |
प्रेरणादायक | प्रोत्साहित करने वाला | ప్రేరణాత్మకమైన | Inspirational |
अस्पृश्यता | छुआछूत | అంటరాని | Untouchability |
समाज | लोगों का समूह | సమాజం | Society |
प्रतिष्ठापना | स्थापना या निर्माण | స్థాపన | Establishment |
संविधान | कानूनों का लिखित ढांचा | రాజ్యాంగం | Constitution |
विधि मंत्री | कानून मंत्री | చట్ట మంత్రివర్గం | Law Minister |
अधिकार | हक या शक्ति | హక్కు | Rights |
न्याय | उचित फैसला | న్యాయం | Justice |
भेदभाव | पक्षपात या असमानता | వివక్ష | Discrimination |
रचना | निर्माण या सृजन | సృష్టి | Creation |
संघर्ष | कठिनाइयों से लड़ाई | పోరాటం | Struggle |
पीड़ित | कष्ट सहने वाला | బాధితుడు | Sufferer |
उद्धार | सुधार या मुक्ति | విముక్తి | Upliftment |
समाज सुधारक | समाज को बेहतर बनाने वाला | సమాజ సంస్కర్త | Social Reformer |
समरसता | भाईचारा व समानता | సమరసత్వం | Harmony |
विद्वान | ज्ञानवान व्यक्ति | పండితుడు | Scholar |
न्यायशास्त्र | कानून का ज्ञान | న్యాయశాస్త్రం | Jurisprudence |
दलित | सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग | దళితుడు | Oppressed |
सशक्तिकरण | अधिकार देना | సాధికారత | Empowerment |
आत्मबल | आत्मविश्वास | ఆత్మవిశ్వాసం | Self-confidence |
स्वाभिमान | आत्म-सम्मान | ఆత్మగౌరవం | Self-respect |
क्रांति | बड़ा परिवर्तन | విప్లవం | Revolution |
नेतृत्व | मार्गदर्शन | నాయకత్వం | Leadership |
स्वतंत्रता | आज़ादी | స్వాతంత్య్రం | Freedom |
पाठ का सार
यह कहानी डॉ. भीमराव अंबेड्कर के जीवन और उनके योगदान को दर्शाती है। इसमें बताया गया है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय में उन्हें सबसे आदर्श छात्र के रूप में सम्मानित किया गया। बचपन में उन्हें अस्पृश्यता और भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने इन सामाजिक बुराइयों को मिटाने का संकल्प लिया। उन्होंने वडोदरा महाराज की सहायता से अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में लंदन में भी उच्च डिग्रियाँ हासिल कीं। भारत लौटने के बाद वे विधि मंत्री बने और भारतीय संविधान का निर्माण किया, जिसमें दलितों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए। उन्होंने समाज सुधार, समानता और न्याय के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उनके विचार और कार्य आज भी प्रेरणादायक हैं। 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनके विचार और सिद्धांत आज भी समाज में प्रासंगिक बने हुए हैं। इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि हमें सही मायनों में शिक्षित बनना चाहिए और समाज के कल्याण के लिए अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए।
प्रश्न-
- ‘हम सब एक हैं’ शीर्षक पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर – ‘हम सब एक हैं’ यह संदेश समाज में समानता और एकता को दर्शाता है। जाति, धर्म, भाषा और सामाजिक स्थिति के भेदभाव से ऊपर उठकर हमें यह समझना चाहिए कि सभी मनुष्य समान हैं। हाँ, यह तो तयशुदा बात है कि रूप-रंग, सामाजिक सरोकार और मनुष्य के अपने प्रयत्नों के आधार पर हमें भले ही असमानता देखने को मिलती हो फिर भी डॉ. अंबेड्कर ने भी अपने जीवन में ‘हम सब एक हैं’ के इसी विचार को बढ़ावा दिया। उन्होंने जातिवाद, अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए संघर्ष किया। यदि समाज में सभी व्यक्ति समान अवसर प्राप्त करें और एक-दूसरे का सम्मान करें, तो एक मजबूत और विकसित राष्ट्र की स्थापना हो सकती है।
- डॉ. अंबेड्कर को संविधान निर्माता क्यों कहा जाता है?
उत्तर – डॉ. भीमराव अंबेड्कर को भारतीय संविधान निर्माता कहा जाता है क्योंकि उन्होंने स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने समाज के सभी वर्गों को समान अधिकार देने का प्रयास किया। उन्होंने दलितों, महिलाओं और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान जोड़े। उनके द्वारा निर्मित संविधान ने भारत को एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और न्यायसंगत राष्ट्र के रूप में स्थापित किया, जहाँ सभी नागरिकों को समान अवसर मिलते हैं।
- ‘डॉ. अंबेड्कर मानवीय दृष्टिकोण का सुंदर उदाहरण हैं।’ सिद्ध करें।
उत्तर – डॉ. अंबेड्कर का जीवन समाज में समानता, न्याय और मानवता की भावना को दर्शाता है। उन्होंने दलितों और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उन्होंने शिक्षा, कानून और राजनीति के माध्यम से समाज सुधार के कार्य किए। अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ उन्होंने अनेक आंदोलन चलाए और अंततः एक ऐसा संविधान बनाया, जो सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। उनके विचार और कार्य यह सिद्ध करते हैं कि वे मानवीय दृष्टिकोण के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। इन्हीं सभी कारणों से पूरा संसार उन्हें महमानव की संज्ञा देता है।
विचार-विमर्श
जब आपको कोई चिढ़ाता है या ताने कसता है, तब आप कैसा महसूस करते हैं?
उत्तर – जब कोई मुझे चिढ़ाता है या ताने कसता है, तो यह मुझे आंतरिक रूप से आहत करता है और मेरे आत्मविश्वास को कमजोर करता है। कई बार यह मेरे गुस्सा, निराशा या दुख का कारण बनता है। लेकिन थोड़े चिंतन-मनन के बाद मैं नकारात्मकता से प्रभावित हुए बिना धैर्य धारण करता हूँ और आत्मबल को मजबूत करना करता हूँ। डॉ. अंबेड्कर जैसे महान व्यक्तियों से प्रेरणा लेकर मैं पुनः अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना शुरू कर देता हूँ ताकि अपनी काबिलियत से लोगों को जवाब दे सकूँ।
अतिरिक्त प्रश्नोत्तर –
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में दीजिए –
प्रश्न – डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर – डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले के अंबेवाड़ा गाँव में हुआ था।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर को किस उपाधि से सम्मानित किया गया था?
उत्तर – उन्हें “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया था।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर को संविधान निर्माता क्यों कहा जाता है?
उत्तर – उन्होंने भारतीय संविधान की रचना में प्रमुख भूमिका निभाई थी।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर ने किस विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी?
उत्तर – उन्होंने “भारत का राष्ट्रीय लाभ” विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर ने अस्पृश्यता के खिलाफ कौन-सा आंदोलन चलाया?
उत्तर – उन्होंने “अस्पृश्यता निवारण आंदोलन” चलाया।
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो से तीन पंक्तियों में दीजिए –
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर ने शिक्षा के क्षेत्र में कौन-कौन सी उपलब्धियाँ हासिल कीं?
उत्तर – उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की तथा लंदन से एम.एससी., डी.एससी. और बैरिस्ट्री की डिग्री हासिल की।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर ने समाज सुधार के लिए कौन-कौन से कदम उठाए?
उत्तर – उन्होंने अस्पृश्यता मिटाने, दलितों के अधिकारों की रक्षा करने और समाज में समानता स्थापित करने के लिए कई आंदोलन और संगठन बनाए।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर का संविधान में सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या था?
उत्तर – उन्होंने सभी नागरिकों को समान अधिकार, स्वतंत्रता और न्याय दिलाने के लिए संविधान में विशेष प्रावधान जोड़े।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर ने राजनीति में क्या योगदान दिया?
उत्तर – उन्होंने शोषित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक शक्ति का महत्व बताया और स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बने।
प्रश्न – डॉ. अंबेडकर के विचार आज भी प्रासंगिक क्यों हैं?
उत्तर – उनके विचार सामाजिक समानता, शिक्षा, मानवाधिकार और न्याय के लिए आज भी मार्गदर्शक हैं।

